Digvijay Singh Farewell: दिग्विजय सिंह की राज्यसभा की पारी अगले महीने समाप्त होने जा रही है. तो क्या उनके सियासी सफर पर भी विराम लगने का समय आ गया है? मगर बागवानी करना, संगीत सुनना, अपने स्मरणों को किताब पन्नों पर उतारना, ये सब तो राघोगढ़ के इस पूर्व राजा के शौक कभी नहीं रहे. तो सियासी हलकों में बड़ा सवाल यही है कि राज्यसभा से विदाई के बाद वे क्या करेंगे?
मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री और एआईसीसी महासचिव रह चुके दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी के एक अहम सिपहसालार तथा रणनीतिकार की भूमिका में रहे हैं. वे भले ही 79 साल की पकी उम्र में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन अनुशासित जीवनशैली ने उन्हें आज भी पूरी तरह से चुस्त और तंदुरुस्त बनाए रखा है. मगर आज के सियासी मंजर को देखें तो राष्ट्रीय और राज्य की राजनीति में उनके पास विकल्प सीमित ही नजर आ रहे हैं. बेटे जयवर्द्धन सिंह मध्य प्रदेश की राजनीति में जड़ें जमा चुके हैं. ऐसे में अपने गृह प्रदेश में उनके लिए गुंजाइश थोड़ी कम हो गई है. राष्ट्रीय राजनीति में भी इस पूर्व राजा के लायक कोई ओहदा खाली दिखाई नहीं दे रहा.
याद कीजिए सितंबर-अक्टूबर 2022 को. उस वक्त पार्टी हाईकमान के खिलाफ अशोक गेहलोत की अप्रत्याशित बगावत ने दिग्विजय सिंह के लिए अखिल भारतीय कांग्र्रेस समिति का 88वां अध्यक्ष बनने की राह अचानक से खोल दी थी. उस समय उन्हें राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को छोड़कर आनन-फानन में दिल्ली आना पड़ा था. यह सियासी विडंबना ही थी कि दिग्विजय सिंह ने जिस वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खरगे से आशीर्वाद मांगा, कुछ घंटों बाद वे अध्यक्ष पद के लिए उन्हीं के नाम का अनुमोदन करते नजर आए.
‘हिंदुत्व’ के विरोधी, मगर सनातन परंपरा के मुखर समर्थक …
कांग्रेस में ऐसे नेताओं की कमी नहीं हैं, जिन्हें आज भी दिग्विजय सिंह में जबरदस्त संभावनाएं दिखाई देती हैं और वे राजनीति से उनका रिटायरमेंट नहीं चाहते हैं. अनौपचारिक वार्ताओं में राहुल गांधी को यह मशविरा भी दिया गया है कि बहुसंख्यक समुदाय के बीच पार्टी की पैठ बनाने के लिए दिग्विजय सिंह की सेवाओं का इस्तेमाल विभिन्न साधु-संतों, गुरुआें और हिंदू धर्माचार्यों को जोड़ने वाले एक सेतु के रूप में किया जा सकता है.
दिग्विजय सिंह भगवा पार्टियों के ‘हिंदुत्व’ का विरोध करते हुए स्वयं को सनातन धर्म का मुखर समर्थक बताते हैं. वे ‘सच्चे हिंदुत्व’ को परिभाषित करने के मसले पर कई बार भाजपा, आरएसएस, विहिप और अन्य हिंदूवादी संगठनों को ‘शास्त्रार्थ’ की चुनौती दे चुके हैं. उनका कहना है कि जो भी ‘सर्वधर्म समभाव’ में विश्वास नहीं रखता, वह सनातन धर्म का सच्चा अनुयायी नहीं हो सकता. उनके मुताबिक, हमारा सबसे पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता है, न कि मनुस्मृति. बकौल सिंह, ‘सनातन धर्म के अनुयायी के रूप में मेरा मानना है कि इसे बदनाम करने की एक साजिश रची जा रही है. ऐसा वे लोग कर रहे हैं, जो राजनीतिक लाभ के लिए समाज को जाति और धर्म के आधार पर बांटना चाहते हैं.’ इसी सप्ताह रामनवमी पर भी दिग्विजय सिंह अयोध्या में दिखाई दिए थे. इस मौके पर उन्होंने भाजपा पर परोक्ष हमला करते हुए कहा कि वे न धर्म की राजनीति करते हैं और न धर्म का राजनीति के लिए दुरुपयोग करते हैं.
संसद भवन परिसर में दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और प्रमोद तिवारी. फोटो- पीटीआई
एक दिलचस्प बात यह भी है कि दिग्विजय सिंह को उनके गृहनगर राघोगढ़ में ‘हिंदूपति’ यानी धर्म का रक्षक कहा जाता है. यह उपाधि महान योद्धा पृथ्वीराज चौहान के दौर से जुड़ी है, जिनके वंशज होने का दावा उनका परिवार करता है. राघोगढ़ विधानसभा क्षेत्र में कई लोग दिग्विजय सिंह के पूर्वज महाराज धीर सिंह को आज भी नगर देवता के रूप में पूजते हैं. लोगों का मानना है कि उनकी समाधि के दर्शन करने से सांप के काटने का जहर उतर जाता है और बुरी आत्माओं से भी छुटकारा मिलता है.
