ईरान पर बमबारी के वक्त बनाई दूरी, ट्रंप के ‘शांति’ संकेत देते ही एक्टिव हुआ भारत, जयशंकर-रूबियो की सीधी बात

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ट्रंप के ‘शांति’ संकेत देते ही एक्टिव हुआ भारत, जयशंकर-रूबियो की सीधी बात

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अमेरिका ईरान तनाव के बीच भारत ने दूरी रखकर संतुलन साधा, अब Donald Trump की डील घोषणा के बाद Dr. S. Jaishankar और Marco Rubio के बीच फोन पर बातचीत हुई है. इसे भारत की एनर्जी स‍िक्योर‍िटी को लेकर अहम बताया जा रहा है.

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जयशंकर और रुबियो की फोन बातचीत हुई. (फाइल फोटो PTI)

जब तक अमेरिका और इजराइल की सेनाएं ईरान पर ताबड़तोड़ बमबारी कर रही थीं और वाशिंगटन से लगातार सैन्य धमकियां दी जा रही थीं, तब तक नई दिल्ली ने जानबूझकर अमेरिका की इस आक्रामक सैन्य मुहिम से एक सुरक्षित कूटनीतिक दूरी बनाए रखी. लेकिन, जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ ‘शानदार बातचीत’ और डील का ऐलान किया, भारत ने अपने शीर्ष कूटनीतिक चैनल खोल दिए और अमेरिका के साथ सीधी वार्ता की मेज पर आ गया.

सोमवार शाम विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई. ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू होने के बाद से पश्चिम एशिया के इस गंभीर संकट पर दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों के बीच यह पहली सबसे बड़ी और सीधी बातचीत है. विदेश मंत्री जयशंकर ने खुद इस बातचीत की पुष्टि करते हुए बताया, आज शाम अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो से विस्तृत टेलीफोन पर बातचीत हुई. हमारी चर्चा पश्चिम एशिया के संघर्ष और उसके अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव पर केंद्रित रही. विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर भी बात हुई. संपर्क में बने रहने पर सहमति बनी है.

गोलीबारी के बीच भारत ने क्यों बनाई थी अमेरिका से दूरी?

इस कूटनीतिक टाइमिंग के पीछे भारत की एक बहुत सोची-समझी रणनीति काम कर रही है. जब अमेरिका ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचों को तबाह करने पर आमादा था, तब भारत ने वाशिंगटन के सुर में सुर मिलाने से परहेज किया. इसका सीधा कारण यह है कि ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं. भारत ईरान के चाबहार पोर्ट का संचालन कर रहा है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का ‘गेटवे’ है. इसके अलावा, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं. यदि भारत युद्ध के चरम पर अमेरिका का खुला समर्थन करता, तो क्षेत्र में उसके अपने हित खतरे में पड़ जाते. नई दिल्ली शुरू से ही कूटनीति और संवाद के जरिए तनाव कम करने का पक्षधर रहा है, न कि बमबारी का. इसलिए, जब तक युद्ध के बादल सबसे ज्यादा घने थे, भारत ने पेंटागन की युद्ध नीतियों से खुद को अलग रखा.

ट्रंप के ऐलान के बाद भारत का एक्टिव होना
लेकिन भू-राजनीति में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती. जैसे ही ट्रंप ने अपने 48 घंटे के सैन्य अल्टीमेटम को ठंडे बस्ते में डाला और यह घोषणा की कि ईरान के ‘सबसे सम्मानित’ नेताओं के साथ उनकी ‘प्रोडक्टिव’ चर्चा चल रही है, भारत ने तुरंत स्थिति को भांप लिया. नई दिल्ली समझ गई कि अब मिडिल ईस्ट में गोलियों की जगह कूटनीति की बिसात बिछने वाली है. ऐसे में भारत का अमेरिका के साथ सीधे संपर्क में आना बेहद जरूरी था ताकि युद्ध के बाद के किसी भी परिदृश्य या समझौते में भारत के आर्थिक और ऊर्जा हित सुरक्षित रह सकें.

ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे बड़ा फोकस
जयशंकर और रूबियो की इस बातचीत का केंद्र बिंदु ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था रहा, जो वर्तमान में सबसे ज्वलंत मुद्दा है. होर्मुज के बंद होने और बाल्टिक सागर में रूसी तेल टर्मिनल पर हमले के कारण वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचा हुआ है. कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और होर्मुज का बंद होना सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर हमला है.

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Gyanendra Mishra

Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for ‘Hindustan Times Group…और पढ़ें



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