कभी क्रोध नहीं करूंगा-Never angry

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संत ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठल पंत को जब संसार से विरक्ति हुई, तो उन्होंने सन्यास ग्रहण करने का निश्चय किया और पत्नी के साथ काशी चले गए।

वहां उन्होंने श्रीपाद स्वामी से दीक्षा ली। पर सन्यास ग्रहण करने के पश्चात भी पत्नी का त्याग ना करने पर गांव के लोगों ने उनका बहिष्कार कर दिया।

इतना ही नहीं विट्ठल पंत का अपमान करने के लिए लोग उनकी संतानों को सन्यासी की संतान कहकर चढ़ाते और उन्हें भी भिक्षा भी नहीं देते।

फल स्वरुप उनके बच्चों को रोज खाली हाथ ही लौटना पड़ता। यह अपमान बालक ज्ञानेश्वर के लिए असहनीय था।

वह हमेशा उदास रहा करता। रोज की तरह एक दिन जब किसी ने भी उसे भिक्षा नहीं दी और वह खाली हाथ घर लौटा तो गुस्से में उसने अपनी बहनों से कहा, “मैं भी यहां नहीं रहूंगा। और अब काशी चला जाऊंगा।”

उनकी बड़ी बहन निवृत्ति ने कहा, “इतना गुस्सा ठीक नहीं।”

तब ज्यानेश्वर की बड़ी बहन मुक्ताबाई ने कहा, “पावन हृदय योगी लोगों के अपराध सहता ही है।

यदि दांत जीभ को काट दे तो क्या व्यक्ति अपने दांत उखाड़ फेंकता है। मेरे भाई, ज़रा शांति से काम लो और दरवाज़ा खोलो। स्वयं का उद्धार कर विश्व का भी उद्धार करो।”

मुक्ताबाई का उपदेश सुन ज्ञान देव शांत हो गए। उन्होंने बहन के गले से लगते हुए कहा, “सच में मैं गलत था।”

शिक्षा:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें क्रोध नहीं करना चाहिए।

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