भारतीयों को चाय की “लत” रातों-रात नहीं लगी. अंग्रेजों ने इसके लिए 40-50 साल लगातार मेहनत की. ये माना जाता है कि 1950 के दशक से पूरा देश चाय का लती हो गया. और फिर धीरे धीरे चाय की हमारी आदत बढ़ती ही जा रही है. आज भारत दुनिया में चाय का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि अंग्रेजों की चाय, जो अब विशुद्ध भारतीय हो चुकी है, उससे पहले हम सुबह के समय कौन से पारंपरिक पेय पीते थे. वैसे महात्मा गांधी चाय को साम्राज्यवादी कहकर हमेशा इसका विरोध करते थे. शुरू में भारतीय इसे कड़वा काढ़ा कहा करते थे.
अंग्रेजों के चाय लाने से पहले भारत में सुबह के पेय पदार्थों की संस्कृति बहुत समृद्ध थी. दिलचस्प बात यह है कि उस समय के पेय केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि मौसम और शरीर की प्रकृति के अनुसार चुने जाते थे. कुछ पारंपरिक पेय तो भारतीय घरों में सुबह सुबह बहुत आम थे.
काढ़ा या हर्बल अर्क
गांवों और कस्बों में लोग सुबह-सुबह तुलसी, अदरक, काली मिर्च, और दालचीनी को पानी में उबालकर पीते थे. इसे एक औषधि के रूप में देखा जाता था, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्युनिटी को बढ़ाता था. आज भी बीमार होने पर हम इसी की शरण में जाते हैं.
छाछ मट्ठा
भारत के गर्म मैदानी इलाकों जिसमें आमतौर पर पूरा उत्तर भारत आ जाता था, वहां सुबह की शुरुआत ताजी छाछ से होती थी. इसमें भुना हुआ जीरा और काला नमक डाला जाता था. यह पेट को ठंडा रखता था. भारी नाश्ते को पचाने में मदद करता था.
सत्तू का शरबत
पूर्वी भारत आमतौर पर इसमें बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के इलाकों के बारे में कह सकते हैं. इसमें में सत्तू को पानी, गुड़ या नमक-मिर्च-नींबू के साथ घोलकर पिया जाता था. ये केवल एक पेय नहीं था, बल्कि एक “कम्पलीट मील” था जो किसानों और मजदूरों को दोपहर तक ऊर्जा देता था.
ताज़ा दूध और ठंडाई
संपन्न परिवारों में सुबह गाय या भैंस का ताज़ा गर्म दूध पीने का चलन था. सर्दियों में इसमें केसर या हल्दी मिलाई जाती थी, जबकि गर्मियों में ठंडाई का सेवन किया जाता था, जो बादाम, खसखस, सौंफ और काली मिर्च को मिलाकर बनाई जाती थी.
कांजी और फर्मेंटेड पेय
दक्षिण भारत और ओड़िशा जैसे क्षेत्रों में ‘पझाया सादम्’ या ‘पानी भात’ का पानी पिया जाता था. यह रात के बचे हुए चावल को पानी में भिगोकर बनाया जाता था, जो प्रोबायोटिक्स से भरपूर होता था और सुबह ताजगी देता था.
कब से चाय का चलन फैलना शुरू हुआ
भारत में चाय का व्यापक चलन मुख्य रूप से 1920 और 1950 के बीच फैला. हालांकि तब चाय केवल ऊंचे तबके या रेलवे स्टेशनों तक सीमित थी. आम भारतीय इसे “कड़वा काढ़ा” मानता था. 1930 के दशक में जब दुनिया में आर्थिक मंदी आई तो अंग्रेजों का विदेशों में चाय का निर्यात गिर गया. तब उन्होंने भारत के घरेलू बाजार पर पूरा जोर लगा दिया. विज्ञापनों की बाढ़ आ गई.
सबसे असली टर्न 1950 के दशक में आया जबकि आजादी के बाद तक चाय पूरी तरह भारतीय जीवन का हिस्सा बन गई. ज्यादातर भारतीय घरों में सुबह की शुरुआत चाय के साथ होने लगी. 1950 के दशक में ये सस्ती भी हो गई. तब दूध-चीनी वाली “मसाला चाय” हर घर की पहचान बन गई.
