पानी के बदले तेल! काश, इस डील पर बन जाती बात, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्या अमेरिका भी नहीं दिखा पाता आंख

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Mumbai-Fujairah Under Water Hyperloop Tunnel: ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग ने दुनिया में काफी कुछ बदल दिया है. ईरान ने पूरे अरब क्षेत्र में कोहराम मचा रखा है. हालांकि अमेरिका और इजरायल के हमलों में उसको भी बड़ी तबाही झेलनी पड़ी है. किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि इस जंग में ईरान इस तरीके से पलटवार करेगा. यह जंग चौथे सप्ताह में एंटर कर गई है. हजारों लोगों की मौत के साथ अरबों-खरबों डॉलर का नुकसान हुआ है. इस नुकसान की आंच अब भारत भी पहुंचने लगी है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और एलपीजी सप्लाई चेन में बाधा का असर दिखने लगा है. एलपीजी सिलेंडरों की कमी दिखने लगी है. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी सोमवार को कहा था कि इस जंग के अप्रत्याशित असर होंगे. दुनिया में महंगाई सातवें आसमान पर पहुंच रही है.

खैर, हम इस जंग की नहीं बल्कि इस जंग के बहाने एक प्रोजेक्ट की बात करने जा रहे हैं. अगर उस पर बात बन जाती तो भारत की एक बड़ी समस्या खत्म हो जाती. भारत पानी भेजकर तेल मंगाता और भारत के लोग हर रोज मुंबई-दुबई के बीच अप-डाउन करते. यह बात आपको काल्पनिक लग सकती है लेकिन यह सच्चाई है. भारत की मुंबई नगरी को संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएएस से समंदर में सुरंग बिछाकर जोड़ने की एक योजना बनी थी. यह एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था और इसे पूरा करने में 500 से 600 अरब डॉलर खर्च होने की संभावना थी. अगर यह प्रोजेक्ट पूरा होता तो सुरंग में एक तरफ हाईपरलूप ट्रेन तो दूसरी तरफ पानी और कच्चे तेल की पाइपलाइन होती. इस प्रोजेक्ट के तहत यूएई के फुजैराह को मुंबई से जोड़ना था. इसकी दूरी करीब 2000 किमी होती.

मुंबई-फुजैराह सबसी टनल

यूएई की एक कंपनी नेशनल एडवायजर ब्यूरो लिमिटेड ने इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव दिया था. कंपनी की योजना 2000 किमी की दूरी अल्ट्रा हाईस्पीड मैगलेव या हाइपरलूप टेक्नोलॉजी से पूरी करने की थी. इसकी स्पीड 600 से 1000 किमी प्रति घंटे की होती. यानी मुंबई से फुजैराह जाने में केवल दो से तीन घंटे का वक्त लगता.

इस प्रोजेक्ट में हाइपरलूप ट्यूब ट्रेन चलाने के साथ सुरंग में दो बड़े पाइपलान बिछाने की योजना थी. इसमें से एक पाइप लाइप के जरिए यूएई से कच्चा तेल और गैस भारत लाया जाता, जबकि दूसरी पाइपलाइन से नर्मदा नदी का ताजा पानी दुबई पहुंचाया जाता.

इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव काफी पहले रखा गया था. लेकिन, आज भी यह प्रोजेक्ट केवल कंसेप्ट के स्तर पर है. इस पर ठोस रूप से कोई प्रगति नहीं हुई है. इसको लेकर भारत और यूएई की सरकारों के बीच भी कोई आधिकारिक समझौता नहीं हुआ है. इस प्रोजेक्ट की फिजिबलिटी स्टडी कराने की चर्चा होती रही है.

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को काफी हद तक बंद कर दिया है. फोटो- रायटर

कितना अहम है यह प्रोजेक्ट

रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रोजेक्ट पर अगर भारत और यूएई आगे बढ़ते तो यह दुनिया की एक सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना होती. इससे भारत और यूएई के बीच आवाजाही दिल्ली-मेरठ की तरह हो जाती. इससे भारी आर्थिक प्रगति होती. भारत के शुद्ध और मीठे पानी से यूएई आबाद होता तो भारत भी यूएई के तेल से मालामाल होता.

