अपराध की जाति

Date:

संजीव शुक्ल

अपराधी सिर्फ़ अपराधी होता है, कुछ और नहीं। उसका जाति के आधार पर बचाव या जाति के आधार पर उसकी संलिप्तता का तर्क देना खुद में एक अपराध है। 

जब-जब हम अपराध की व्याख्या जाति-सम्प्रदाय के नजरिए से करेंगे, अपराध को अपराध के रूप में नहीं एक जाति या सम्प्रदाय विशेष की बेजा हरकत के रूप में व्याख्यायित कर अपराध की गम्भीरता से छेड़छाड़ कर रहे होते हैं।

जाति को संयोग न मानकर उसे अपराध की मूल प्रवृत्ति का उत्प्रेरक सिद्ध करने के अपने निहितार्थ हो सकते हैं पर इससे अपराध को रोकने में कोई सहायता मिलेगी ऐसा सोचना भी कूपमण्डूकता है।

जिस कोरोना को एक सम्प्रदाय-विशेष से जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई, उससे कितना कोरोना को रोकने में मदद मिली, बताने की जरूरत नहीं है। हाँ अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए मामले को दूसरी तरफ मोड़ देने के फायदे जरूर लिए गए। समाज में विद्वेष फैला सो अलग।


अपराधी अगर सवर्ण है तो सवर्ण के नाम पर उसका बचाव करना उतना ही गर्हित है जितना उसकी जाति के आधार पर उसके अपराध को विज्ञापित करना। 


 अपराधी अपने अपराध को अंजाम अपनी ताकत के बल पर देता है। यह ताकत शारिरिक और आर्थिक दोनों तरह हो सकती है। शोषित सिर्फ़ कमजोर व्यक्ति होता है। एक ही जाति में कमजोर और ताकतवर दोनों तरह के लोगों की मौजूदगी पाई जाती है।

अगर जाति ही अपराध की मूल प्रेरक है तो कोई भी भला आदमी उससे जुड़ना नहीं चाहेगा। उसे अपनी जाति पर गर्व न हो करके शर्मिंदगी होनी चाहिए। पर व्यवहार में तो ऐसा होता नहीं है।
अगर अपराध के लिए ऊँची जाति एक जरूरी तत्व है तो जो अपराधी निचली जातियों से जुड़े हैं, उनकी आपराधिक मनोवृत्ति का क्या आधार तय किया जाएगा ? यह एक यक्ष प्रश्न होगा। 
चाहे हाथरस की घटना हो या निर्भया कांड या फिर बहुत पुराना नैना साहनी कांड, ये सभी सभ्य समाज के लिए कलंक हैं।

इनमें जातिसूत्रता ढूंढना मानसिक विकलांगता के अतिरिक्त और कुछ नहीं।अगर जाति ही अपराध की नियामक तत्त्व है तो एक जाति विशेष के अंदर कोई अपराध होने ही नहीं चाहिए। ध्यान रहे महिला उत्पीड़न के मामले प्रायः एक परिवार से ही जुड़े होते हैं।

इस तरह विदेशों में तो अपराध होने ही नहीं चाहिए क्योंकि वहाँ तो जातियाँ होती ही नहीं। इसलिए अपराधी को सिर्फ़ अपराधी की निगाह से ही देखा जाना चाहिए, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। हाथरस जैसी घटनाएं जघन्य तो हैं ही मानवीय मूल्यों की हत्या और समाज के लिए कलंक हैं।

यह अपराध मुक्त समाज की नहीं, अपितु कानून-मुक्त समाज की स्थिति है। दूसरे पर दोषारोपण करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेना समस्या का हल नहीं। इस आग की जद में हम भी कभी न कभी आएंगे ।

जो लोग घटनाओं की निंदा राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से करते हैं ,वे अगले अपराध की भूमिका तय करने के सबसे बड़े जिम्मेदार है। इसके अलावा पाश्चात्य संस्कृति के पीछे लट्ठ लेकर घूमने से न तो भारतीय संस्कृति गर्वित हो जाएगी और न ही संस्कारों की नई फसल लहलहाऐगी।

https://hindiblogs.co.in/contact-us/

https://www.pmwebsolution.in/

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

बिपिन चंद्र पाल जी की पुण्यतिथि-Bipin Chandra Pal ji’s death anniversary

बिपिन चंद्रपाल जी की पुण्यतिथि हर साल देश में...

परशुराम जयंती-Parshuram Jayanti

हर साल परशुराम जयंती देशभर में 14 मई को...

सुखदेव थापर की कहानी-Story of Sukhdev Thapar

जानिए देश के लिए शहीद होने वाले सुखदेव थापर...

विश्व परिवार दिवस -World family day

दुनिया भर में विश्व परिवार दिवस 15 मई को...