कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी तस्वीर उभर रही है जिसे देख कार्ल मार्क्स की आत्मा भी शायद हैरान रह जाए. ‘धर्म जनता के लिए अफीम है’ का नारा बुलंद करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) अब बंगाल की गलियों में लाल झंडे के साथ-साथ मंदिर के घंटों और हवन कुंड की ज्वाला के बीच अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है. 2026 के विधानसभा चुनावों में माकपा का यह ‘धार्मिक अवतार’ राज्य की राजनीति में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है. माकपा की सबसे लोकप्रिय युवा चेहरा और ‘डीवाईएफआई’ (DYFI) की राज्य सचिव मीनाक्षी मुखर्जी, जो अपनी आक्रामक शैली के लिए जानी जाती हैं, इन दिनों चुनावी अभियान के दौरान मंदिरों में माथा टेकते हुए नजर आ रही हैं.
हाल ही में उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई जिसमें वह पूरी श्रद्धा के साथ मंदिर में पूजा-अर्चना कर रही थीं. आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि जो पार्टी दशकों तक नास्तिकता को अपनी ढाल बनाती रही, उसके पोस्टर गर्ल का यह रूप क्या केवल ‘वोट बैंक’ की मजबूरी है या वैचारिक हृदय परिवर्तन?
आज की माकपा को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखना जरूरी है. यही वह बंगाल है जहां कभी माकपा के कद्दावर और जनप्रिय नेता दिवंगत सुभाष चक्रवर्ती को सिर्फ इसलिए पार्टी के भीतर भारी विरोध और स्पष्टीकरण का सामना करना पड़ा था क्योंकि वे तारापीठ मंदिर चले गए थे. उस समय ज्योति बसु के नेतृत्व वाली कट्टर वामपंथी विचारधारा में निजी आस्था के लिए भी जगह नहीं थी. लेकिन आज समय का चक्र ऐसा घुमा है कि पार्टी अपने नेताओं को सार्वजनिक रूप से धार्मिक आयोजनों में शिरकत करने से नहीं रोक रही है.
कलतान दासगुप्ता का ‘चैतन्य देव’ अवतार
उत्तर 24 परगना के पानीहाटी से माकपा के युवा उम्मीदवार कलतान दासगुप्ता ने तो अपनी चुनावी पारी का आगाज ही ऐतिहासिक श्री चैतन्य देव के मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ किया. कलतान ने न केवल मंदिर में समय बिताया बल्कि इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बताया. जानकारों का मानना है कि भाजपा के बढ़ते ‘हिंदुत्व’ के प्रभाव और टीएमसी की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राजनीति का मुकाबला करने के लिए अब माकपा ने अपनी कट्टर नास्तिक छवि को तिलांजलि दे दी है.
रणनीति या मजबूरी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में माकपा अब उस ‘ब्लैकहोल’ से बाहर निकलना चाहती है जिसने उसे हिंदू मतदाताओं से दूर कर दिया था. 2021 के चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद पार्टी को यह अहसास हुआ कि बंगाल जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में धर्म से दूरी बनाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता. पार्टी अब ‘सबका साथ’ वाली रणनीति अपना रही है, जिसमें वह दुर्गा पूजा से लेकर ईद और गुरुपर्व तक हर धार्मिक समुदाय के साथ जुड़ने की कोशिश कर रही है.
भाजपा और टीएमसी इस बदलाव को ‘वैचारिक दिवालियापन’ बता रहे हैं.
विपक्ष का तंज
भाजपा और टीएमसी इस बदलाव को ‘वैचारिक दिवालियापन’ बता रहे हैं. भाजपा का कहना है कि जो लोग सालों तक हिंदू त्योहारों का मजाक उड़ाते रहे, वे अब हार के डर से तिलक लगा रहे हैं. वहीं, टीएमसी का कहना है कि माकपा का यह रूप बंगाल की जनता को भ्रमित करने की एक नाकाम कोशिश है. बहरहाल, मंदिरों में जलती हवन कुंड की ज्वाला और माकपा नेताओं की मौजूदगी यह साफ कर रही है कि 2026 की जंग में ‘लाल भाई’ अब कार्ल मार्क्स की किताबों से बाहर निकलकर ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की पिच पर बैटिंग करने को तैयार हैं.
‘धर्म जनता के लिए अफीम है’ कभी नास्तिकता को ढाल बनाने वाले वामपंथी इस बार के बंगाल चुनाव में मंदिर में हवन कुंड की ज्वाला जलाने में लगे हैं. बंगाल चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अब धार्मिक समारोहों में शिरकत कर रहे हैं. पहले इनके नेता काल मार्क्स के उस विख्यात कथन को मूलमंत्र मानते थे, जिसमें यह कह गया धर्म जनता के अफीम है. क्या यह सत्ता की मजबूरी या वैचारिक ह्रदय परिवर्तन? क्या माकपा में आए यह परिवर्तन का रिजल्ट पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में दिखेगा?





