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ईरान के बाद होर्मुज में US ने जड़ा ताला, नई घेरेबंदी से बिगड़ा LPG का खेल, क्‍या भारत झेल पाएगा यह नया संकट?

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Strait of Hormuz New Crisis: पाकिस्तान में वही हुआ, जिसकी सभी को उम्‍मीद थी. इस्लामाबाद में 21 घंटे चली अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी समझौते के खत्‍म हो गई है. नाराज अमेरिका ने स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज में नेवल ब्‍लॉकेड करने की बात कर दी है. साथ ही, अमेरिका ने यह भी साफ कर दिया है कि ईरान को टोल देकर स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाज अब उसके निशाने पर होंगे. यानी स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अब एक तरफ कुएं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति होगी.

नई परिस्थितियों को देखकर तो यही लगता है कि जिन देशों के जहाज ईरान को टोल देंगे, उनको अमेरिका निशाना बनाएगा. वहीं, जो अमेरिका को टोल देकर स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरना चाहेगा, उन्‍हें ईरान निशाना बनाएगा. यानी, आने वाले दिनों में स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज से एलपीजी और पेट्रोलियम से भरे जहाजों के गुजरने पर पूरी तरह से लगाम लगने वाला है. हां, एक विकल्‍प है कि अमेरिका और ईरान दोनों को टोल भरकर वहां से बाहर निकलने की कोशिश करें. लेकिन, यह आसान नहीं होगा.

भारत की रसोई पर कितना पड़ेगा नई परिस्थिति का असर?

वार्ता फेल होने, अमेरिका के नए ऐलान और इन नई आशंकाओं ने ग्‍लोबल एनर्जी मार्किट की बेचैनी काफी बढ़ा दी है. सभी को पता है कि दुनिया का करीब 20% ऑयल और भारी तादाद में एलपीजी स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्‍ते से गुजर कर उन तक पहुंचती हैं. ऐसे में, ऑयल और एलपीजी को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ना लाजमी है. इन सभी परिस्थितियों के बीच भारत की बात करें तो 33 करोड़ एलपीजी उपभोक्‍ताओं की जरूरत का 60 फीसदी हिस्‍सा विदेशों से आयात होकर आता है.

इनमें से करीब 85 से 90 फीसदी सप्लाई होर्मुज के रास्‍ते कतर, संयुक्‍त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, कुवैत और ओमान से भारत आती है. आपको बता दें कि भारत कुवैत से करीब 30 से 34 फीसदी, यूएई से 25 से 26 फीसदी, सऊदी अरब से 15 से 25 फीसदी, कुवैत से 8 से 10 फीसदी और थोड़ी मात्रा में ओमान से आयात करता है. ऐसे में, स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह की स्थित बने, उसका असर भारत की हर उस रसोई पर जरूर पड़ेगा, जहां खाना एलपीजी गैस से बनता है.

