क्यों भारत में ही एयरपोर्ट से लेकर मेट्रो तक बॉडी टच कर रूटीन स‍िक्‍योर‍िटी चेक, और कही नहीं…पाकिस्तान, बांग्लादेश में भी नहीं

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भारत में एयरपोर्ट्स, मेट्रो, मॉल्स में तकरीबन हर किसी की जांच हाथ से टच करके यानि फ्रिस्किंग और मेटल डिटेक्टर दोनों के साथ होती है. ये काफी हाई-टच है. दूसरे देशों में ज्यादातर जगह सिर्फ बैग स्कैन या रैंडम चेक होता है. रोजाना हर किसी को टच करके चेक नहीं करते, अगर होता है तो केवल स्पेशल इवेंट्स, हाई अलर्ट या रैंडम में.

ये प्रक्रिया भारत में ज्यादा रूटीन और व्यापक है, लेकिन दुनिया में कहीं नहीं ऐसा नहीं है. कई देशों में जरूरत पड़ने पर फिजिकल फ्रिस्किंग होती है लेकिन ये रूटीन में नहीं होती, हर किसी को इससे नहीं गुजरना होता. शक के आधार पर कुछ मामलों में होती है.

आमतौर पर ज्यादातर देशों में प्राइमरी स्क्रीनिंग वॉक थ्रू मेटल डिटेक्ट, मिलीमीटर वेव बॉडी स्कैनर या एडवांस्ड सीटी स्कैनर से होती है. मैनुअल पैट-डाउन या फ्रिस्किंग केवल तब होती है जब मशीन में अलार्म या बीप बजे. रैंडम सेलेक्शन कभी कभार और बहुत कम फ्रीक्वेंसी पर होता है.

ज्यादातर यात्रियों को सिर्फ स्कैनर से गुजरना पड़ता है. फिजिकल टच बिल्कुल नहीं होता. कई यूरोपीय एयरपोर्ट्स पर शूज, बेल्ट उतारने की भी जरूरत नहीं पड़ती और पैट-डाउन बहुत रेयर है.

अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर फुल‑बॉडी स्कैनर पहले से ही व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनसे लगभग 2–3 सेकंड में शरीर की स्कैनिंग हो जाती है और फ्रिक्सिंग की ज़रूरत कम हो जाती है. (AI News18 Image)

अमेरिका और इजरायल में भी नहीं होता

अमेरिका में पैट-डाउन मुख्य रूप से अलार्म या रैंडम पर होता है. यहां हर किसी को नहीं छूते. केवल 2-5% मामलों या उससे भी कम में ये प्रक्रिया होती है लेकिन जब होती है, तो काफी डिटेल्ड इनवेसिव हो सकती है. यूरोप में ज्यादातर देशों में कम फिजिकल चेक है. स्कैनर से काम चल जाता है, पैट-डाउन सिर्फ जरूरत पर होता है.

इजरायल में चेकिंग बहुत सख्त है लेकिन वहाँ भी रूटीन फ्रिस्किंग नहीं बल्कि इंटेलिजेंस-बेस्ड और क्वेश्चनिंग ज्यादा है. लंदन ट्यूब, न्यूयॉर्क सबवे, दुबई मॉल्स में ज्यादातर सिर्फ बैग स्कैन या रैंडम चेक से लोगों को जाने दिया जाता है. रोजाना हर किसी को टच नहीं करते.

क्या होता है पैट-डाउन

पैट-डाउन सिक्योरिटी चेकिंग का एक तरीका है, जिसमें सुरक्षा अधिकारी हाथों से यात्री के कपड़ों के ऊपर से शरीर को टच करके चेक करते हैं कि कहीं कोई छिपा हुआ खतरनाक सामान जैसे हथियार, विस्फोटक या प्रतिबंधात्मक सामान तो नहीं है. साधारण भाषा में समझें तो ये मैनुअल फ्रिस्किंग या हाथ से तलाशी का ही एक रूप है. अधिकारी आमतौर पर सामने वाले हाथ से सामान्य जगहों जैसे पीठ, बाजू, टांगों पर दबाव डालकर चेक करते हैं. संवेदनशील जगहों जैसे कमर का निचला हिस्सा, छाती आदि पर हाथ के पिछले हिस्से से चेक किया जाता है, ताकि ज्यादा असुविधा न हो.

भारतीय बड़े हवाई अड्डों पर अभी भी हैंड‑हेल्ड मेटल डिटेक्टर और पैट‑डाउन फ्रिक्सिंग आम है. (AI News18 Image)

एयरपोर्ट सिक्योरिटी में पैट-डाउन कब होता है?

दुनिया के ज्यादातर देशों ये तब होता है जबकि वॉक-थ्रू मेटल डिटेक्टर या बॉडी स्कैनर में अलार्म बजे. रैंडम चेक या कोई संदेह हो. भारत में सीआईएसएफ पर एयरपोर्ट और मेट्रो में लोगों की जांच का जिम्मा होता है. वो ज्यादातर रूटीन में हर यात्री पर हाथ से फ्रिस्किंग और हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर दोनों अप्लाई करते हैं. इसे आम भाषा में “फ्रिस्किंग” कहते हैं, जो पैट-डाउन का ही हिस्सा है. ये प्रक्रिया कई लोगों को असुविधाजनक लगती है, लेकिन भारत में सुरक्षा के लिए इसे जरूरी माना जाता है.

क्यों भारत में ऐसा ज्यादा है?

क्योंकि बड़े पैमाने पर पैसेंजर्स होते हैं. आतंकवादी हमलों का इतिहास रहा है. सीआईएसएफ का इस मामले में स्पष्ट प्रोटोकॉल है – सुरक्षा को प्राथमिकता, भले थोड़ा समय ज्यादा लगे.

