असम की 40 सीटों पर होगा सबसे बड़ा घमासान, परिसीमन के बाद बदल गए सियासी समीकरण, क्या है बीजेपी का प्लान?

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असम की 40 सीटों पर होगा सबसे बड़ा घमासान, परिसीमन के बाद बदल गए सियासी समीकरण

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साल 2023 में असम में परिसीमन हुआ था. इसके बाद मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें 41 से घटकर 26 रह गई हैं. फिर भी इन इलाकों में जीतना बीजेपी के लिए आसान नहीं है. उधर कांग्रेस भी इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक रही है. साल 2011 में कांग्रेस ने 78 सीटें जीती थीं. लेकिन 2021 में वह सिर्फ 29 सीटों पर सिमट गई. अब गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस वापसी की कोशिश कर रही है.

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असम में तीसरी बार सरकार बनाने के लिए बीजेपी पूरी कोशिश में लगी है. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली. असम में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) लगातार तीसरी जीत के साथ-साथ पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल करने के लक्ष्य के साथ मैदान में है. 2016 में सत्ता में आने के बाद से भाजपा 126 सदस्यीय विधानसभा में 60 सीटों के आसपास ही सिमटती रही है और अपने सहयोगियों के सहारे सरकार बनाती रही है. 2016 में पार्टी ने 15 साल से सत्ता में रही कांग्रेस को हराकर असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के समर्थन से सरकार बनाई थी.

भाजपा को अपर असम, उत्तर असम और पहाड़ी जिलों में मजबूती मिली, लेकिन निचले असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में वह मजबूत पकड़ नहीं बना सकी. ऐसे में सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता बनी रही. 2021 में भी भाजपा 60 सीटों पर ही रुक गई. हालांकि असमिया बहुल क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन मजबूत रहा, लेकिन मुस्लिम बहुल और जातीय रूप से अलग इलाकों में पार्टी खास बढ़त नहीं बना पाई. इस बार बीपीएफ की जगह यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) गठबंधन में शामिल है.

जनसांख्यिकीय समीकरण भी भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में मुस्लिम आबादी करीब 34.2 प्रतिशत है, जो कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाती है. वहीं हिंदू आबादी लगभग 61.5 प्रतिशत और ईसाई समुदाय करीब 3.7 प्रतिशत है. मुस्लिम मतदाता करीब 35 से 40 सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं. इनका वोट परंपरागत रूप से कांग्रेस के पक्ष में जाता रहा है, लेकिन बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के उभरने से इस वोट बैंक में कुछ बंटवारा हुआ.

2021 में कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन ने इस वोट को काफी हद तक एकजुट कर भाजपा को इन इलाकों में रोक दिया था, हालांकि अब दोनों दल अलग हो चुके हैं. 2023 में हुए परिसीमन के बाद मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों की संख्या लगभग 41 से घटकर 26 रह गई है, लेकिन भाजपा के लिए इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करना अब भी चुनौती बना हुआ है.

वहीं कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव अहम है. 2011 में 78 सीटें जीतने वाली पार्टी 2016 में 26 सीटों पर सिमट गई थी और 2021 में मामूली सुधार के साथ 29 सीटें हासिल कर सकी. अब गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी अल्पसंख्यकों, चाय जनजातियों और मध्यम वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

एआईयूडीएफ का प्रभाव भी कमजोर होता दिख रहा है, जबकि रायजोर दल और आंचलिक गण मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दल अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कुल मिलाकर, असम का यह चुनाव दिलचस्प मुकाबले की ओर बढ़ रहा है, जहां भाजपा पहली बार अपने दम पर बहुमत पाने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस और अन्य दल उसे चुनौती देने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं.



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