सबसे बड़ा विरोध महात्मा गांधी ने किया
चाय के खिलाफ भारत में तगड़ा विरोध हुआ. इसके पीछे कोई और नहीं बल्कि महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रवादी नेता थे. गांधीजी चाय को “जहर” और गुलामी का प्रतीक मानते थे. उन्होंने अपनी किताब ‘की टू हेल्थ’ (Key to Health) में लिखा,
चाय में ‘टैनिन’ होता है जो पाचन बिगाड़ता है. यह एक नशा है जिसकी लत शरीर को कमजोर करती है.
उन्होंने इसे “साम्राज्यवाद का पेय” कहा क्योंकि चाय के बागानों में भारतीय मजदूरों की स्थिति बहुत दयनीय थी. आजादी की लड़ाई के दौरान कई नेताओं ने “चाय छोड़ो” का नारा दिया. उनका तर्क था कि चाय पीने से भारत का पैसा इंग्लैंड जा रहा है. भारतीय लोग विदेशी विलासिता के आदी हो रहे हैं. कई कट्टरपंथी हिंदू और मुस्लिम समूहों ने भी इसे “अभक्ष्य” यानि नहीं पीने के योग्य बताया था.
अंग्रेज बहुत चालाक थे. जब उन्होंने देखा कि राष्ट्रवादी नेता विरोध कर रहे हैं, तो उन्होंने चाय को “स्वदेशी और आधुनिक” दिखाना शुरू किया. उन्होंने विज्ञापनों में दिखाया कि चाय पीने से जात-पात का भेद खत्म होता है, क्योंकि हर कोई एक ही स्टाल पर खड़ा होकर पीता है. उन्होंने इसे “स्वस्थ” बताया और कहा कि ये मलेरिया जैसी बीमारियों से लड़ने में मदद करती है. हकीकत ये सच नहीं था लेकिन प्रचार का हिस्सा था.
तब और अब
आजादी के समय तक भारत अपनी कुल चाय का केवल 20% हिस्सा खुद पीता था और बाकी निर्यात करता था. आज भारत अपनी कुल चाय का लगभग 80% खुद पी जाता है. हालांकि ये सही है कि अब भी भारत दुनिया के सबसे बड़े चाय निर्यातकों में है.
कब और कैसे शुरू हुआ टी ब्रेक
भारत के कॉर्पोरेट और सरकारी आफिसों में “टी ब्रेक” की शुरुआत वास्तव में अंग्रेजों के समय में ही हुई थी. अंग्रेजों ने जब भारत में कारखाने, रेलवे और दफ्तर शुरू किए, तो उन्होंने महसूस किया कि भारतीय मजदूर और क्लर्क लंबे समय तक बिना रुके काम करने के आदी नहीं थे. अंग्रेजों ने देखा कि दोपहर में 15-20 मिनट का एक ‘टी ब्रेक’ देने से कर्मचारी की थकान मिट जाती है और वह दोबारा ऊर्जा के साथ काम कर सकता है.
शुरुआत में कई ब्रिटिश कंपनियों ने “फ्री टी” देना शुरू किया. वे चाहते थे कि मजदूरों को चाय की लत लगे ताकि वे सुस्त न पड़ें. आजादी के बाद कई सरकारी विभागों ने कर्मचारियों के वेतन ढांचे मेंं टी कॉफी अलाउंस शुरू किया.
भारत में ऐसे कई श्रम विवाद हुए, जहां यूनियनों ने मांग की कि “चाय का समय” और “चाय का खर्च” उनके काम की शर्तों का हिस्सा होना चाहिए. कई ट्रिब्यूनल्स ने माना कि एक कर्मचारी को काम के बीच में चाय के लिए छोटा ब्रेक और मामूली भत्ता मिलना उसका अधिकार है.
आजादी के कई दशकों बाद तक खासकर 1990 के दशक तक, कई बड़ी भारतीय कंपनियों में कर्मचारियों को टी टोकन या कूपन मिलते थे. अब ज्यादातर आफिसों में चाय और कॉफी मुफ्त में देने के लिए मशीन लगाई जाती हैं.