क्या बदलाव आ रहा है

अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है: कई एयरपोर्ट्स पर नए फुल-बॉडी स्कैनर लग रहे हैं, जो फ्रिस्किंग टाइम 50% तक कम कर सकते हैं लेकिन इसमें अभी बहुत समय लगेगा. लिहाजा ये भारत में रूटीन और यूनिवर्सल है बाकी दुनिया में कंडीशनल और रेयर.

पाकिस्तान और बांग्लादेश में एयरपोर्ट सिक्योरिटी चेकिंग का तरीका भारत से काफी अलग है. (AI News18 Image)

पाकिस्तान और बांग्लादेश में क्या होता है

पाकिस्तान और बांग्लादेश में एयरपोर्ट सिक्योरिटी चेकिंग का तरीका भारत से काफी अलग है. यहां भारत जितना रूटीन और हर यात्री पर मैनुअल फ्रिस्किंग नहीं करते.पाकिस्तान में एयरपोर्ट्स पर चेकिंग एयरपोर्ट सेक्युरिटी फोर्स करती है. ये प्राइमरी स्क्रीनिंग वॉक-थ्रू मेटल डिटेक्टर, हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर और एक्स -रे स्कैनिंग से करती है.

मैनुअल फ्रीस्किंग रूटीन में हर यात्री के साथ नहीं होती. ज्यादातर मामलों में अगर मशीन में अलार्म याबीप बजे या कोई संदेह हो तो सेम जेंडर अफसर द्वारा पैट-डाउन या बॉडी सर्च की जाती है. भारत की तरह हर पैसेंजर को हाथ से फ्रिस्क नहीं करते. फिजिकल टच कंडीशनल है. हाई-रिस्क या इंटरनेशनल फ्लाइट्स पर ज्यादा सख्ती हो सकती है, लेकिन रूटीन यूनिवर्सल फ्रिस्किंग नहीं होती है.

बांग्लादेश में प्राइमरी स्क्रीनिंग मेटल डिटेक्टर, X-रे बैग स्कैन से होती है. हाल के वर्षों में फुल-बॉडी स्कैनर लगाए गए हैं, जो 2020 से इस्तेमाल में हैं. ये स्कैनर बॉडी पर या अंदर छिपी चीजें डिटेक्ट करते हैं. मैनुअल फ्रिस्किंग रूटीन में बिल्कुल नहीं होती अगर स्कैनर में कुछ संदिग्ध दिखे, अलार्म बजे, हाई-रिस्क बैगेज हो तो ही मैनुअल चेक होती है. फुल-बॉडी स्कैनर से फिजिकल टच कम करने की कोशिश होती है. ये दोनों देश हाई थ्रेट एनवायरनमेंट में हैं लेकिन तकनीक ज्यादा यूज करते हैं ताकि फिजिकल चेक कम हो.

वियतनाम में चेकिंग सेकेंडों में

एशिया के वियतनाम जैसे देश में तो सेक्युरिटी चेक बहुत तेजी से होता है. उसने हाल के सालों में बायोमेट्रिक्स और ऑटोमेटेड गेट्स जैसे फेशियल रिकग्निशन को बहुत तेज़ी से अपनाया है. आप यकीन करेंगे वियतनाम के तकरीबन सभी इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स पर सिक्योरिटी चेक अब 1-3 सेकंड में हो जाता है. कई साउथईस्ट एशियन देशों जैसे थाईलैंड, सिंगापुर, मलेशिया में टेक्नोलॉजी पर भरोसा. फिजिकल चेक बहुत दुर्लभ है.

एशिया के वियतनाम, थाईलैंड, सिंगापुर जैसे देशों में तो इंटरनेशनल एय़रपोर्ट्स पर सेक्युरिटी चेक बहुत तेजी से होता है. उसने हाल के सालों में बायोमेट्रिक्स और ऑटोमेटेड गेट्स जैसे फेशियल रिकग्निशन को बहुत तेज़ी से अपनाया है. (AI News18 Image)

भारत में कब से रूटीन मैनुअल फ्रिस्किंग

भारत में एयरपोर्ट्स पर हर यात्री की रूटीन मैनुअल फ्रिस्किंग की परंपरा मुख्य रूप से 2000 के दशक की शुरुआत से मजबूत हुई, खासकर सीआईएसएफ के एयरपोर्ट सिक्योरिटी में शामिल होने के बाद. 1990 के दशक तक एयरपोर्ट सिक्योरिटी राज्य पुलिस या एयरपोर्ट अथॉरिटी के हाथ में थी. चेकिंग बेसिक थी यानि मेटल डिटेक्टर, X-रे के जरिए. रूटीन में हर यात्री पर हाथ से फ्रिस्किंग नहीं थी. यह ज्यादा संदिग्ध मामलों या हाई-रिस्क पर होती थी.

लेकिन 1999-2000 एक तरह से टर्निंग पॉइंट था. इंडियन एय़रलाइंस IC-814 का हाईजैक बड़ा झटका था. इससे एविएशन सिक्योरिटी में बड़े बदलाव आए. सरकार ने 7 जनवरी 2000 को फैसला लिया कि सभी सिविल एयरपोर्ट्स की सिक्योरिटी सीआईएसएफ को सौंपी जाए. उसने प्रोटोकॉल में 100% मैनुअल पैट-डाउन और फ्रिस्किंग को रूटीन बनाया, बेशक मेटल डिटेक्टर में बीप न बजे. तब से ही ये स्टैंडर्ड बना हुआ है.



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