जब ‘दिघोरी सम्मेलन’ ने कांग्रेसियों व भाजपाइयों में पैदा कर दी थी बेचैनी…
पार्टी के अनेक नेताओं का कहना है कि अगर राहुल गांधी दिग्विजय सिंह के पुराने रिकॉर्ड को खंगालेंगे, तो उनके एेसे कई काम मिलेंगे, जो आज की राजनीति में उन्हें और भी प्रासंगिक ठहराते हैं. फरवरी 2002 का ‘दिघोरी सम्मेलन’ इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसका मकसद राम जन्मभूमि आंदोलन पर विश्व हिंदू परिषद के एकाधिकार को ध्वस्त करना था. दिग्विजय सिंह, जो उस समय मप्र के मुख्यमंत्री थे, ने अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मदद से कांची कामकोटि पीठ के सम्मानित शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती और पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को एक मंच पर लाने का कारनामा कर दिखाया था. इन सबने मिलकर स्वामी स्वरूपानंद की अगुवाई में एक ‘रामालय ट्रस्ट’ का गठन किया था. उन्होंने राम मंदिर निर्माण का जिम्मा विहिप के बजाय इस ट्रस्ट को सौंपे जाने का दावा किया था. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी दिघोरी में इन तीन शंकराचार्यों के साथ मंच साझा किया था.
सोनिया की दिघोरी यात्रा ने कांग्रेस के भीतर ही बेचैनी पैदा कर दी थी. कांग्रेस कार्यसमिति के कुछ सदस्यों ने शुरू में उन्हें इस सम्मेलन में शामिल न होने की सलाह दी थी, लेकिन सोनिया ने यह कहकर उनकी दलीलों को खारिज कर दिया था कि इस जटिल मुद्दे पर पार्टी को अपना रुख स्षष्ट करने से पीछे नहीं रहना चाहिए. उन्होंने कार्यसमिति के सदस्यों से यहां तक कहा था कि जब तक पार्टी अयोध्या मसले पर सक्रिय भूमिका नहीं निभाएगी, तब तक वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर ही रहेगी.
सोनिया के इस रुख से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी काफी असहज हो गए थे. राम मंदिर के मुद्दे पर शंकराचार्यों के साथ सोनिया की नजदीकी पर वाजपेयी ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. उन्होंने सवाल उठाया था कि जब सोनिया शंकराचार्यों के सामने नतमस्तक हो सकती हैं, तो विहिप के संतों से बातचीत करने के लिए उनकी आलोचना क्यों की जा रही है? वाजपेयी ने चुटकी लेते हुए कहा था, ‘अगर वे शंकराचार्य का आशीर्वाद ले सकती हैं, तो मुझे महंत रामचंद्र परमहंस का आशीर्वाद लेने से वंचित क्यों किया जाना चाहिए?’ रामचंद्र परमहंस राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख थे और उन्होंने 70 से अधिक वर्षों तक राम मंदिर निर्माण के संघर्ष की अगुवाई की थी. उनका 2003 में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया था.
कांग्रेस को सत्ता में ले आई थी दिग्विजय की नर्मदा परिक्रमा!
दिग्विजय सिंह के सियासी सफर में मील का एक और यादगार पत्थर अक्टूबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच की उनकी नर्मदा परिक्रमा है. इस बेहद कठिन पदयात्रा के दौरान उन्होंने 192 दिनों में करीब 3,325 किलोमीटर की दूरी तय की थी. उनकी यह पदयात्रा मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 166 से होकर गुजरी थी. इसका नतीजा यह निकला कि दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी दे दी.
कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की गिनती एक बेहद कद्दावर क्षत्रप के तौर पर होती है. वे उन चुनिंदा राजनेताओं में शुमार हैं, जो सियासत के तीनों सोपानों (नगरपालिका, विधानसभा और संसद) से गुजर चुके हैं. नगर निगम के अध्यक्ष से लेकर विधायक, राज्य सरकार में मंत्री, लोकसभा एवं राज्यसभा सांसद और प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसी कई अहम जिम्मेदारियों को बखूबी निभा चुके हैं. साल 2012 के उत्तर प्रदेश चुनावों के दौरान वे एआईसीसी के महासचिव और राज्य के प्रभारी थे. उस वक्त उन्होंने राहुल गांधी के साथ इतनी नजदीकी से काम किया कि सियासी गलियारों में कई लोगों ने उन्हें राहुल गांधी का ‘गुरु’ तक कहना शुरू कर दिया था.
राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में दिग्विजय सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी की उन पंक्तियों को दोहराया कि ‘न मैं टायर्ड हूं, न रिटायर्ड हूं.’ दिग्गी राजा ने लगे हाथ यह भी कहा कि उन्होंने राजनीतिक जीवन में अपना रास्ता खुद तय किया है. सवाल यह है कि जब वे राजनीति से अपने आप को न टायर्ड मान रहे हैं और न रिटायर्ड, तो क्या इसका मतलब यह है कि अब उनकी नजर उस भूमिका पर रहेगी, जिससे उन्हें 2022 में वंचित कर दिया गया था?





