खादी, वॉल पेंटिंग और पश्मीना… जानिए जम्मू-कश्मीर की प्राचीन कलाओं को कैसे मिल रही नई ‘संजीवनी’

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खादी, वॉल पेंटिंग, पश्मीना… जम्मू-कश्मीर की प्राचीन कलाओं को मिल रही संजीवनी

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जम्मू क्षेत्र के मंदिरों, महलों और हवेलियों पर उकेरी जाने वाली प्राचीन दीवार चित्रकला अब युवा कलाकारों के जरिए आधुनिक मंचों पर पहुंच रही है. ‘वोकल फॉर लोकल’ ने लोगों में इस कला के प्रति जबरदस्त जागरूकता पैदा की है. पीढ़ियों से चली आ रही पश्मीना बुनाई को नया बाजार मिल गया है.

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‘वोकल फॉर लोकल’ के कमाल से कश्मीरी पश्मीना शॉल विदेश तक पहुंच गई है. (फाइल फोटो)

जम्मू. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘वोकल फॉर लोकल’ मुहिम ने जम्मू के कश्मीरी पश्मीना शॉल बनाने वाले बुनकरों के जीवन में काफी बदलाव लाया है. बुनकरों का दावा है कि जब से पीएम मोदी ने देशवासियों से लोकल चीजों की खरीदारी करने का आह्वान किया है, तब से लोगों की रुचि बढ़ी है.

केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं और पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने की नीतियों के चलते जम्मू क्षेत्र में कला और हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों को नया अवसर मिल रहा है. स्थानीय स्तर पर कलाकार और बुनकर अपने पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार से जोड़ते हुए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. दीवार चित्रकला, खादी आधारित कपास और पश्मीना बुनाई जैसे पारंपरिक काम नए स्वरूप में उभर रहे हैं.

पश्मीना बुनाई जम्मू-कश्मीर की एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हस्तशिल्प परंपरा है, जिसे कई परिवार पीढ़ियों से आगे बढ़ा रहे हैं. यह बेहद महीन ऊन से तैयार की जाती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी बड़ी मांग है. स्थानीय बुनकर इस पारंपरिक कला को बनाए रखते हुए आज स्वयं उद्यमी बन रहे हैं और अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा रहे हैं.

बुनकर राजिंदर कुमार ने बताया कि वे पश्मीना शॉल बनाते हैं. इसमें 10 लोग साथ में मिलकर काम करते हैं. हमें बहुत खुशी मिलती है, जब पीएम कभी-कभी अपने संबोधन में पश्मीना शॉल का जिक्र करते हैं. आज हमारा पश्मीना शॉल सिर्फ भारत तक ही नहीं, विदेश में भी धूम मचा रहा है. उन्होंने कहा कि पहले मार्केटिंग की वजह से समस्या होती थी, लेकिन पीएम मोदी की अपील से रास्ता काफी आसान हो गया है. व्यापार को बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से भी मदद मिलती है.

जम्मू क्षेत्र में दीवार चित्रकला एक प्राचीन कला परंपरा रही है, जो मंदिरों, पुराने महलों और हवेलियों की दीवारों पर देखने को मिलती है. इन चित्रों में धार्मिक कथाएं, स्थानीय लोककथाएं और आम लोगों के जीवन से जुड़े दृश्य दर्शाए जाते हैं. आज यह पारंपरिक कला नए कलाकारों और शोधकर्ताओं के माध्यम से फिर से जीवंत हो रही है. फाइन आर्ट्स और म्यूजियोलॉजी के क्षेत्र से जुड़े युवा कलाकार इस कला को संरक्षित करने के साथ-साथ इसे आधुनिक मंच भी दे रहे हैं.

कलाकार बिराजा बारिक ने बताया कि पीएम मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ मुहिम के बाद से लोग जागरूक हुए हैं और वॉल पेंटिंग के प्रति जागरूकता बढ़ी है. जम्मू क्षेत्र में खादी और हैंडलूम उद्योग भी पारंपरिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है. यहां हाथ से काता और बुना गया कपास पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ स्थानीय कारीगरों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है. खादी और हैंडलूम विभाग की पहल से कारीगरों को प्रशिक्षण, उपकरण और बाजार तक पहुंच मिल रही है, जिससे यह पारंपरिक उद्योग नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहा है.

कारीगरों का कहना है कि सरकारी प्रोत्साहन और योजनाओं के माध्यम से उन्हें अपने काम को आगे बढ़ाने का अवसर मिला है. इससे न केवल पारंपरिक कला और शिल्प को संरक्षण मिल रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं.

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Rakesh Ranjan Kumar

राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें



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