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Land Ownership in Village : वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी 46 फीसदी परिवार भूमिहीन हैं, जबकि 10 फीसदी परिवारों के पास 44 फीसदी जमीन है. रिपोर्ट में प्रदेशवार ब्योरा भी दिया गया है, जिसमें दक्षिण भारत के राज्यों में यह अंतर कम दिखाई देता है.
ग्रामीण भारत के 10 फीसदी लोगों के पास 44 फीसदी जमीन है.
नई दिल्ली. बचपन से सुनते आए हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. राष्ट्रपति महात्मा गांधी भी कहते थे कि असली भारत गांवों में बसता है. इससे तो यही लगता है कि भारत के गांवों में रहने वालों के पास ही असली जमीन है, जिस पर वे खेती करते हैं और अनाज पैदा करते हैं. लेकिन, वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब की हालिया रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए हैं, उसे पढ़कर तो एकबारगी यकीन ही नहीं हो रहा. रिपोर्ट साफ कहती है कि गांवों में रहने वाले करीब 46 फीसदी परिवार भूमिहीन हैं, जबकि 10 फीसदी परिवारों के पास ही आधी जमीन है.
‘भारत में भूमि असमानताः प्रकृति, इतिहास एवं बाजार’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के ग्रामीण इलाकों में शीर्ष 10 फीसदी परिवारों के पास 44 फीसदी जमीन है, जबकि 46 फीसदी परिवार भूमिहीन हैं. वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब ने अपने अध्ययन में कहा है कि ग्रामीण भारत में शीर्ष 5 फीसदी परिवार 32 फीसदी जमीन के मालिक हैं, जबकि शीर्ष 1 फीसदी परिवारों के पास 18 फीसदी कृषि भूमि है.
2.7 लाख गांवों पर की स्टडी
यह अध्ययन नितिन कुमार भारती, डेविड ब्लेकस्ली और समरीन मलिक ने संयुक्त रूप से किया है. अध्ययन में करीब 65 करोड़ लोगों और 2.7 लाख गांवों के भूमि आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण स्तर पर भूमि असमानता का औसत गिनी सूचकांक (0 से 100 के पैमाने पर) भूमिहीन परिवारों को शामिल करने पर 71 तक पहुंच जाता है, जबकि 46 फीसदी ग्रामीण परिवार पूरी तरह भूमिहीन हैं. रिपोर्ट कहती है कि औसतन किसी गांव में सबसे बड़ा जमींदार लगभग 12 फीसदी जमीन नियंत्रित करता है, जबकि कुछ गांवों में एक ही व्यक्ति के पास आधे से अधिक कृषि भूमि है.
राज्यों में भी दिखा बड़ा अंतर
राज्यों के बीच असमानता के स्तर में भी बड़ा अंतर देखा गया है, जो वैश्विक स्तर पर देशों के बीच पाए जाने वाले अंतर के लगभग बराबर है. रिपोर्ट कहती है कि जिन क्षेत्रों में कृषि के लिए अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियां हैं, वहां भूमि का केंद्रीकरण अधिक देखने को मिलता है. ऐतिहासिक कारकों का भूमि वितरण पर गहरा असर बना हुआ है. ब्रिटिश शासन के सीधे नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भूमि असमानता अपेक्षाकृत अधिक पाई गई, जबकि रियासतों के अधीन रहे इलाकों में भूमि असमानता कम रही है.
सामाजिक संरचना भी है जिम्मेदार
रिपोर्ट में भूमि स्वामित्व पर सामाजिक संरचना का प्रभाव भी स्पष्ट है. अनुसूचित जाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) की अधिक आबादी वाले गांवों में भूमिहीनता की दर ज्यादा है. हालांकि, लंबे समय तक वामपंथी शासन के अधीन रहे केरल एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम दिखती है. बाजार और बुनियादी ढांचे तक बेहतर पहुंच भी ऐतिहासिक रूप से बनी इस असमानता को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई है. यही वजह है कि आज भी सामाजिक संरचना के आधार पर जमीन का मालिकाना हक दिखता है.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें





