ऑपरेशन ईगल क्लॉ, जब अमेरिकी सेना ईरान में बंधकों को छुड़ाने गई और खुद फंस गई

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ऑपरेशन ईगल क्लॉ: जब अमेरिकी सेना ईरान में बंधकों को छुड़ाने गई और खुद फंस गई

4 नवंबर 1979 को ईरान के चरमपंथी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया. उन्होंने 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया. बाद में कुछ को रिहा कर दिया गया, लेकिन 52 अमेरिकी बंधक 14 महीने तक कैद रहे. ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी इस संकट को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. कूटनीतिक बातचीत पूरी तरह नाकाम हो जाने के बाद राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने आखिरी विकल्प के रूप में सैन्य रेस्क्यू मिशन को मंजूरी दी.

मिशन की योजना
ऑपरेशन ईगल क्लॉ (जिसे ऑपरेशन राइस बाउल भी कहा जाता है) में अमेरिका की चारों सेनाओं ‘आर्मी, नेवी, एयर फोर्स और मरीन्स’ को शामिल किया गया. डेल्टा फोर्स के कमांडो बंधकों को छुड़ाने वाले थे. आर्मी रेंजर्स डेजर्ट वन नामक रेगिस्तानी जगह पर सुरक्षा और रिफ्यूलिंग का काम संभालने वाले थे. नेवी के आठ RH-53D सी स्टैलियन हेलीकॉप्टर यूएसएस निमित्ज़ विमानवाहक पोत से उड़ान भरने वाले थे. एयर फोर्स के छह C-130 हर्क्यूलिस विमान सैनिकों और ईंधन ले जाने वाले थे.

पूरी योजना यह थी कि रात में डेजर्ट वन पर पहुंचकर हेलीकॉप्टरों को ईंधन भरा जाए, फिर डेजर्ट टू नामक जगह पर जाकर कमांडो तेहरान के दूतावास पर हमला करें और बंधकों को छुड़ाकर पास के मंज़रियेह एयरबेस से बाहर निकाल लिया जाए. इस मिशन की तैयारी के लिए लगभग पांच महीने की गुप्त और कड़ी ट्रेनिंग की गई थी. राष्ट्रपति कार्टर ने 16 अप्रैल 1980 को इस योजना को अंतिम मंजूरी दी.

24 अप्रैल 1980 — मिशन की शुरुआत
24 अप्रैल 1980 की शाम को मिशन शुरू हुआ. छह C-130 विमान ओमान के मसिराह द्वीप से उड़े और आठ RH-53D हेलीकॉप्टर यूएसएस निमित्ज़ से लगभग 50 मील दूर से निकले. रास्ते में पहली समस्या तब आई जब हेलीकॉप्टर नंबर 6 में ब्लेड इंस्पेक्शन मेथड (BIM) चेतावनी लग गई. क्रू ने उसे रेगिस्तान में छोड़ दिया.

फिर ईरान के रेगिस्तान में भयंकर धूल का तूफान (हबूब) शुरू हो गया, जिससे दृश्यता लगभग शून्य हो गई. हेलीकॉप्टर नंबर 5 के इंस्ट्रूमेंट्स और नेविगेशन सिस्टम फेल हो गए. क्रू ने मिशन छोड़ दिया और वापस लौट गए. डेजर्ट वन पहुंचने तक केवल छह हेलीकॉप्टर ही बचे थे, और वे भी करीब 1.5 घंटे देरी से पहुंचे.

डेजर्ट वन पर हुई त्रासदी
डेजर्ट वन पर C-130 विमानों ने रिफ्यूलिंग शुरू की. वहां हेलीकॉप्टर नंबर 2 में हाइड्रॉलिक सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया, जिससे वह उड़ान के लिए अनुपयोगी हो गया. अब केवल पांच हेलीकॉप्टर ही पूरी तरह काम करने लायक बचे थे. मिशन कमांडरों ने फैसला लिया कि न्यूनतम छह हेलीकॉप्टर के बिना आगे बढ़ना बहुत खतरनाक होगा, इसलिए मिशन को रद्द (एबॉर्ट) कर दिया गया.

वापसी के दौरान हुआ घातक हादसा
जब बची हुई टीम वापस जाने की तैयारी कर रही थी, तो धूल के घने गुबार में एक RH-53D हेलीकॉप्टर पार्क किए हुए C-130 ट्रांसपोर्ट प्लेन से टकरा गया. दोनों विमानों में भरा ईंधन और गोला-बारूद तुरंत भड़क उठा. भयानक विस्फोट और आग लग गई. इस हादसे में 8 अमेरिकी सैनिक शहीद हो गए — 5 एयर फोर्स के क्रू मेंबर और 3 मरीन्स. कई अन्य घायल हुए.

परिणाम और बाद की स्थिति
मिशन पूरी तरह असफल रहा. कोई भी बंधक नहीं छुड़ा गया. बाकी हेलीकॉप्टर और बहुत सारा महंगा उपकरण डेजर्ट वन में छोड़कर टीम को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा. अगले दिन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने टीवी पर आकर पूरा दोष अपने ऊपर लिया.

बंधक और 270 दिन तक ईरान में कैद रहे. आखिरकार 20 जनवरी 1981 को (जब रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहे थे) अल्जीरिया के माध्यम से समझौता हुआ और सभी 52 बंधक आजाद हो सके.

सीख और प्रभाव
ऑपरेशन ईगल क्लॉ की इस असफलता ने अमेरिकी सैन्य तंत्र को बुरी तरह झकझोर दिया. अत्यधिक गोपनीयता (OPSEC), कमांड स्ट्रक्चर की कमी, हेलीकॉप्टरों की तकनीकी समस्याएं और मौसम की अनदेखी जैसी गलतियों से सीखते हुए बड़े सुधार किए गए. इसके बाद यूएस स्पेशल ऑपरेशंस कमांड (SOCOM) का गठन हुआ और जॉइंट स्पेशल ऑपरेशंस में क्रांतिकारी बदलाव आए. यह मिशन सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि यह याद दिलाता है कि कितनी भी सावधानी और प्लानिंग हो, युद्धक्षेत्र में छोटी-छोटी तकनीकी खराबी, मौसम या थोड़ी सी बदकिस्मती पूरे मिशन को तबाह कर सकती है.



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