यह कहानी 21 साल पहले की उस रात की है जब बिहार के जहानाबाद में कानून की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह गई थीं. यह सिर्फ एक कांड भर नहीं नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य सत्ता को माओवादियों की एक खुली चुनौती थी. नक्सलियों के दुस्साहस की यह काली कहानी वर्ष 2005 में लिखी गई, तारीख थी 13 नवंबर. तब फरवरी में बिहार की सरकार के बहुमत साबित नहीं करने के बाद लगे राष्ट्रपति शासन के दौरान बिहार में उस वर्ष दूसरी बार विधानसभा चुनाव का माहौल था. राज्य की कमान राजभवन (राष्ट्रपति शासन) के हाथ में थी. रात के करीब 9 बज रहे थे, तभी अचानक बिहार की राजधानी पटना से महज 50 किलोमीटर दूर जहानाबाद शहर की शांत गलियों में गोलियों की गूंज सुनाई देने लगी. करीब 1,000 की संख्या में वर्दीधारी नक्सली शहर में प्रवेश कर चुके थे, जिनमें महिला कैडर भी शामिल थीं.
चारों दिशाओं से शहर में दाखिल हुए बड़ी संख्या में नक्सलियों ने एक सधी हुई सैन्य रणनीति के तहत सबसे पहले शहर के पावर हाउस पर कब्जा कर बिजली काट दी. पूरा शहर अंधेरे में डूब गया. इसके बाद उन्होंने पुलिस लाइन और सीआरपीएफ कैंप को निशाना बनाया ताकि सुरक्षा बल जेल की ओर न बढ़ सकें.
‘ऑपरेशन जेल ब्रेक’ और मास्टरमाइंड का मिशन
इस पूरे हमले का एक ही मकसद था- अपने सबसे बड़े कमांडर अजय कानू को आजाद कराना. अजय कानू उस समय माओवादियों का वैचारिक और सैन्य स्तंभ माना जाता था. जेल के भीतर बंद कानू को पता था कि बाहर उसके साथी आ चुके हैं. जैसे ही हमला शुरू हुआ, जेल के संतरी और कर्मचारी अपनी जान बचाकर भागने लगे. नक्सलियों ने जेल के गेट को डायनामाइट से उड़ा दिया. “नक्सलवाद जिंदाबाद” के नारों के बीच हमलावर भीतर घुसे और सीधे उस सेल की ओर बढ़े जहां अजय कानू बंद था. फिर तो कुछ ही मिनटों में कानू सलाखों से बाहर था.
घटना में शामिल माओवादी कार्यकर्ताओं की तस्वीर (फाइल फोटो)
जेल के भीतर ‘अदालत’ और नरसंहार
नक्सली सिर्फ अपने साथियों को छुड़ाने नहीं आए थे, वे ‘बदला’ लेने भी आए थे. उस समय बिहार के मैदानी इलाकों में नक्सलियों और सामान्य वर्ग की जातियों की प्राइवेट आर्मी ‘रणवीर सेना’ के बीच खूनी जंग चलती थी. जेल के भीतर ही नक्सलियों ने एक खौफनाक ‘जन अदालत’ लगाई. उन्होंने टॉर्च की रोशनी में रणवीर सेना के कैदियों की पहचान की. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, रणवीर सेना के नेता बदे शर्मा सहित करीब 12 लोगों को सेल से खींचकर बाहर निकाला गया और वहीं मौत के घाट उतार दिया गया. इसके बाद कुछ रणवीर सेना सदस्यों को अगवा कर बाद में मार दिया गया. फिर पुलिस लाइन से हथियार और गोला-बारूद लूट लिया गया. यह संविधान और कानून को धता बताते हुए हिंसक तरीके बदला लेने का उनका अपना तरीका था.
