नई दिल्ली. पश्चिम एशिया में टेंशन के बीच भारत ने ऐसा काम किया है, जिससे उसके पड़ोसियों में खौफ देखा जा रहा है. भारतीय नौसेना नीले समंदर में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए लगातार स्वदेशी युद्धपोत शामिल कर रही है. एक के बाद एक वॉरशिप नौसेना को मिलते जा रहे हैं. इसी कड़ी में 30 मार्च का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब एक ही दिन में नौसेना को तीन स्वदेशी जहाज सौंपे गए. गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने यह उपलब्धि हासिल की. इनमें एक गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट, दूसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्राफ्ट और तीसरा सर्वे वेसेल शामिल है.
नीलगिरी क्लास का एडवांस्ड गाइडेड स्टेल्थ फ्रिगेट ‘तारागिरी’ नौसेना में शामिल होने जा रहा है. 3 अप्रैल को विशाखापत्तनम में इसे औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा. इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसे नौसेना को समर्पित करेंगे. इससे ठीक तीन दिन पहले, 30 मार्च को जीआरएसई ने प्रोजेक्ट 17ए के तहत पांचवां गाइडेड स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दूनागिरी’ भी नौसेना को सौंप दिया. नौसेना जल्द ही इस नए वॉरशिप को शामिल करेगी. ‘दूनागिरी’ पूर्ववर्ती आईएनएस दुनागिरी का आधुनिक रूप है, जो लींडर श्रेणी का फ्रिगेट था और 5 मई 1977 से 10 अक्टूबर 2010 तक नौसेना का हिस्सा रहा.
यह पिछले 16 महीनों में भारतीय नौसेना को सौंपा गया पी17ए श्रेणी का पांचवां युद्धपोत है. पहले चार जहाजों के अनुभव के आधार पर इसके निर्माण का समय 93 महीनों से घटाकर 80 महीने कर दिया गया. प्रोजेक्ट 17ए के तहत सात नीलगिरी क्लास फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं. इनमें से पहला आईएनएस नीलगिरी जनवरी 2025 में शामिल हुआ, इसके बाद हिमगिरी और उदयगिरी भी शामिल किए जा चुके हैं. अब तारागिरी की बारी है.
इन सभी फ्रिगेट्स में ब्रह्मोस मिसाइल लगी है, जो एंटी-शिप और एंटी-सरफेस युद्ध में बेहद प्रभावी है. इसके अलावा: ‘बराक-8’ लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, एयर डिफेंस गन, स्वदेशी टॉरपीडो ‘वरुणास्त्र’, एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, आधुनिक सोनार, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और मल्टी-फंक्शन रडार से लैस यह फ्रिगेट दुश्मन के हमलों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम है. इसमें दो हेलिकॉप्टर के लिए हैंगर भी मौजूद है. इन फ्रिगेट्स में लगभग 75% उपकरण स्वदेशी हैं और डिजाइन भी नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा तैयार किया गया है. 6700 टन वजनी यह जहाज 30 नॉटिकल मील प्रति घंटे की गति से चल सकता है.
दुश्मन की पनडुब्बियों से निपटने के लिए भारतीय नौसेना ने एएसडब्ल्यू (एंटी-सबमरीन वॉरफेयर) शैलो वॉटर क्राफ्ट परियोजना शुरू की. 2019 में 16 जहाजों के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया, जिनमें 8 कोचिन शिपयार्ड में और 8 जीआरएसई में बनाए जा रहे हैं. इसी परियोजना के तहत जीआरएसई ने ‘अग्रे’ को नौसेना को सौंप दिया है. इससे पहले आईएनएस अर्णाला, आईएनएस अंद्रोत्त, आईएनएस माहे और आईएनएस अंजदीप शामिल किए जा चुके हैं. इस क्राफ्ट की प्रमुख विशेषताएं हैं एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नेवल गन, हल-माउंटेड सोनार और वैरिएबल डेप्थ सोनार से लैस है. यह 25 नॉटिकल मील प्रति घंटे की गति से चल सकता है और लगभग 3300 किमी तक की दूरी तय कर सकता है. यह तट से 100–150 नॉटिकल मील तक दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम है.
समुद्र के भीतर की स्थिति को समझना और हाइड्रोग्राफिक सर्वे करना आज बेहद आवश्यक है. इन्हीं सर्वे के आधार पर सुरक्षित नेविगेशन के लिए चार्ट तैयार किए जाते हैं. भारतीय नौसेना ने 30 अक्टूबर 2018 को चार बड़े सर्वे जहाजों के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट किया था. इस श्रृंखला में आईएनएस संध्याक और आईएनएस निर्देशक साल 2024 में नेवी में शामिल किए गए थे, तो पिछले साल आईएनएस इक्षक को नौसेना का हिस्सा बनाया गया था. अब चौथा और अंतिम सर्वे वेसल ‘संशोधक’ भी नौसेना को सौंप दिया गया है. समुद्र की सतह भले शांत दिखे, लेकिन नीचे कई तरह के खतरे होते हैं – कहीं गहराई अधिक, कहीं कम. सुनामी जैसी घटनाओं से समुद्र तल में लगातार बदलाव होता रहता है. इन अदृश्य खतरों से बचने के लिए हाइड्रोग्राफिक मैप बेहद जरूरी होते हैं, जिन्हें ऐसे सर्वे जहाज तैयार करते हैं. यह समुद्र तल की स्कैनिंग करता है, सुरक्षित नेविगेशन रूट तैयार करता है, समुद्री मानचित्र (चार्ट) बनाता है. जीआरएसई, कोलकाता में निर्मित इस जहाज में 80% से अधिक सामग्री स्वदेशी है.
यह भारतीय नौसेना के नौसेना डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया गया है. इसकी लंबाई 110 मीटर और वजन लगभग 3800 टन है. दो डीजल इंजन वाला यह वेसल 25 दिनों से अधिक समुद्र में रहने की क्षमता रखता है और 18 समुद्री मील प्रति घंटा की अधिकतम गति से चल सकता है. यह जहाज भारत की समुद्री सुरक्षा और समुद्री क्षेत्र के मानचित्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.




