कुछ सुबहें ऐसी होती हैं जो बिना किसी पूर्व सूचना के आती हैं. एक दुबली और झिझकती हुई रोशनी के साथ. आज 3 अप्रैल की यह सुबह भी वैसी ही है. आज निर्मल वर्मा का जन्मदिन है. उन्हें याद करना किसी हिंदी साहित्य के ‘महारथी’, पुरस्कार विजेता या किसी आंदोलन के प्रणेता को याद करना नहीं है. निर्मल को याद करना दरअसल हवा के एक नए विन्यास को अनुभव करना है. दो वाक्यों के बीच की उस हिचक को पकड़ना है जहां अर्थ अभी पूरी तरह खुला नहीं है. वे हमारे समय के उन विरल लेखकों में थे जिन्होंने शब्दों से अधिक मौन की शुचिता और आंतरिक एकांत पर भरोसा किया. उनका जन्म 1929 में शिमला में हुआ. वह शहर जो न कभी पूरी तरह हिंदुस्तानी हो पाया और न ही पूरी तरह अंग्रेज.
वह ‘अनुवाद’ में जीने वाला शहर था. शायद निर्मल की वह नियति, कहीं और होने की अनिवार्य शर्त और हाशिए पर खड़े होकर भीतर झांकने की जिद, वहीं से शुरू हुई थी. उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में इतिहास पढ़ा. लेकिन इतिहास के वे ऊँचे और निश्चित दावे उन्हें अपनी प्रकृति के अनुकूल नहीं लगे होंगे. इसीलिए निर्मल ने ताउम्र उस मुखरता और उस स्पष्टता के विरुद्ध लिखा जो हर मानवीय आवेग की एक मुकम्मल और यांत्रिक व्याख्या मांगती है. उनका लेखन उस बाह्य आग्रह के विरुद्ध एक आंतरिक प्रतिरोध था.
वह मनुष्य, जो किनारे हट गया
1950 के दशक में जब ‘नई कहानी’ अपनी ज़मीन और नए मुहावरे तलाश रही थी, तब उनके पहले कहानी संग्रह ‘परिंदे’ ने कुछ अकल्पनीय किया. उसने जीवन का स्थूल वर्णन नहीं किया, बल्कि वह जीवन के ऊपर किसी अनिश्चित पक्षी की तरह मंडराने लगी. जहाँ उस दौर के दूसरे लेखक वर्ग-संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन और यथार्थवाद के भारी-भरकम नक्शे बना रहे थे, निर्मल दो लोगों के बीच के उस एकांत को माप रहे थे जिसे कोई भी भौतिक रास्ता पार नहीं कर सकता था.
वे एक समय कम्युनिस्ट पार्टी में रहे और गांधी की प्रार्थना सभाओं में भी जाते रहे. इतिहास उनसे रगड़ खाता हुआ गुज़रा, लेकिन वे कहीं ठहरे नहीं. 1956 में सोवियत संघ ने जब हंगरी पर सैन्य हमला किया, तो निर्मल ने बिना किसी खास औपचारिकता के चुपचाप पार्टी से किनारा कर लिया. यह ‘किनारे हट जाना’ ही निर्मल का असली प्रस्थान बिंदु है. विचारधाराओं के लौह-आवरण से उनकी यह दूरी ही उन्हें उस सत्य के करीब ले गई जिसका कोई भी राजनीतिक नामकरण संभव नहीं है. उनका साहित्य इसी ‘विथड्रॉल’ या प्रत्याहार का विस्तार है.