389 कैदी और गायब हुआ शहर
जानकार बताते हैं कि हमला करीब 2-3 घंटे चला. लगभग दो घंटे तक जहानाबाद शहर नक्सलियों के कब्जे में रहा. पूरा शहर दहशत में था, राजधानी पटना तक डर का आलम बन गया था. सत्ता के गलियारों में नेताओं और अफसरों के हलक सूखे थे और माथे पर पसीने थे. देश के सबसे बड़े जेल ब्रेक कांड को अंजाम देने के बाद जब नक्सली वापस लौटे, तो उनके साथ 389 कैदी भी फरार हो चुके थे. यह भारत के इतिहास का सबसे खतरनाक जेल ब्रेक था. अगली सुबह जब सूरज उगा, तो जेल के दरवाजे खुले थे, दीवारें टूटी थीं और सड़कों पर सिर्फ खोखे और खून के धब्बे थे. नक्सलियों ने जाते-जाते जेल के शस्त्रागार से भारी मात्रा में राइफलें और कारतूस भी लूट लिए थे, जिससे सुरक्षा बलों का मनोबल पूरी तरह टूट गया था.
जहानाबाद जेल पर नक्सली हमले के बाद पुलिस और CRPF की तैनाती (फाइल फोटो)
सूत्रधार कौन?
बताया जाता है कि इस कांड का मुख्य सूत्रधार यानी मास्टरमाइंड अजय कानू खुद जेल में बंद था. लेकिन, पुलिस का आरोप था कि उसने मोबाइल फोन और संदेशों से बाहर वाले साथियों से संपर्क बनाए रखा और पूरा प्लान तैयार किया. हमले के दौरान उसे AK-47 थमाया गया और आरोप के अनुसार उसने रणवीर सेना के नेता बड़े शर्मा की हत्या में भूमिका निभाई. बता दें कि अजय कानून CPI(Maoist) की PLGA यूनिट से जुड़े बताया गया. हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में प्रद्युम्न शर्मा का भी जिक्र मिलता है, लेकिन अजय कानू को सबसे प्रमुख माना जाता है.
घटना के तुरंत बाद की तस्वीर, जहां सुरक्षा बल जेल की दीवारों की रखवाली कर रहे हैं. (फाइल फोटो)
फिर हुआ क्या?
दरअसल, बिहार में राष्ट्रपति शासन और विधानसभा चुनाव चल रहे थे, इसलिए पुलिस की तैनाती कम थी. इसके बाद जहानाबाद SP सुनील कुमार को सस्पेंड किया गया और केंद्र सरकार ने NSG कमांडो और हजारों पैरामिलिट्री जवानों को भेजा. इसकी बाद जातीय हिंसा की आशंका और बढ़ गई, रणवीर सेना ने बदला लेने की धमकी दी, हालांकि बड़े पैमाने पर हिंसा नहीं हुई. यहां यह भी बता दें कि 140 कैदियों की क्षमता वाले जेल में 659 कैदी थे. घटना के दौरान फरार हुए 389 कैदियों में से बाद में 269 कैदी खुद लौट आए थे. बता दें कि इनमें अधिकतर सामान्य अपराधी थे.
आज का सच-कहां है वो मास्टरमाइंड?
घटना के दो साल बाद, 2007 में अजय कानू को पश्चिम बंगाल से दोबारा गिरफ्तार किया गया. सालों तक सलाखों के पीछे रहने के बाद, जनवरी 2020 में वह जमानत पर बाहर आया. दिलचस्प बात यह है कि जो शख्स कभी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहता था, वह अब खुद को राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है. आज अजय कानू ‘लोकहित अधिकार पार्टी’ से जुड़ा है और शांतिपूर्ण राजनीति की बातें करता है. गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इसी घटना का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि कैसे एक समय देश का एक बड़ा हिस्सा ‘रेड कॉरिडोर’ की गिरफ्त में था, लेकिन आज वही जहानाबाद और वही बिहार विकास की नई इबारत लिख रहे हैं.





