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जिस हाथ ने कभी एशेज ट्रॉफी को उठाया, वो आज कुत्तों को नहलाकर कर रहे हैं गुजारा, चैंपियन गेंदबाज की रुलाने वाली कहानी

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नई दिल्ली. क्रिकेट की दुनिया बड़ी जादुई है, लेकिन उतनी ही बेरहम भी. यहाँ जब तक आपके हाथों में गेंद और बल्ले का जादू चलता है, दुनिया आपके कदमों में होती है लेकिन जैसे ही फॉर्म साथ छोड़ती है, सुर्खियाँ भी मुंह मोड़ लेती हैं.  6 फुट 2 इंच लंबा वो कद, चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान और हवा में लहराती गेंदें मैथ्यू होगॉर्ड कभी इंग्लैंड की गेंदबाजी की रीढ़ हुआ करते थे.  आज वही हाथ, जिन्होंने 2005 में इंग्लैंड को ऐतिहासिक एशेज जिताई थी, कुत्तों को नहलाने और उन्हें संवारने का काम कर रहे हैं.  यह कहानी किसी फिल्म के उतार-चढ़ाव जैसी लगती है, लेकिन यह एक कड़वी हकीकत है.

2000 से 2008 तक इंग्लैंड की गेंदबाज़ी की रीढ़ रहे होगॉर्ड को फॉर्म गिरने के बाद क्रिकेट जगत से अपेक्षित सम्मान नहीं मिला.  एक शानदार अंतरराष्ट्रीय करियर के बाद, होगॉर्ड अब अपनी पत्नी के साथ कुत्तों की देखभाल और ग्रूमिंग करके आजीविका चला रहे हैं.

स्विंग का वो सुल्तान जिसे दुनिया सलाम करती थी

साल 2000 से 2008 के बीच, मैथ्यू होगॉर्ड इंग्लैंड क्रिकेट का वो नाम थे जिससे दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज खौफ खाते थे.  67 टेस्ट मैचों में 248 विकेट लेना कोई मामूली बात नहीं है.  होगॉर्ड केवल एक गेंदबाज नहीं थे, वो एक कलाकार थे जो गेंद को दोनों तरफ घुमाने की काबिलियत रखते थे.  उनके करियर के स्वर्णिम पन्ने वेस्टइंडीज के खिलाफ ली गई उस शानदार हैट्रिक और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक ही मैच में झटके गए 12 विकेटों से भरे पड़े हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी ‘2005 एशेज सीरीज’.  उस सीरीज में होगॉर्ड ने 24 विकेट लेकर ऑस्ट्रेलिया के घमंड को चकनाचूर कर दिया था.  इंग्लैंड के लिए वो एक नेशनल हीरो थे, जिनकी स्विंग के सामने पोंटिंग और हेडन जैसे दिग्गज भी बेबस नज़र आते थे.

जब वक्त ने करवट बदली

कहते हैं वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता. 2008 के आसपास होगॉर्ड की फॉर्म गिरने लगी. जिस यॉर्कशायर काउंटी के लिए उन्होंने 15 साल अपना पसीना बहाया, वहां से भी उन्हें निराशा हाथ लगी.  धीरे-धीरे सेलेक्टर्स ने उनसे मुंह फेर लिया और देखते ही देखते वो इंटरनेशनल क्रिकेट की चकाचौंध से बाहर हो गए. एक खिलाड़ी के लिए सबसे बुरा वक्त तब होता है जब उसकी पहचान ही उससे छिनने लगती है.

एशेज की ट्रॉफी से ‘डॉग ग्रूमिंग’ तक

क्रिकेट से संन्यास के बाद आर्थिक और मानसिक चुनौतियां अक्सर खिलाड़ियों को घेर लेती हैं. मैथ्यू होगॉर्ड के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. हालात ऐसे बने कि जिस खिलाड़ी ने लॉर्ड्स और मेलबर्न जैसे मैदानों पर हज़ारों की भीड़ के सामने प्रदर्शन किया था, उसे अपना घर चलाने के लिए एक नया रास्ता चुनना पड़ा.
होगॉर्ड ने ‘हॉगर्स डॉग ग्रूमिंग’ नाम से एक बिजनेस शुरू किया. आज वे कुत्तों को नहलाते हैं, उनके बाल काटते हैं और उन्हें संवारते हैं.  सुनने में यह किसी के लिए भी चौंकाने वाला हो सकता है कि जिस हाथ ने कभी एशेज की चमचमाती ट्रॉफी थामी थी, वो आज साबुन और पानी से बेजुबान जानवरों की सेवा कर रहे हैं.

हालांकि, होगॉर्ड इसे ‘मजबूरी’ से ज्यादा अपना नया ‘जुनून’ मानते हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि क्रिकेट के बाद का जीवन बहुत कठिन होता है.  जब आप खेल रहे होते हैं, तो हर कोई आपका दोस्त होता है, लेकिन रिटायरमेंट के बाद फोन बजना बंद हो जाता है.  उन्होंने जानवरों के प्रति अपने प्रेम को ही अपना पेशा बना लिया.  वे कहते हैं कि कुत्तों के साथ वक्त बिताने से उन्हें वो सुकून मिलता है जो शायद मैदान के दबाव में कभी नहीं मिला.



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