कैसी होगी टनल

इस प्रोजेक्ट में जो टनल बनाने का प्रस्ताव था उसे फ्लोटिंग मोड में बनाया जाना था. दरअसल अरब सागर बहुत गहरा है और ऐसे में सतह पर टनल बिछाना एक मुश्किल काम है. ऐसे में प्रस्तावित टनल समंदर की सतह से 30 मीटर अंदर रखने की योजना थी. इसके लिए कई आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की योजना थी. कुछ डिजाइन में टनल को ट्रांसपैरेंट मैटेरियल से बनाने की योजना पेश की गई है जिससे कि टनल में सफर करने वाले लोग हाईपरलूप ट्रेन से समंदर की खूबसूरती निहार सकें.

प्रोजेक्ट की क्या है मौजूदा स्थिति

इसी साल जनवरी में यूईए के अमीर ने भारत की यात्रा की थी. इस दौरान दोनों देशों ने इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई समझौते किए थे. हालांकि इस प्रस्तावित अंडरवाटर टनल को लेकर कोई बातचीत सामने नहीं आई. तमाम जानकार और रिपोर्ट यह सुझाव देती है कि 2030 के आसपास इस टनल को लेकर बात आगे बढ़ सकती है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नहीं पड़ती जरूरत

इस प्रोजेक्ट का सामरिक महत्व भी काफी ज्यादा है. अगर यह प्रोजेक्ट तैयार हो जाता तो आज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने की वजह से भारत और दुनिया को जो परेशानी हो रही है वह नहीं होता. ओमान और ईरान के बीच स्थिति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की ढुलाई होती है. लेकिन, इस टनल की योजना यूएई के फुजौराह से मुंबई को कनेक्ट करने की थी. यह यूएई की एकमात्र ऐसी जगह हो जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के अलग है. रणनीतिक रूप से यह फुजैराह अमन की खाड़ी में स्थित है. ऐसे में अगर यह पाइप लाइन बन जाती तो भारत सीधे यूएई से तेल हासिल करता. इतना ही नहीं स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने पर भी इसकी सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ता.
भारत और यूएई के बीच रिश्ते बहुत अच्छे हैं. बड़ी संख्या में भारतीय दुबई में रहते हैं. फोटो- रायटर

चीन को भी शामिल करने की योजना

इस प्रोजेक्ट की कल्पना यूएई के नेशनल एडवायजर ब्यूरो ने की थी. वह इसको केवल मुंबई तक सीमित नहीं रखना चाहता है. उसकी योजना इस टनल से चीन को एक्सेस देने की थी. यानी यूएई चाहता है कि इस टनल को बीच में पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ा जाए. ग्वादर पोर्ट को चीन ने विकसित किया है. इससे चीन को मध्य पूर्व के बाजार में ग्वादर पोर्ट से सीधी पहुंच मिल जाएगी. इस तरह इस पूरे क्षेत्र में व्यापार में भारी बढ़ोतरी होती. अगर ऐसा होता है तो पश्चिम एशिया के पूरे इलाके तक भारत की सीधी पहुंच होती. भारत से पानी के साथ-साथ ताजे फलों और सब्जियों के लिए एक बड़ा बाजार मिलता. बदले में भारत को भी सस्ते दाम और बेरोकटोक तेल की सप्लाई मिलती. इससे अमेरिका भी भारत के ट्रेड डील और टैरिफ की धमकियों के बीच गाहे बगाहे आंख दिखाने की कोशिश नहीं करता.

क्या है प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा इसकी इंजीनियरिंग पक्ष है. अभी तक दुनिया में कहीं भी समंदर के भीतर इतनी लंबी टनल नहीं बनी है. ब्रिटेन और फ्रांस के बीच बनी समंदर के भीतर एक 50 किमी लंबी टनल है, जो दोनों देशों को रेल मार्ग से जोड़ती है. इसके अलावा भारत में अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के तहत समंदर के भीतर टनल बनाई जा रही है. लेकिन, इसकी लंबाई केवल सात किमी है. ऐसे में 2000 किमी लंबी टनल बनाना इंजीनियरिंग के हिसाब से एक बहुत बड़ी चुनौती है. दूसरी सबसे बड़ी बाधा इसकी लागत है. अनुमान लगाया जाता है कि एक किमी लंबी टनल बनाने में 2000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आएगी. फ्रांस और ब्रिटेन के बीच 50 किमी लंबी टन बनाने में 15 अरब डॉलर की लागत आई थी. ऐसे मुंबई-यूएई के बीच की टनल इससे 40 गुना अधिक लंबी होने वाली है. ऐसे में इसकी लागत का अनुमान आप खुद लगा सकते हैं.



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