  1. क्‍यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: पर्शियन गल्फ को ओपन ओशन से जोड़ने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दुनिया का सबसे क्रिटिकल एनर्जी कॉरिडोर माना जाता है. भारत की एलपीजी जरूरत का करीब दो तिहाई हिस्‍सा इसी रूट से गुजरता है. ऐसे में, यहां पर यूएस और ईरान का ब्लॉकेड होता है, तो सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी. साथ ही, इसका सीधा असर खाड़ी देशों से आयात होकर आने वाली एलपीजी गैस पर भी जरूर पड़ेगा.
  2. भारत की एलपीजी पर निर्भरता: भारत अपनी कुल जरूरत की करीब 40 फीसदी एलपीजी का घरेलू उत्‍पादन करती है, जबकि करीब 60 फीसदी हिस्‍सा विदेशों से इंपोर्ट किया जाता है. इसमें से करीब 85 से 90 फीसदी सप्लाई खाड़ी देशों से आती है, जबकि 10 से 15 फीसदी हिस्‍सा अमेरिका, ऑस्‍ट्रेलिया और अल्‍जीरिया से मंगाया जाता है. हाल के महीनों में रिफाइनरीज ने अपना प्रोडक्शन बढ़ाया है, लेकिन फिलहाल वह देश की कुल जरूरत पूरी करने में सक्षम नहीं हैं.
  3. हालात संभालने के लिए सरकारी कदम: बीते कुछ महीनों में पैदा हुए हालातों को भांपते हुए सरकार ने घरेलू रिफाइनरीज का प्रोडक्शन बढ़ाने पर जोर दिया है. आईओसीएल, बीपीसीएल, और एचपीसीएल ने मिलकर एलपीजी का अपना उत्‍पादन करीब 25 से 30 फीसदी तक बढ़ाया है. साथ ही, सरकार होर्डिंग और ब्लैक मार्केटिंग करने वालों पर अब सख्‍त कार्रवाई कर रही है. लगातार इसेन्शियल कमोडिटी एक्‍ट के तहत छापेमारी भी हो रही है.
  4. एलपीजी की जगह ले सकती है यह गैस: एलपीजी की किल्‍लत को देखते हुए सरकान ने अपना फोकस पीएनजी शिफ्ट कर दिया है. यह घरेलू गैस फील्ड्स से आता है और इंपोर्ट पर निर्भर नहीं है. सरकर ने उन उपभोक्‍ताओं की भी पहचान कर रही है, जिसके पास एलपीजी और पीएनजी कनेक्‍शन दोनों हैं. सरकार ने हाल में मोबाइल मैजेस जारी कर ऐसे उपभोक्‍ताओं से अपने एलपीजी कनेक्‍शन सरेंडर करने के कहा है. इस तरह, सरकार कई मोर्चो पर काम कर सप्‍लाई को स्‍टेबल करने की कोशिश कर रही है.
  5. खाडी देशों के विकल्‍प की तलाश: भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहती है. उसने अमेरिका, रूस, नॉर्वे और कनाडा से एलपीजी आयात करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. भारत सरकार ने हाल में कुछ नए टर्म कॉन्ट्रैक्ट साइन किए गए हैं. सरकार के इस कदम से आने वाले समय में होर्मुज पर निर्भरता को कम करेगी.

नई परिस्थितियों के बाद एलपीजी उपभोक्‍ताओं के मन में कौंध रहे सवाल

क्या मेरे घर का एलपीजी सिलेंडर समय पर मिलेगा?
फिलहाल सरकार का स्पष्ट किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं उनकी टॉप प्रायोरिटी इसका सीधा मतलब है कि जो गैस उपलब्ध है, उसे पहले घरों तक पहुंचाया जाएगा. हालांकि कुछ शहरों में डिलीवरी में देरी और बुकिंग गैप बढ़ने की शिकायतें आ रही हैं. इसका बड़ा कारण सप्लाई चेन पर दबाव और हालात से घबराकर की जा रही एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग भी है. अगर उपभोक्‍ता जरूरत के अनुसार बुकिंग करते हैं और अनावश्यक स्टॉक नहीं करते, तो आपको गैस मिलने में बड़ी समस्या नहीं होगी.

क्या आगे आने वाले समय में एलपीजी सिलेंडर की कीमतें और बढ़ेंगी?
एक्‍सपर्ट्स का मानना है कि इंटरनेशनल मार्केट में कीमतें बढ़ने का असर भारत पर भी पड़ेगा. हालांकि फिलहाल सरकार सब्सिडी और टैक्स कटौती के जरिए कीमतों को नियंत्रित में रखने की कोशिश कर रही है. घरेलू सिलेंडर की कीमत स्थिर रखी गई है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडर कुछ महंगे हुए हैं. अगर संकट लंबा चलता है, तो कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है. लेकिन सरकार का प्रयास यही रहेगा कि आम आदमी पर सीधा बोझ कम से कम पड़े.

यह संकट अभी कितने समय तक चल सकता है?
एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, यह पूरी तरह अमेरिका-ईरान जियोपॉलिटिकल सिचुएशन पर निर्भर करता है. अगर तनाव जल्दी कम होता है, तो सप्लाई सामान्य हो सकती है. लेकिन अगर होर्मुज पर टेंशन बना रहता है, तो इसका असर जरूर देखने को मिलेगा. भारत सरकार आयात के नए विकल्‍प खोजने के साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाकर इस संकट को कम करने की कोशिश कर रही है. फिलहाल, हालात पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है.



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