यूरोप: एक भौतिक सीमा नहीं, एक मन:स्थिति
1959 में वे प्राग गए. आज के समय में यह सुनना एक रूमानी स्मृति की तरह लग सकता है. वास्तव में वह निगरानी और विचारधारा के कठोर भार तले दबा हुआ एक उदास प्राग था. वहाँ मौन भी एक तरह से ‘अभिलक्षित’ किया जाता था. खामोशी वहाँ केवल शब्द का अभाव नहीं, एक अर्थपूर्ण उपस्थिति थी. उन्होंने वहां ओरिएंटल इंस्टीट्यूट में रहते हुए चेक लेखकों का सीधे हिंदी में अनुवाद किया. यह अँग्रेजी की औपनिवेशिक मध्यस्थता के बिना हिंदी का यूरोप की आत्मा से सीधा साक्षात्कार था. एक ऐसी बौद्धिक अंतरंगता जिसमें बेचैनी और अपनापा साथ-साथ चलते थे. यूरोप ने निर्मल को केवल प्रभावित नहीं किया, उन्हें उनके स्वयं के केंद्र से विस्थापित कर दिया.
उस अनुभव ने उनके भीतर की आंतरिक दुविधा और अस्तित्वगत संशय को और अधिक सघन बना दिया. उनका उपन्यास ‘वे दिन’ केवल प्राग का भौगोलिक विवरण नहीं है, वह स्वयं प्राग की विचलित आत्मा है. वह ठहरा हुआ समय, वे दिशाहीन चरित्र और वह निर्वासन जो बाह्य जगत से अधिक उनके आंतरिक जगत का हिस्सा था. निर्मल का यूरोप किसी पर्यटक का गंतव्य नहीं था. वह एक ऐसी मन:स्थिति थी जहां मनुष्य अपनी जड़ों से अलग होकर अपनी ही स्मृतियों के एकांत में शरण लेता है. उनके यहाँ यही ‘विस्थापन’ सृजन का अनिवार्य आधार बनता है. खो जाने का भय ही अंततः स्वयं को पाने की पहली शर्त है.
लेखन: जो अनकहा रह गया
निर्मल वर्मा के रचनात्मक संसार की अकादमिक व्याख्या करना उनके साथ एक तरह का विश्वासघात है. उनके उपन्यास ‘लाल टीन की छत’, ‘एक चिथड़ा सुख’, ‘रात का रिपोर्टर’ और ‘अंतिम अरण्य’ किसी सीधी और सरल रेखा में गति नहीं करते. वे वृत्त बनाते हैं. वे एक ही सूक्ष्म संवेग के पास तब तक ठहरे रहते हैं जब तक कि उसके बाहरी किनारे धुंधले न पड़ने लगें. ‘कव्वे और काला पानी’ जैसी कहानियों में किसी पारंपरिक कथा का निर्माण नहीं होता. वहाँ हमारी पूर्व-निर्मित निश्चितताओं का धीरे-धीरे क्षरण होता है. वहाँ बाह्य जगत में कुछ विशेष घटित नहीं होता. बस एक आंतरिक अनुभव की प्रतिध्वनि होती है जो बहुत गहरी और मर्मभेदी होती है.
उनके निबंध ‘शब्द और स्मृति’, ‘कला का जोखिम’ और ‘ढलान से उतरते हुए’ केवल बौद्धिक तर्क प्रस्तुत नहीं करते. वे पाठक को एक तरह से ध्यानावस्थित करते हैं. ये निबंध वैचारिक विमर्श से अधिक एक लेखक की आत्म-स्वीकारोक्ति की तरह हैं, जहाँ वे संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व को अत्यंत धीमे स्वर में सुलझाते हैं. उनके निबंधों में शब्द उस खोई हुई पवित्रता को खोजने का औजार हैं जिसे समकालीन परिस्तिथि ने हमसे छीन लिया है. वे हमें उस ढलान की ओर ले जाते हैं जहाँ तर्क समाप्त होता है और ठीक वहीं से एक शुद्ध मानवीय बोध का आरंभ होता है.
