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बिहार के पूर्वी चंपारण में एक ऐसा गांव है जहां मल्लाहों को मछली पालने की जरूरत नहीं पड़ती. यहां एक ऐसा प्राकृतिक तलाब है जहां नदी की मछलियां बाढ़ में दहकर खुद आ जाती हैं. इन मछलियों में झींगा मछली भी आती हैं जिन्हें बेचकर मल्लाह अच्छा पैसा कमा लेते हैं. वे झींगा मछली के बारे में विशेष बातें भी बताते हैं.
प्रकृति का खेल भी विचित्र है. कभी -कभी यह अपने प्रकोप से एक झटके में सबकुछ बर्बाद कर देती है तो कई दफा ऐसी भी तस्वीरें सामने आती है. जब प्रकृति ने अपने परिवर्तनशील और गतिशील स्वभाव के कारण किसी जगह का नई सौगात दे दी हो. कुछ ऐसी हीं तस्वीरें बिहार के पूर्वी चंपारण के सुगौली प्रखंड के एक गांव में देखने को मिली है. इस गांव का नाम है शीतलपुर। दरअसल, इस गांव के पास एक कदम पुल है जिसके नीचे किसी समय बड़ा गड्ढा था जो मौजूदा समय में एक बड़ा तालाब बन गया है.
हर साल आने वाली बाढ़ ने इस गड्ढे को बड़ा तालाब बना दिया है. इस तालाब में नदी की मछलियां भरपूर मात्रा में पाई जाती हैं. मल्लाहों को न तो मत्स्य पालन करने की जरूरत है और न हीं मछलियों को दाना -पाने देने की जरूरत है. वे बस मछलियां पकड़ते हैं और मार्केट में बेचकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं। नदी की इन्हीं मछलियों में एक विशेष मछली भी इस तालाब में खूब पाई जाती है। इस मछली का नाम है झींगा जो स्वाद और सेहत का अनोखा संगम है। इस मछली में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन और विटामिन्स पाए जाते हैं जिस कारण डॉक्टर भी इसे खाने की सलाह देते है.
मछली पालन से लाखों रुपये कमा रहे
इस मछली के संदर्भ में जब स्थानीय मल्लाह से बात हुई तो उन्होंने झींगा मछली के विषय में कई अहम जानकारी प्रदान की. वे बताते हैं कि झींगा मछली दिखने में अन्य मछलियों से बेहद अलग होती है, यह हल्के पीले रंग की होती है. इसकी पतली बड़ी – बड़ी मूंछें भी होती हैं. वे बताते हैं कि झींगा मछली अपना प्रजनन स्वयं करती है और इसे पाला नहीं जाता है. यह मछली लगभग 4 महीने के अंतराल पर वर्ष में तीन बार अंडे देती है. उनका कहना है कि झींगा मछली अन्य मछलियों से काफी महंगी होती है. चंपारण में 800 से 900 रुपए किलो बिकती है. वे बताते हैं कि चंपारण के लोग झींगा मछली बड़े चाव से खाते हैं. ये इसे फ्राई कर के भुजे के साथ मजे से खाते हैं. कुछ लोग झींगा मछली की पकौड़ी भी बनाते हैं, लोग बताते हैं कि झींगा मछली का पकौड़ी बेहद स्वादिष्ट होता है.





