पिछले एक हफ्ते से नार्थ इंडिया में मौसम पलटी मार रहा है. होली के आसपास धूप की तेज तपिश के बाद अब उत्तर भारत में 18 मार्च के आसपास मौसम बदला और ऐसी बारिश हुई कि लोगों को ठंड सी महूसस होने लगी. अभी फिर चार पांच दिनों से मौसम फिर बदला बदला है. बादलों की बदली है. बूंदाबांदी और बारिश की खबरें. साथ में पहाड़ों पर बर्फबारी भी. इसकी वजह है पश्चिमी विक्षोभ यानि वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज. तो सवाल ये उठता है कि ये पश्चिमी विक्षोभ आखिर होता क्या है.
खैर आगे बढ़ने से पहले एक बार उत्तर भारत में मौसम का जायजा ले लेते हैं. मार्च 2026 में मौसम विभाग का आंकलन था कि ये महीना काफी गर्म रहने वाला है लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मार्च का दूसरा हिस्सा आमतौर पर ठंडा है. बादल, बूंदाबांदी, बारिश और पहाड़ों पर बर्फबारी का आलम है.
हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी और मैदानी इलाकों जैसे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी में हल्की से मध्यम बारिश हो रही है या आसार बन रहे हैं. (AI News18 Image)
भूमध्य सागर में पैदा हुआ पश्चिमी विक्षोभ हवा की निम्न दबाव वाली प्रणाली बना रहा है, जिसने खासकर उत्तर भारत को प्रभावित किया हुआ है. मार्च 2026 में वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज के कई बैक-टू-बैक सिस्टम सक्रिय हैं. माना जा रहा है 26-31 मार्च तक मैदानी इलाकों में बारिश-ओलावृष्टि और पहाड़ों में बर्फबारी होने वाली है या हो रही है. 31 मार्च के लिए तो उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा आदि में इसका बड़ा अलर्ट घोषित किया जा चुका है.
क्या होता है पश्चिमी विक्षोभ
पश्चिमी विक्षोभ एक तरह का मौसमी तूफान है जो उत्तर भारत के मौसम को अचानक बदल देता है. ये भूमध्य सागर से शुरू होकर जेट स्ट्रीम की मदद से भारत तक पहुंचता है. बारिश-बर्फबारी लाता है.
ये मुख्य रूप से भूमध्य सागर, काला सागर या कैस्पियन सागर के ऊपर ऊपरी वायुमंडल यानि 5-10 किमी ऊंचाई पर पैदा होता है. फिर उत्तर से आने वाली ठंडी ध्रुवीय हवाओं और गर्म, नम समुद्री हवाओं के टकराने से निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है, जो चक्रवात जैसा घूमता चक्कर शुरू कर देता है.
आजकल भूमध्य सागर में विक्षोभ ज्यादा बन रहे हैं. फिर वो वहां से ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान होते हुए उत्तर भारत की ओर पहुंचते हैं. (AI News18 Image)
फिर तेज पश्चिमी हवाएं इसे पूर्व की धकेल देती हैं यानि ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान होते हुए भारत धकेल देती हैं यानि मतलब ये भी है कि इस समय ईरान से लेकर उत्तर भारत तक हर जगह मौसम पलटी मार रहा है. हालांकि ये विक्षोभ भारत पहुंचते-पहुंचते कमजोर हो जाता है, हिमालय से टकराकर कहीं बारिश कराता है और कहीं बर्फबारी.
उत्तर भारत पर असर कैसे होता है?
पश्चिमी विक्षोभ की वजह से यहां तक पहुंच चुकीं समुद्री नमी और ठंडी हवाओं से बादल बनते हैं. मैदानों में बूंदाबांदी, गरज-चमक, ओले; पहाड़ों में बर्फबारी जैसी चीजें होने लगती हैं, जैसा अभी हो रहा है. दिन में ठंडक सी लगने लगती है. तो पश्चिम विक्षोभ को हम “पश्चिम से आया मेहमान” भी कह सकता हैं.