कुंभ के मेले पर लिखे उनके सुप्रसिद्ध निबंध को देखिए. जहाँ दुनिया वहाँ केवल अपार भीड़, तमाशा या धार्मिकता का प्रदर्शन देखती है, वहाँ निर्मल ‘भक्ति की गुमनामी’ और उस विराट जनसमूह के भीतर रक्षित हर व्यक्ति के नितांत अकेलेपन को देख पाते हैं. उनके लिए उत्सव भी अंततः एक आंतरिक यात्रा ही था. वे हमें सिखाते हैं कि देखना केवल आँखों का काम नहीं, बल्कि स्मृति और ध्यान का समन्वय है. उनके निबंध हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं जहाँ इतिहास की क्रूरता के बीच भी मनुष्य की गरिमा का दीया जलता रहता है.
विनीत गिल: एकांत का नया और पारदर्शी सेतु
निर्मल की इस वैचारिक और संवेदनात्मक यात्रा को आज के समय में समझने के लिए विनीत गिल की कृति ‘हियर एंड हियरआफ्टर: निर्मल वर्मास लाइफ इन लिटरेचर’ (पेंगुइन रैंडम हाउस, 2022) एक अनिवार्य पड़ाव है. विनीत निर्मल को किसी बँधे-बँधाए ढांचे या रूढ़ जीवनी के खांचे में कसने की कोशिश नहीं करते. उनकी यह जीवनी निर्मल की अपनी शैली की तरह ही रुकती है, मुड़ती है और अंततः अपने ही केंद्र पर लौटती है.
विनीत ने निर्मल के उस सघन संसार और उनके ‘एकांत’ को अँग्रेजी के पाठकों के लिए एक आत्मीय अन्वेषण के रूप में प्रस्तुत किया है. यह कृति केवल एक जीवन-वृत्त नहीं, बल्कि हिंदी और अँग्रेजी के बीच की उस पुरानी भाषाई और सांस्कृतिक दूरी को पाटने का एक विरल प्रयास है. विनीत इस जीवनी के भीतर उस ‘निर्मल-स्पेस’ को बचाए रखते हैं, जहाँ पाठक और लेखक के बीच कोई यांत्रिक व्याख्या बाधा नहीं बनती.
इस परिप्रेक्ष्य में, विनीत गिल द्वारा रचित निर्मल वर्मा की यह जीवनी और अक्षय मुकुल द्वारा प्रस्तुत अज्ञेय का वृत्तांत—दोनों मिलकर एक बड़े सांस्कृतिक ‘संकोच’ को समाप्त करते हैं.इन दोनों महत्वपूर्ण कृतियों ने उस भाषाई अलगाव या ‘आइसोलेशन’ को कम किया है जिसने हिंदी और अँग्रेजी के बौद्धिक जगत को लंबे समय तक एक-दूसरे से दूर रखा था. विनीत की यह किताब दरअसल निर्मल के संसार में पुन: प्रवेश करने का एक विनम्र और गंभीर बौद्धिक निमंत्रण है. यह कृति हमें उस अरण्य की ओर ले जाती है जहाँ स्मृति और शब्द एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं. वास्तव में, विनीत यहाँ एक जीवनीकार मात्र नहीं, बल्कि एक ऐसे सहयात्री की तरह उपस्थित हैं जो हमें उस उजास की ओर ले जाते हैं जो निर्मल के गद्य की बुनियादी पहचान है.
रामकुमार और निर्मल : दो भाइयों का एकांत
निर्मल वर्मा के भीतर के उस गहन और पारदर्शी एकांत को समझने के लिए उनके बड़े भाई और विख्यात चित्रकार रामकुमार की स्मृतियों का साथ होना आवश्यक है. दोनों भाइयों के बीच एक ऐसा मौन और सूक्ष्म संवाद था, जो शब्दों से अधिक अनुभूतियों पर टिका था. रामकुमार ने जिस तरह कैनवस पर एक निस्तब्धता को आकार दिया, निर्मल ने उसी निर्वात को शब्दों में ढालने का जोखिम उठाया. निर्मल की कहानियों के वे उदास और झिझकते हुए चरित्र अक्सर रामकुमार के चित्रों की रेखाओं से उभरकर आए हुए लगते हैं.
