असम चुनाव में कांग्रेस के हाथ क्यों नहीं आया ‘तीर-कमान’, क्या झारखंड में भी जेएमएम के अलग होंगे रास्ते?

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रांची. असम विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( Indian National Congress ) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha) यानी झामुमो (JMM) के बीच गठबंधन की बात नहीं बनी.  झामुमो अब अकेले 21 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और पार्टी की ओर से कई उम्मीदवारों की घोषणा भी हो चुकी है.  झामुमो ने दावा किया कि उसने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी.  दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना है कि उसने साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन झामुमो अपनी शर्तों पर अड़ा रहा. ऐसे अब दोनों ही पार्टियों में असहमति के बीच दरार खुलकर दिख रही है और इसके साथ ही  इंडिया गठबंधन की एकता पर सवाल खड़ा कर रही है.

बता दें कि असम चुनाव 9 अप्रैल को होने हैं और चुनाव के नजदीक आने से पहले ही कांग्रेस- झामुमो की इस दूरी पर सवाल खड़े हो रहे हैं.  इस बीच झामुमो प्रवक्ता मनोज पंडेय ने गठबंधन की कोशिशों का जिक्र किया, लेकिन असफलता भी स्वीकार की है. जबकि,  कांग्रेस ने बड़े दिल की बात कही है. इस सियासी नूराकुश्ती पर भाजपा ने तंज कसा है. इसी के साथ सवाल उठ रहा है कि क्या यह दरार झारखंड की सत्तारूढ़ महागठबंधन पर भी असर डालेगी? यह सवाल उस स्थिति की चर्चा करते हुए और गंभीर हो जाती है जब हेमंत सोरेन के हालिया दिल्ली दौरे के बाद भाजपा-झामुमो नजदीकी की चर्चाएं भी तेज हो गई थीं.

असम में गठबंधन टूटा: झामुमो का एकला चलो

झामुमो और कांग्रेस के बीच सम्मानजनक सीट शेयरिंग की लंबी बातचीत के बावजूद समझौता नहीं किया.  झामुमो ने अब 21 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए उम्मीदवारों की सूची भी जारी की है. एक सीट वामदलों के लिए छोड़ी गई. झामुमो प्रवक्ता मनोज पंडेय ने कहा हमलोग असम में पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ रहे हैं. हमलोग 21 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, क्योंकि हमारा जनाधार असम में है. हम लोगों ने पूरा प्रयास किया कि गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा जाए. मनोज पांडेय ने कहा कि चुनाव आयोग ने झामुमो को तीर-कमान का चुनाव चिह्न आवंटित किया है, क्योंकि तीर-कमान आदिवासी गौरव की गाथा से जुड़ा है. तीर-कमान के साथ आदिवासियों का जुड़ाव है और इसका फायदा हमें असम के विधानसभा में मिलेगा.

कांग्रेस का जवाब: बड़े दिल की अपील

दूसरी ओर कांग्रेस प्रवक्ता राकेश सिन्हा ने कहा हमलोगों ने प्रयास किया था कि एक साथ चुनाव लड़ें, लेकिन झामुमो को ये मंजूर नहीं था. उन्होंने पहले से ही 19 सीटों का मन बना लिया था तो वो लड़ें, पर असम में कांग्रेस मजबूत है. कांग्रेस ने कहा कि झामुमो को थोड़ा बड़ा दिल दिखाना चाहिए था. असम कांग्रेस प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और अध्यक्ष गौरव गोगोई रांची आए थे. हेमंत सोरेन दिल्ली जाकर कांग्रेस हाईकमान से मिले, लेकिन सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बनी.

भाजपा का तंज-शून्य बटा सन्नाटा

भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कांग्रेस-झामुमो गठबंधन पर तंज कसते हुए कहा इनका गठबंधन शून्य बटा सन्नाटा है. कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को हमेशा धोखा ही दिया है. भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस हमेशा क्षेत्रीय दलों के साथ विश्वासघात करती आई है. यह बयान इंडिया ब्लॉक की कमजोरी को उजागर करता है.  सत्ताधारी गठबंधन के बीच इस टूट को बीजेपी ने कमजोरी के रूप में पेश किया है और आरोप लगाया है कि कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ रखने में असफल रही है.

