किसने सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को दी चुनौती? CJI सूर्यकांत हो गए आगबबूबला, 9 घंटे तक भूखे-प्यासे बंधक रहे जज

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बंगाल सबसे अधिक ध्रुवीकृत, न्यायिक अधिकारियों के घेराव की सीबीआई या एनआईए जांच कराएंःन्यायालय

नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल को ‘सबसे अधिक ध्रुवीकरण वाला राज्य’ बताते हुए, उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को मतदाता सूची संशोधन अभियान के दौरान मालदा जिले में सात न्यायिक अधिकारियों के घेराव और हमले पर प्रशासन की ‘पूर्ण विफलता’ और निष्क्रियता पर कड़ी नाराजगी जताई और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से जांच कराए जाने का निर्देश दिया. न्यायालय ने चुनावी राज्य में केंद्रीय बलों की तैनाती का भी निर्देश दिया. घटना की कड़ी निंदा करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह घटना ‘राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता को भी उजागर करती है’ और ‘न्यायिक अधिकारियों को धमकाने का न सिर्फ एक बेशर्म प्रयास’ था, बल्कि यह इस उच्चतम न्यायालय के अधिकार को चुनौती देने के बराबर भी था.

इसे ‘गैर-राजनीतिक विरोध’ बताने वाली दलीलों को खारिज करते हुए, प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह कोई ‘सामान्य घटना नहीं थी. बल्कि, यह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने का एक सुनियोजित और जानबूझकर किया गया कदम प्रतीत होता है.’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “अगर यह विरोध प्रदर्शन गैर-राजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर जाकर देखें कि क्या हो रहा है? क्या कोई कानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? शाम 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया और रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था.”

न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह राज्य में “पर्याप्त केंद्रीय बलों की मांग करे और उन्हें उन सभी स्थानों पर तैनात करे जहां मतदाता सूचियों की एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया के तहत न्यायिक अधिकारी आपत्तियों का निपटारा कर रहे हैं.” उन्होंने कहा, “निर्वाचन आयोग को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह कल की घटना की जांच/पड़ताल किसी स्वतंत्र एजेंसी यानी सीबीआई या एनआईए को सौंपे. अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए. जिस एजेंसी को जांच सौंपी जाएगी, वह सीधे इस न्यायालय में प्रारंभिक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए बाध्य होगी.”

एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से बाहर किए गए 60 लाख से अधिक लोगों की आपत्तियों के निस्तारण के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को चल रही एसआईआर प्रक्रिया में तैनात किया गया है. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तथा मालदा के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर यह बताने को कहा कि “कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से प्राप्त पत्र की सामग्री के आलोक में उनके खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई क्यों न की जाए.”

प्रधान न्यायाधीश ने इन सभी शीर्ष अधिकारियों को उस समय छह अप्रैल को डिजिटल माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया जब पीठ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से दायर याचिका समेत विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करेगी. पीठ ने कहा, “हम किसी को भी न्यायिक अधिकारियों में मनोवैज्ञानिक भय पैदा करने के लिए कानून अपने हाथ में लेने और हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देंगे. यह आपराधिक अवमानना के बराबर है. यह राज्य प्रशासन की विफलता को भी उजागर करता है. मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और पुलिस अधीक्षक ने जिस तरह से काम किया, वह बेहद निंदनीय है. उन्हें यह बताना होगा कि सूचित किए जाने के बावजूद उन्होंने कोई प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाया.’’

न्यायालय ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के उस पत्र का भी संज्ञान लिया जिसमें उस भयावह रात का ब्योरा दिया गया है जब तीन महिलाओं और पांच साल के एक बच्चे समेत न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे से अधिक समय तक लोगों की भीड़ ने बंधक बनाकर रखा तथा इस दौरान उन्हें भोजन एवं पानी तक नहीं मिला. आदेश के अनुसार, यह घटना मालदा जिले के कालियाचक इलाके में एसआईआर कवायद के दौरान हुई जब ‘असामाजिक तत्वों’ ने बुधवार को एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) कार्यालय में अपराह्न साढ़े तीन बजे से सात न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया.

मामले की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने ‘चौंकाने वाले’ घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि अपराह्न साढ़े तीन बजे घेराव शुरू हुआ और उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने तत्काल राज्य प्राधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी. उन्होंने कहा कि इसके बाद बार-बार गुहार लगाए जाने के बावजूद रात साढ़े आठ बजे तक राज्य के अधिकारियों की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई. आदेश में कहा गया, “बाद में रजिस्ट्रार जनरल ने गृह सचिव और डीजीपी से संपर्क किया… शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन दिया गया लेकिन अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की. न्यायिक अधिकारियों को भोजन और पानी तक उपलब्ध नहीं कराया गया.”

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने गृह सचिव एवं डीजीपी के साथ ‘ग्रुप कॉल’ के जरिए बात की. गृह सचिव और डीजीपी मुख्य न्यायाधीश के आवास पर पहुंचे और बंधक बनाए गए न्यायिक अधिकारियों को आधी रात के बाद छुड़ाया गया. प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को बचाए जाने के बाद भी उनके वाहनों पर पथराव किया गया और उन पर लाठियों तथा ईंटों से हमला किया गया. उन्होंने कहा, “यह देखकर हमें बेहद निराशा हुई कि मुख्य सचिव से संपर्क नहीं हो सका… उन्हें कोई संदेश नहीं पहुंचाया जा सका.”

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “रात 11 बजे तक आपका जिलाधिकारी वहां नहीं था. मुझे रात में बहुत कड़े मौखिक निर्देश देने पड़े.” कुछ वकीलों ने जब इस घटना को सामान्य विरोध प्रदर्शन करार देने की कोशिश की तो प्रधान न्यायाधीश ने कड़ी नाराजगी जताई. आदेश में कहा गया, “बुधवार की घटना न केवल न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने की सरेआम की गई कोशिश है, बल्कि यह इस न्यायालय के प्राधिकार को भी चुनौती देने के बराबर है. यह कोई सामान्य घटना नहीं है. प्रथम दृष्टया यह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए सुनियोजित तरीके से उठाया गया सोचा-समझा कदम है….’’

पीठ ने यह सुनिश्चित करने के लिए भी कई निर्देश जारी किए कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों के काम में कोई बाधा न आए और उन्हें यह भरोसा दिलाया जा सके कि उनके जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और परिवार के सदस्यों की सुरक्षा की जाएगी. पश्चिम बंगाल के महाधिवक्ता ने दलील दी कि इस मामले में निर्वाचन आयोग को विरोधी पक्ष की तरह काम नहीं करना चाहिए. इसके बाद प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “दुर्भाग्य से आपके राज्य में हर व्यक्ति राजनीतिक भाषा बोलता है और यह सबसे अधिक ध्रुवीकरण वाला राज्य है. आप हमें टिप्पणियां करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. क्या आपको लगता है कि हमें यह नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? मैं रात दो बजे तक हर चीज पर नजर रख रहा था. बहुत दुर्भाग्यपूर्ण.”



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