यह दो महान कलाकारों का एक ही सत्य को दो अलग माध्यमों से देखने का विरल प्रयास था. जहाँ एक भाई ने रेखाओं के बीच के शून्य को पकड़ा, वहीं दूसरे ने दो वाक्यों के बीच के अंतराल को सहेजा. उन दोनों का साथ होना दरअसल हिंदी आधुनिकता के उस अध्याय का साक्षी होना है, जहाँ कला और साहित्य एक-दूसरे की छाया में अपना एकांत ढूँढ रहे थे. वह एकांत जो किसी बाह्य प्रभाव से नहीं, बल्कि एक आंतरिक खोज से उपजा था.
निर्मल वर्मा: इस मुखर समय में उनकी सार्थकता
हम एक ऐसे समय में जीवित हैं जहाँ निरंतर और आक्रामक अभिव्यक्ति ही अस्तित्व की पहली शर्त बन गई है. यहाँ तक कि संशय और झिझक को भी एक विफलता की तरह देखा जाता है. इसे एक ऐसी रिक्तता माना जाता है जिसे बहुत कुशलता से भर देना अनिवार्य है, इससे पहले कि वह हमें विचलित करने लगे. ऐसे कोलाहलपूर्ण समय में निर्मल वर्मा एक अनिवार्य सार्थकता की तरह उभरते हैं. वे हमें प्रतीक्षा करना सिखाते हैं. वे हमें सुनना सिखाते हैं. वे सिखाते हैं कि कैसे अनिश्चितता के भीतर बिना किसी व्याकुलता के रहा जा सकता है.
वे किसी क्षण को समय से पूर्व अर्थ बताने के लिए विवश नहीं करते. उनका लेखन कोई बना-बनाया समाधान प्रस्तुत नहीं करता. वह यहाँ तक कि कोई स्पष्टता भी नहीं देता. वह जो प्रदान करता है, वह कहीं अधिक दुष्कर है और वह है ‘एकाग्रता’.उस क्षणभंगुर के प्रति एकाग्रता. उस भंगुरता के प्रति संवेदनशीलता जो मानवीय अनुभव के उन सूक्ष्म और अदृश्य परिवर्तनों में निहित है, जो किसी भी बड़ी घटना की तुलना में हमें कहीं अधिक गहराई से निर्मित करते हैं. वे हमें स्मरण कराते हैं कि सब कुछ शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता और शायद सब कुछ कहा जाना भी नहीं चाहिए. जो अनकहा रह जाता है, अक्सर वही जीवन के केंद्र में सबसे अधिक अर्थपूर्ण होता है.
एक प्रतीक्षित उपस्थिति
आज जब हर राय का तात्कालिक होना अनिवार्य बना दिया गया है और जब एकांत को अक्सर किसी की कमजोरी या अनुपस्थिति मान लिया जाता है, तब निर्मल वर्मा और भी ज़रूरी हो जाते हैं. वे हमें जल्दबाजी के इस युग में ठहरना और प्रतीक्षा करना सिखाते हैं. वे हमें बताते हैं कि जो नहीं कहा जा सका या जो अनकहा रह गया, अक्सर वही जीवन का सबसे कीमती और सारभूत हिस्सा होता है. निर्मल वर्मा 2005 में शारीरिक रूप से हमसे ओझल हो गए. लेकिन उनके यहाँ कोई ‘अंत’ नहीं होता. वे अपने अंतिम पूर्णविराम के बाद भी पाठक की चेतना में बचे रहते हैं. वे आज की इस सुबह की नमी और उसकी हिचक में बचे हैं. वे उस धुंधली याद में बचे हैं जिसे हम कोई स्पष्ट नाम देने में असमर्थ हैं. उन्हें पढ़ना दरअसल उस एकांत में प्रवेश करना है जो हमेशा से हमारे भीतर मौजूद था. वह एकांत बस हमारी प्रतीक्षा कर रहा था.