हेमंत सोरेन का दिल्ली दौरा और नई अटकलें

दरअसल, जानकारों की नजर में  भाजपा इस मौके का इस्तेमाल विपक्षी एकता पर सवाल उठाने और अपनी स्थिति मजबूत दिखाने के लिए कर रही है. बीते दिनों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन दिल्ली गए. असम चुनाव रणनीति पर कांग्रेस नेतृत्व से मुलाकात हुई. लेकिन गठबंधन टूटने के बाद अब भाजपा-झामुमो नजदीकी की चर्चाएं तेज हो गई हैं. कुछ नेता मान रहे हैं कि दिल्ली दौरा केवल असम तक सीमित नहीं था. झारखंड में भाजपा के साथ सॉफ्ट कॉर्नर की अटकलें बढ़ रही हैं.

झारखंड पर संभावित असर: राजसभा चुनाव में तनाव

यही सवाल इस पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू है. झारखंड में झामुमो और कांग्रेस की सरकार गठबंधन के सहारे चल रही है, ऐसे में असम में दरार का असर यहां के रिश्तों पर पड़ सकता है. हालांकि, फिलहाल दोनों दल झारखंड में सरकार को लेकर कोई सार्वजनिक मतभेद नहीं दिखा रहे हैं, लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं भरोसे को कमजोर जरूर करती हैं.  जानकार कहते हैं कि  हेमंत सोरेन की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और झामुमो का विस्तार असम से शुरू हो रहा है. अगर झामुमो अकेले सफल हुई तो झारखंड में कांग्रेस पर दबाव बढ़ेगा.

आदिवासी वोट और राष्ट्रीय विस्तार

झामुमो असम की 21 सीटों पर फोकस कर रही है और यह चाय बागान आदिवासी समुदाय को साधने की रणनीति है. खास बात यह है कि  तीर-कमान चिह्न आदिवासी गौरव का प्रतीक है और पार्टी का मानना है कि झारखंड के अनुभव से असम में फायदा होगा. यह कदम झामुमो को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की दिशा में है. लेकिन कांग्रेस के साथ दरार विपक्षी एकता को कमजोर कर रही है. यह रणनीति बताती है कि झामुमो सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देना चाहता है.

कांग्रेस-जेमएम रिश्तों में ‘अंडरकरंट’

बहरहाल, झारखंड में भले ही गठबंधन कायम है, लेकिन अंदरखाने खींचतान की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं. असम की घटना ने इन अटकलों को और बल दिया है कि दोनों दलों के बीच तालमेल पहले जैसा सहज नहीं रहा. खासकर तब, जब झामुमो अपनी स्वतंत्र पहचान को मजबूत करने में जुटा है. कुुछ जानकारों का मानना है कि असम में अगर पार्टी को अपेक्षित सफलता मिलती है, तो वह भविष्य में अन्य राज्यों और यहां तक कि झारखंड में भी अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है.

झारखंड राजनीति में नया समीकरण

दरअसल, असम में कांग्रेस-झामुमो दरार महागठबंधन के लिए चेतावनी है. जानकारों की नजर में असम में कांग्रेस और झामुमो के बीच आई दरार फिलहाल क्षेत्रीय मुद्दा लग सकती है, लेकिन इसके राजनीतिक संकेत व्यापक हैं. यह घटना न केवल विपक्षी गठबंधन के अंदरखाने की चुनौतियों को उजागर करती है, बल्कि झारखंड की राजनीति में संभावित बदलाव की आहट भी देती है. अब यह देखना अहम होगा कि क्या यह दरार केवल असम तक सीमित रहती है या आने वाले समय में झारखंड के सत्ता समीकरणों को भी प्रभावित करती है.



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