असम के चाय बागानों से दिल्ली तक हेमंत सोरेन की नजर, जेएमएम ने शुरू की बड़ी कवायद, राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री के संकेत

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रांची. झारखंड, असम या फिर बंगाल… या फिर देश का वह कोई भी राज्य…जहां आदिवासी आबादी बसी हो, वहां अब हेमंत सोरेन का चेहरा स्थापित करने की तैयारी जोरों पर है. फिलहाल बात असम के चाय बगानों से निकली है, जिनके मुद्दों को उठाकर हेमंत सोरेन राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े ट्राइबल नेता के तौर पर उभरते नजर आ रहे हैं. बिहार में अपने तेवर दिखाने के बाद अब असम से लेकर देश के दूसरे आदिवासी बहुल राज्यों तक, जेएमएम अब उनकी पहचान को व्यापक बनाने में जुटी है. ताजा राजनीतिक गतिविधियों में हेमंत सोरेन का फोकस खासतौर पर असम के चाय बगानों में रहने वाले आदिवासी समुदाय पर नजर आ रहा है. जानकारों की नजर में यहां के मुद्दों को उठाकर वे खुद को राष्ट्रीय ट्राइबल राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहे हैं.

असम चुनाव में हेमंत के चेहरे पर सियासी बाजी

बता दें कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने असम की राजनीति में एक साहसिक दांव खेलते हुए 15 साल बाद वापसी की है और 2026 के विधानसभा चुनाव में स्वतंत्र रूप से 21 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए हैं. पार्टी मुख्य रूप से असम के विशाल चाय बागान क्षेत्रों में बसे चाय जनजाति (टी ट्राइब) समुदाय को लक्ष्य कर रही है, जिनकी संख्या करीब 60-70 लाख है और जिनमें से अधिकांश की जड़ें झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र से जुड़ी हैं.

झारखंड के बाहर मजबूत पकड़ की कोशिश

यहां यह भी बता दें कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिछले महीनों में असम के चाय बागानों में रैलियां कीं, ‘अबुआ राज’ का नारा लगाया और चाय मजदूरों के अधिकार, भूमि सुधार तथा एसटी स्टेटस की मांग को जोर-शोर से उठाया. कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग की बातचीत असफल होने के बाद JMM ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिससे विपक्षी वोट (खासकर आदिवासी वोट) के बंटने की आशंका तो बढ़ गई है, लेकिन हेमंत सोरेन का राजनीतिक कद भी बढ़ने की संभावना दिख रही है.

देशभर के आदिवासी वोट पर नजर

बता दें कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में आदिवासी आबादी 10.45 करोड़ से ज्यादा थी, जो अब बढ़कर 12 से 13 करोड़ के बीच मानी जा रही है. ऐसे में इस बड़े वर्ग के बीच मजबूत और साझा नेतृत्व की मांग लंबे समय से महसूस की जाती रही है. वहीं, पिछले छह सालों की बात करें तो झारखंड में हेमंत सोरेन का लगातार दूसरा कार्यकाल उनके मजबूत नेतृत्व क्षमता को बताने के लिए काफी है.

असम से आदिवासी राजनीति साधने निकले हेमंत सोरेन, क्या बनेंगे देश के सबसे बड़े ट्राइबल चेहरा?

हेमंत सोरेन का बड़ा सियासी दांव

हेमंत सोरेन अबतक वह चार बार झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके हैं. ऐसे में अब उनकी पार्टी जेएमएम की कोशिश देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के तौर उन्हें स्थापित करने की है. पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि संथाली समेत दूसरी भाषा में हेमंत सोरेन की संवाद क्षमता उन्हें झारखंड से बाहर भी एक मजबूत पहचान देती है. जेएमएम की कोशिश है कि राज्य कोई भी हो, लेकिन वहां रहनेवाली आदिवासी आबादी अपना नेता और रहनुमा के रूप में हेमंत सोरेन को स्वीकार करे.

झारखंड से बाहर बढ़ रहा असर!

हालांकि, जानकार कहते हैं कि असम या फिर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा या फिर कोई अन्य राज्य… वहां के आदिवासी समाज के अपने अपने स्थानीय मुद्दे होते हैं. ऐसे में अलग-अलग राज्यों में आदिवासी समाज के मुद्दे और चुनौतियां भी अलग हैं. लेकिन, ऐसा लगता है कि इनके बीच ही इन्हीं मुद्दों को जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक पहचान बनाना ही जेएमएम की रणनीति का केंद्र है.

देशभर के आदिवासी वोट पर नजर, हेमंत सोरेन का बढ़ता राजनीतिक विस्तार

हेमंत सोरेन को राष्ट्रीय ट्राइबल फेस बनाने की तैयारी

कुल मिलाकर, झारखंड की सीमाओं से बाहर निकलकर हेमंत सोरेन को राष्ट्रीय आदिवासी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश अब तेज होती दिख रही है. आदिवासी समुदाय के मुद्दों को उठाकर जेएमएम की कोशिश है कि हेमंत सोरेन की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की जाए.आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह प्रयास क्षेत्रीय राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर कितना असर डाल पाता है.



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