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पेट्रोल-डीजल पर नया अलर्ट आ गया है. जिस सऊदी अरब से भारत हर रोज करोड़ों लीटर कच्चा तेल मंगाता है, उस सऊदी अरब की सबसे बड़ी कंपनी आरामको ने अचानक से प्रीमियम 8 से 10 गुना बढ़ा दिए हैं. यानी अब तेल 15 से 20 डॉलर प्रति बैरल महंगा हो जाएगा.
सऊदी अरब की आरामको ने कच्चे तेल पर प्रीमियम 8 से 10 गुना बढ़ा दिया है. (AI Image)
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पहले ही तेल-गैस नहीं आ पा रहा है. अब सऊदी अरब ने चुपके से इतना बड़ा खेल कर दिया है, जो भारत को परेशान करने वाला है. सऊदी की सबसे बड़ी कंपनी आरामको ने अगले महीने यानी मई के लिए कच्चे तेल की कीमतों में ‘सरचार्ज’या अतिरिक्त शुल्क 10 गुना तक बढ़ा दिया है. भारत जैसे एशियाई देशों को यह प्रीमियम 8 गुना देना पड़ेगा जबकि यूरोपीय देशों को 10 गुना चुकाने पर ही तेल मिलेगा.
इसका मतलब क्या है?
- कच्चे तेल की कीमत दो हिस्सों से मिलकर बनती है. एक रेफरेंस रेट , जैसे ब्रेंट क्रूड या दुबई-ओमान की औसत कीमत और दूसरा ‘प्रीमियम’. यह तेल उत्पादक देश अपनी लागत और मांग के आधार पर जोड़ते हैं. बीबीसी फारसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी कंपनी आरामको ने फ्यूचर डील के लिए नया प्रीमियम रेट जारी किया है.
- अप्रैल महीने में भारत जैसे एशियाई देशों को मिलने वाले सऊदी लाइट क्रूड पर यह अतिरिक्त शुल्क 2.5 डॉलर प्रति बैरल था. अब मई के लिए इसे बढ़ाकर सीधे 19.5 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है. यानी सीधे 8 गुना की बढ़ोतरी कर दी गई है.
- जबकि यूरोपीय देशों को पहले यह रेट 2.65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ाकर 27.65 डॉलर प्रति बैरल कर दी गई है. यानी यूरोपीय देशों को अगर तेल खरीदना है तो उन्हें 10 गुना ज्यादा प्रीमियम देना होगा.
सऊदी अरब ऐसा क्यों कर रहा है?
ईरान जंग की वजह से होर्मुज बंद हो चुका है. इराक, कुवैत, बहरीन और कतर जैसे देश अपना तेल नहीं बेच पा रहे हैं. लेकिन सऊदी अरब के पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है, जिससे वह खाड़ी के बजाय लाल सागर के रास्ते अपना तेल दुनिया को बेच रहा है. सप्लाई कम है और डिमांड ज्यादा. मौका देखकर सऊदी अरब मुनाफाखोरी में जुट गया है.
भारत सऊदी अरब से कितना मंगाता है तेल?
सऊदी अरब भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है. भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 15% से 18% हिस्सा अकेले सऊदी अरब से लेता है. भारत हर दिन सऊदी अरब से लगभग 10 लाख से 11 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदता है.
भारत को देना पड़ा तो कितना महंगा पड़ेगा?
- अगर देना पड़ा तो भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों जैसे IOCL, BPCL, HPCL को कच्चा तेल बहुत महंगा पड़ेगा. यदि कच्चा तेल 15-20 डॉलर प्रति बैरल महंगा होता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10 से 15 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की आशंका पैदा हो जाएगी. आम आदमी पर असर पड़ सकता है.
- जब डीजल महंगा होता है, तो फल, सब्जियां, अनाज और फैक्ट्री में बने सामान को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने का खर्च बढ़ जाता है. भारत पहले से ही महंगाई से लड़ रहा है, ऐसे में तेल का यह ‘शॉक’ खाने-पीने की चीजों को और महंगा कर देगा.
- भारत को तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से ज्यादा डॉलर बाहर जाएंगे. इससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा. डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये की कीमत में और गिरावट आ सकती है, जिससे अन्य चीजों का आयात महंगा हो जाएगा.
- भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपना विदेशी मुद्रा भंडार बहुत मेहनत से बनाया है. लेकिन अगर सऊदी अरब और अन्य ओपेक (OPEC) देश इसी तरह कीमतें बढ़ाते रहे, तो भारत को अपनी मुद्रा बचाने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ेंगे, जो देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के बजट को प्रभावित कर सकता है.
- भारतीय रिफाइनरी कंपनियां पहले ही मिडिल ईस्ट के संकट के कारण तनाव में हैं. कच्चा तेल महंगा होने और जनता को राहत देने के दबाव के बीच इन कंपनियों के ‘ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन’गिर सकते हैं, जिससे शेयर बाजार में इन कंपनियों के शेयरों पर बुरा असर पड़ेगा.
भारत के पास अब क्या रास्ता है?
- भारत अब रूस से और भी अधिक मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीदने की कोशिश करेगा. रूस ने पहले ही भारत को ‘अनलिमिटेड सप्लाई’ का भरोसा दिया है.
- भारत अपने भूमिगत तेल भंडारों (SPR) से तेल निकाल सकता है ताकि बाजार में सप्लाई बनी रहे और कीमतें अचानक न बढ़ें.
- सरकार घरों में गैस और तेल की निर्भरता कम करने के लिए इंडक्शन कुकटॉप और सोलर एनर्जी को युद्ध स्तर पर बढ़ावा दे रही है.
- मुमकिन है कि प्रधानमंत्री मोदी सीधे सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात कर भारत के लिए विशेष रियायत की मांग करें, जैसा कि पहले भी कई बार हुआ है.
रिफाइनरियों के लिए क्यों जरूरी है सऊदी तेल?
भारत की रिफाइनरियां सऊदी लाइट क्रूड के हिसाब से डिजाइन की गई हैं. यह तेल रिफाइन करने में आसान होता है और इससे पेट्रोल-डीजल ज्यादा मात्रा में निकलता है. इतना ही नहीं, सऊदी अरब से तेल आने में केवल 4-5 दिन लगते हैं, जबकि रूस या अमेरिका से तेल आने में हफ्तों लग जाते हैं. संकट के समय में जल्दी सप्लाई की गारंटी केवल सऊदी दे पा रहा है क्योंकि उसके पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है जो युद्ध प्रभावित फारस की खाड़ी को बाईपास कर देती है.
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Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for ‘Hindustan Times Group…और पढ़ें





