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West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में दो चरणों में विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई है, लेकिन प्रदेश में SIR का तामझाम अभी तक खत्म नहीं हुआ है. अपात्र लोगों को वोटर लिस्ट से हटाने के लिए इस प्रक्रिया को शुरू किया गया है. इसका एक ओर उद्देश्य है – अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना. एक दिलचस्प घटनाक्रम के तहत कलकत्ता के एक पूर्व जज का नाम ही वोटर लिस्ट से काट दिया गया है. वे पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं.
पश्चिम बंगाल में अपात्र लोगों को वोटर लिस्ट से हटाने के लिए SIR अभियान चलाया गया. इसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जज का नाम ही वोटर लिस्ट से हटा दिया गया. (फाइल फोटो)
West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को दुरुस्त और अपडेट करने के लिए गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) चलाया गया. इसमें लाखों की संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट गया. त्रुटिवश किसी मतदाता का नाम यदि सूची से हटा दिया गया है तो अब उसे दुरुस्त करने का काम चल रहा है. इस दौरान एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है. कलकत्ता हाईकोर्ट के एक पूर्व जज का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का मामला सामने आया है. इससे कई तरह के गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं. यह हाल तब है, जब कुछ ही सप्ताह में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
जानकारी के अनुसार, कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) के पूर्व न्यायाधीश शाहिदुल्लाह मुंशी का नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने का मामला सामने आया है. मुंशी पूर्व जज होने के साथ ही पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं. यह कार्रवाई हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों की सुनवाई (एडजुडिकेशन) के बाद की गई है, जिससे प्रशासनिक प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं. मुंशी ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि उनका नाम तो हटा दिया गया, लेकिन उनकी पत्नी और बड़े बेटे का नाम अब भी ‘अंडर एडजुडिकेशन’ कैटेगरी में है. वहीं, उनके छोटे बेटे का नाम हाल ही में नए मतदाता के रूप में दर्ज हो चुका है और उसे EPIC नंबर भी मिल गया है. मुंशी ने बताया कि वह 2013 से 2020 तक हाईकोर्ट में जज रहे हैं और उन्होंने अपनी नागरिकता व पहचान से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज (जैसे पासपोर्ट, पैन कार्ड और 2002 की मतदाता सूची) सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए थे.
अधिकारी भी हैरान
जस्टिस (रिटायर्ड) मुंशी ने बताया कि उन्हें सुनवाई के लिए बुलाया गया था. उन्होंने कहा, ‘साल 2002 की मतदाता सूची में मेरा और मेरी पत्नी का नाम दर्ज था. यहां तक कि ERO (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) भी हैरान थे कि हमें सुनवाई के लिए क्यों बुलाया गया. उन्होंने आश्वासन दिया था कि नाम क्लियर हो जाएगा, लेकिन बाद में मामला एडजुडिकेशन में भेज दिया गया.’ राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के बाद 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी. इसके तहत 60 लाख से अधिक दावों को हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों के पास जांच के लिए भेजा गया. चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार अब तक करीब 32 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है, जिनमें से लगभग 35 से 40 प्रतिशत नामों को सूची से हटा दिया गया है.
अब आगे क्या?
‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस (रिटायर्ड) मुंशी ने कहा कि उन्हें अब इस फैसले के खिलाफ अपील करनी पड़ेगी और उन्हें यह भी नहीं बताया गया है कि उनका नाम किन कारणों से हटाया गया. उन्होंने यह भी जोड़ा कि पूरी प्रक्रिया जल्दबाजी में हुई है, जिसके कारण दस्तावेजों की ठीक से जांच नहीं हो सकी होगी. इस बीच टीएमसी ने Election Commission of India (ईसीआई) पर गंभीर आरोप लगाए हैं. पार्टी के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि चुनाव आयोग किसी भी तरह से भाजपा को जिताने में मदद कर रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग का उद्देश्य समावेशी प्रक्रिया सुनिश्चित करना होना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं.
भाजपा ने साधी चुप्पी
Bharatiya Janata Party (भाजपा) के वरिष्ठ नेता राहुल सिन्हा ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि इस पर केवल चुनाव आयोग ही जवाब दे सकता है. गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में 19 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए हैं, जहां ऐसे मामलों में अपील की जा सकती है. फिलहाल यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया, मतदाता सूची की शुद्धता और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें





