नक्सल मुक्त भारत: ‘बंदूक से सत्ता’ का सपना चकनाचूर, रेड कॉरिडोर की टूटी कमर | – News in Hindi

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31 मार्च 2026 की पूर्व संध्या पर लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो दहाड़ लगाई, उसे पूरे देश ने सुना. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश में नक्सलवाद अब विलुप्त होने की कगार पर है. बस्तर से नक्सलवाद लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है और माओवादी खतरे का साया देश से हट चुका है. शाह ने जोर देकर कहा कि सरकार द्वारा निर्धारित समय-सीमा 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य हासिल हो गया है. औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद देश को सूचित किया जाएगा, लेकिन वे दृढ़तापूर्वक कह सकते हैं कि हम नक्सल मुक्त हो चुके हैं.

यह ऐलान केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि दशकों की हिंसा, पीड़ा और पिछड़ेपन से जूझते क्षेत्रों में लोकतंत्र की जीत का प्रतीक था. बस्तर जैसे क्षेत्र, जो कभी माओवादियों का अंतिम गढ़ माने जाते थे, अब विकास के पथ पर अग्रसर हैं. स्कूल, सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के अवसर वहां पहुंच रहे हैं, जहां पहले केवल डर और हिंसा का राज था.

नक्सलवाद की जड़ें: इतिहास और विचारधारा

नक्सलवाद की शुरुआत 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से मानी जाती है, जब पश्चिम बंगाल में गरीब किसानों ने स्थानीय नेताओं पर हमला किया. चारु मजूमदार जैसे नेताओं ने इसे सशस्त्र क्रांति का रूप दिया. 1980 में आंध्र प्रदेश में पीपुल्स वॉर ग्रुप और बिहार में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर का गठन हुआ. 2004 में इनका विलय होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) बनी.

यह आंदोलन तेजी से फैला और 12 राज्यों में फैल गया. रेड कॉरिडोर के नाम से मशहूर यह क्षेत्र भारत के 17 प्रतिशत भूमि और 10 प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर रहा था. छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के घने जंगलों, पहाड़ों और नदियों ने नक्सलियों को छिपने का सहारा दिया.

माओवादियों की विचारधारा भारत के संविधान और लोकतंत्र से सीधे टकराती थी. वे माओ त्से-तुंग की ‘बंदूक से सत्ता पैदा होती है’ वाली लाइन मानते थे. स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और बैंक शाखाओं को जलाकर उन्होंने विकास को रोका. अनुसूचित जनजातियों को झूठे वादों से लुभाकर वे उन्हें अपनी सेना में भर्ती करते थे. महिलाओं को जबरन सामान ढोने के लिए मजबूर किया जाता था. ‘जन अदालतों’ के नाम पर बिना मुकदमे हत्याएं की जाती थीं. गांवों पर आतंक का राज था. विकास 50 वर्षों तक ठप रहा. बच्चे शिक्षा से वंचित रहे और बीमार लोग बिना इलाज मरते रहे. यह चक्र हिंसा और गरीबी को बढ़ावा देता रहा.

बहुआयामी रणनीति: सुरक्षा और विकास का समन्वय

पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार ने नक्सल समस्या का समाधान बहुआयामी तरीके से किया. सुरक्षा बलों को मजबूत किया गया. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, विशेष रूप से सीआरपीएफ और कोबरा कमांडो ने जंगल युद्ध की ट्रेनिंग ली. आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स और छत्तीसगढ़ के डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड जैसे स्थानीय यूनिटों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में 800 से अधिक कैंप स्थापित किए गए. 2023 में ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ और 2025 में ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ जैसी कार्रवाइयों ने सुकमा और ओडिशा सीमा क्षेत्रों को साफ किया. ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी, रीयल-टाइम कैमरा और एआई आधारित निगरानी ने जवानों की जान बचाई और ऑपरेशनों की सफलता बढ़ाई.

हिदमा जैसे बस्तर के हमलों के मास्टरमाइंड और बसवराजू जैसे शीर्ष नेताओं को एनकाउंटर में मार गिराया गया. पोलितब्यूरो और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन जैसी कमान संरचनाएं पूरी तरह नष्ट हो गईं. सुरक्षा के साथ-साथ फाइनेंशियल ब्लॉकेड भी लगाया गया. राष्ट्रीय जांच एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय ने शहरी नक्सल समर्थकों और फर्जी एनजीओ के खातों को फ्रीज किया. हवाला नेटवर्क तोड़े गए. परिणामस्वरूप नक्सलियों के पास हथियार, भोजन और भर्ती के लिए धन नहीं बचा. सरेंडर नीति ने भी कमाल किया. रैंक के अनुसार नकद पुरस्कार, कौशल प्रशिक्षण, एक वर्ष तक मासिक सहायता और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर दिए गए. 10,000 से अधिक नक्सली हथियार डाल चुके हैं. कई अब खेती कर रहे हैं या गांव में दुकान चला रहे हैं.

पिछड़े क्षेत्रों का मुख्यधारा से जुड़ना

नक्सलियों ने विकास को रोका था, न कि विकास ने नक्सलवाद को जन्म दिया. सरकार ने इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए 20,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए. 15,000 किलोमीटर सड़कें बनीं, जिससे गांव अब घंटों में जुड़ते हैं. 9,000 से अधिक मोबाइल टावर लगे, जिससे संचार और सरकारी योजनाएं पहुंचीं. 1,804 बैंक शाखाएं और 1,321 एटीएम खुले. पोस्ट ऑफिस अब बचत और ऋण उपलब्ध कराते हैं. एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में जनजातीय बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है. आईटीआई में ट्रेड ट्रेनिंग से युवाओं को रोजगार मिल रहा है. लड़कियों की शिक्षा दर बढ़ी है, जिससे नक्सली भर्ती का आकर्षण घटा है.

आंकड़े इस सफलता की गवाही देते हैं. 2014 में 126 प्रभावित जिले थे, जो अब केवल दो रह गए हैं. सबसे प्रभावित जिलों की संख्या 35 से शून्य हो गई है. हिंसक घटनाएं 70 प्रतिशत घटी हैं. स्वास्थ्य शिविर, राशन की दुकानें, आंगनवाड़ी केंद्र और मुफ्त जांच नियमित हो गए हैं. लोगों का राज्य पर विश्वास बढ़ा है. बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन युवाओं को खेल से जोड़ते हैं. बस्तर पांडुम जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम परंपरागत नृत्य और मेलों को पुनर्जीवित करते हैं. इससे नक्सलियों का लोगों के दिलों पर कब्जा टूटा है.

अमित शाह का योगदान और नेतृत्व

अमित शाह ने 24 अगस्त 2024 को स्पष्ट समय-सीमा दी थी कि 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद समाप्त होगा. संसद में उन्होंने कहा कि बस्तर से नक्सलवाद लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है. स्कूल हर गांव में बन रहे हैं, राशन दुकानें खुल रही हैं. रेड टेरर का साया हटने से विकास की धारा बह रही है. उन्होंने विपक्ष पर भी तीखा हमला किया और कहा कि नक्सलवाद विचारधारा नहीं, हिंसा है. कांग्रेस शासन में विकास क्यों नहीं पहुंचा, यह सवाल उन्होंने उठाया. उनकी दहाड़ ने पूरे देश को विश्वास दिलाया कि मजबूत इच्छाशक्ति और समन्वय से कोई समस्या अजेय नहीं. 2024 से मार्च 2026 तक 706 नक्सली मारे गए, 2,218 गिरफ्तार हुए और 4,839 ने सरेंडर किया. यह आंकड़ा सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाता है.

चुनौतियां और भविष्य की राह

कुछ छोटे-छोटे पॉकेट्स में अभी भी छोटे समूह सक्रिय हैं, खासकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा में. शहरी समर्थक सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं. भूमि विवाद कभी-कभी तनाव पैदा करते हैं. लेकिन आधारभूत संरचना पूरी तरह ढह चुकी है. भविष्य में सतर्कता बनाए रखनी होगी. सीमा क्षेत्रों में कैंप सक्रिय रखें, हथियार तस्करी पर नजर रखें. पंचायतों में जनजातियों की भागीदारी बढ़ाएं. एकलव्य स्कूलों का विस्तार करें. महुआ, तेंदू पत्ता जैसे वन उत्पादों के लिए बाजार लिंकेज दें. डिजिटल साक्षरता बढ़ाएं. ग्राम सभाओं को मजबूत करें ताकि स्थानीय लोग पानी, सड़क जैसी समस्याएं खुद सुलझाएं. इससे पुरानी शिकायतें दोबारा नहीं उभरेंगी.

लोकतंत्र की जीत और विकास की नई कहानी

आज रेड कॉरिडोर की कहानी बदल गई है. सड़कों पर बाइक और ट्रक दौड़ रहे हैं. पहाड़ों पर टावर चमक रहे हैं. स्कूलों में बच्चे हंस-खेलकर पढ़ रहे हैं. वह क्षेत्र, जो कभी आतंक का पर्याय था, अब राष्ट्र के विकास पथ का हिस्सा बन गया है. लोकतंत्र ने बंदूक को हराया है. ‘विकसित भारत’ में वे अनुसूचित जनजातियां भी शामिल हैं जो दशकों से हाशिए पर थीं. अमित शाह द्वारा संसद में दिया गया बयान, केवल एक ऐलान नहीं, बल्कि एक नई सुबह का संदेश है. नक्सल मुक्त भारत सुरक्षा, विकास और समावेशन की मिसाल है. यह साबित करता है कि सशस्त्र विद्रोह लोकतंत्र में टिक नहीं सकता. मजबूत नेतृत्व, तकनीक, समन्वय और जन-केंद्रित विकास से कोई चुनौती अजेय नहीं है.



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