2 अप्रैल 2026 से एक नया पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो रहा है, जो मौसम को फिर से प्रभावित करेगा. यानि अभी इस तरह के बदलते मौसम से कोई छुटकारा नहीं है. एक तरह से ये राहत की बात भी है. (AI News18 Image)
ये भूमध्य सागर में ही क्यों बनता है
क्योंकि भूमध्य सागर एक ऐसे एरिया में तब्दील हो जाता है जहां उत्तर से आ रही आर्कटिक की ठंडी हवाओं का सामना गर्म, नम भूमध्यसागरीय हवा से होता है. दोनों जब भिड़ती हैं तो तापमान अंतर से निम्न दाब का चक्रवात बनता है. एक तीसरी बात और भी होती है, वो ये कि पिछले कुछ समय से भूमध्य सागर का ऊपरी स्तर का पानी गर्म होने लगा है, तो ये अपने संपर्क में आने वाली हवाओं को गर्म करता है, ये गर्म हवा जब ऊपर उठती है तो उसकी जगह लेने के लिए इधर उधर से हवाएं दौडऩे लगती हैं.
ये भी वायुमंडल में निम्न दबाव की स्थिति पैदा करते हुए खरमंडल मचाती हैं. अभी मार्च में ऐसा इसलिए हो रहा है भूमध्य सागर भी गर्म हो रहा है औऱ आर्कटिक भी. हवाओं का प्रवाह अनियमित हो गया है.
क्या अब विक्षोभ बढ़ गए हैं
हां, अब विक्षोभ बढ़ गये हैं और इसके लिए सीधा जिम्मेदार बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण होने लगा है. सामान्य तौर पर अब अक्टूबर-मार्च तक 5-6 विक्षोभ आते हैं. अभी इस बार मार्च में लगातार ऐसे विक्षोभ की स्थितियां बन रही हैं.
वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज नाम किसने दिया
पश्चिमी विक्षोभ को “वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज” नाम भारतीय मौसम विज्ञानियों ने दिया था, जो 1940 के दशक में भारत मौसम विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा प्रचलित हुआ. वैसे इसका श्रेय स्पष्ट रूप से किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जाता बल्कि सामूहिक रूप से मौसम विभाग के विशेषज्ञों को माना जाता है.
ये शब्द 1947 के आसपास पहली बार औपचारिक रूप से इस्तेमाल हुआ, जब IMD ने भूमध्य सागर से आने वाले इन निम्न दाब सिस्टम को “पश्चिमी” दिशा से उत्पन्न “विक्षोभ” कहा. इससे पहले ब्रिटिश काल में सामान्य चक्रवात शब्द इस्तेमाल होता था. भारतीय वैज्ञानिकों ने इसका नाम उत्तर-पश्चिम भारत के मौसम पैटर्न के आधार पर रखा, क्योंकि ये पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हैं.
वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की खोज का इतिहास 19वीं सदी के अंत से जुड़ा है, जब ब्रिटिश मौसम विज्ञानियों ने भारत के ऊपरी वायुमंडल में पश्चिमी दिशा से आने वाले इन निम्न दाब सिस्टम को पहचाना. भारत में इसका वैज्ञानिक अध्ययन 1920-30 के दशक में भारत मौसम विभाग द्वारा शुरू हुआ.
पूर्वी विक्षोभ क्यों नहीं होता
पूर्वी विक्षोभ इसलिए नहीं होता क्योंकि पूर्वी दिशा से आने वाली हवाओं का वैसा चक्रवाती सिस्टम नहीं बनता जैसा पश्चिमी विक्षोभ में होता है. पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर जैसे क्षेत्रों में ठंडी-गर्म हवाओं के टकराव से बनते हैं, लेकिन पूर्व से ऐसा कोई बड़ा स्रोत नहीं. पूर्वी हवाएं बंगाल की खाड़ी या प्रशांत से आती हैं, जो मानसून या चक्रवात बनाती हैं, न कि विक्षोभ. ये उत्तर भारत तक कमजोर पड़ जाती हैं क्योंकि हिमालय अवरोधक बनता है.
अप्रैल का पहला हफ्ता भी रहेगा ठंडा
2 अप्रैल से एक नया पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो रहा है, जिससे अप्रैल का पहला हफ्ता उत्तर भारत में ठंडा और बादल छाए रहने वाला रहेगा. IMD के अनुसार, 2-3 अप्रैल से नया सिस्टम पाकिस्तान के ऊपर सक्रिय होगा. इससे 3-6 अप्रैल तक दिल्ली-एनसीआर, यूपी, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड में बूंदाबांदी, आंधी, गरज-चमक और पहाड़ों में बर्फबारी संभव. तापमान सामान्य से 2-4°C नीचे रहेगा.9 अप्रैल के बाद गर्मी बढ़ने की संभावना, लेकिन अभी अप्रैल की शुरुआत “कूल-कूल” रहेगी.





