अंबाला: नवरात्रों के पावन दिन चल रहे हैं और कहा जाता है कि इन दिनों में जो भी भक्त पूरी श्रद्धा के साथ अपनी मनोकामना मांगता है, वह जरूर पूर्ण होती है. दरअसल, हरियाणा के अंबाला शहर में स्थित मां काली का एक बहुत ही प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे मां दुःख भंजनी मंदिर के नाम से जाना जाता है. बता दें कि इस मंदिर में मां काली को सभी भक्तों के दुखों का निवारण करने वाली देवी माना जाता है. यह मंदिर उत्तर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है. इस मंदिर की एक विशेष परंपरा है कि नवरात्रों के दौरान मां काली की मूर्ति को दूध से स्नान कराया जाता है.
दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
इस दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु यहां मां काली के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं और उस दूध को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं, जिससे मां का स्नान कराया जाता है. यह एक अनूठी परंपरा है और कोलकाता और कटक के बाद अंबाला एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां इस प्रकार की पूजा होती है.
मंदिर की वास्तुकला भी अद्वितीय है, क्योंकि यह एक तालाब के बीच में स्थित है और चारों ओर से पानी से घिरा हुआ है, जो इसे अत्यंत आकर्षक बनाता है. नवरात्रों के अलावा भी यहां रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, विशेष रूप से शनिवार के दिन माथा टेकने के लिए अधिक भीड़ रहती है.
मां महाकाली दुःखभंजनी मंदिर अंबाला
इस बारे में मंदिर के पुजारी पंडित पंकज ने बताया कि मां महाकाली दुःखभंजनी मंदिर अंबाला का एक प्राचीन मंदिर है और मंदिर से भी ज्यादा पुराना यहां का सरोवर (तालाब) माना जाता है. उन्होंने बताया कि वर्ष 1989 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण/स्थापना की गई थी. यहां बने तालाब के पास एक प्राचीन काल का भगवान भोलेनाथ का मंदिर भी स्थित है.
‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ आशीर्वाद
उन्होंने कहा कि इस मंदिर में एक प्राचीन मान्यता है कि जो भी भक्त मां का दूध से स्नान करवाता है, उसे ‘दूधो नहाओ, पूतो फलो’ (धन और संतान का सुख) का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. उन्होंने बताया कि सुबह से ही भक्त मंदिर आकर मां का दूध स्नान करवा रहे हैं. कुछ श्रद्धालु मां के भजनों पर नाचते-झूमते भी दिखाई देते हैं.
उन्होंने आगे बताया कि दूध स्नान के बाद मां की पालकी पूरे शहर में निकाली जाएगी और इसके अगले दिन मां का ताजपोशी कार्यक्रम किया जाएगा, जो केवल विशेष मंदिरों में ही होता है.
उन्होंने बताया कि लगभग 30 वर्षों से इस मंदिर में एक खास परंपरा निभाई जा रही है, जिसमें देशभर के अलग-अलग सिद्धपीठों से मां काली की ज्योत लाई जाती है. इसके बाद उस ज्योत का मिलन मंदिर की ज्योत से कराया जाता है और फिर उसे वापस मंदिर में स्थापित किया जाता है.
उन्होंने कहा कि अब तक मां कामाख्या देवी, मां ज्वाला देवी और मां धारी देवी (उत्तराखंड) जैसे सिद्धपीठों से यह ज्योत लाई जा चुकी है. इस बार मां नैना देवी (नैनीताल, उत्तराखंड) से ज्योत लाई गई है, जिसे लेने के लिए मंदिर की ओर से 20 से 25 श्रद्धालु गए थे.
संतान प्राप्ति का आशीर्वाद
वहीं, मंदिर में आए श्रद्धालुओं का कहना है कि वे कई वर्षों से यहां माथा टेकने आते हैं और जो भी मनोकामना मां से मांगी, वह पूरी हुई है. उनका कहना है कि इस मंदिर में दर्शन करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं और परिवार में खुशियां आती हैं. जिन महिलाओं को संतान सुख प्राप्त नहीं होता, वे यहां मां काली का दूध स्नान करवाकर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद पाती हैं.




