बंगाल में राहुल की एंट्री और कांग्रेस का ‘एकला चलो’ दांव से किसको फायदा, ममता बनर्जी खुश होंगी या बीजेपी?

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कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अब उस मोड़ पर आ गया है जहां हर चाल एक नए समीकरण को जन्म दे रही है. रविवार को कांग्रेस ने 284 उम्मीदवारों की अपनी पहली और बड़ी सूची जारी कर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है. इस सूची के साथ ही कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ किसी भी तरह के ‘समझौते’ के मूड में नहीं है. ऐसे में बड़ा सवाल राहुल गांधी पश्चिम बंगाल चुनाव में कब कैंपेन के लिए उतरेंगे और उससे ममता बनर्जी खुश होंगी या बीजेपी?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस का अकेले लड़ने का फैसला राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह बदलेगा? 284 उम्मीदवारों की सूची के साथ कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह त्रिकोणीय मुकाबले के लिए तैयार है. लेकिन क्या यह ‘एकला चलो’ की नीति ममता बनर्जी के लिए राहत बनेगी या बीजेपी के ‘मिशन बंगाल’ को आसान करेगी? पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव अब द्विध्रुवीय TMC vs BJP से त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रहे हैं. कांग्रेस ने रविवार को 284 उम्मीदवारों की सूची जारी कर यह साफ कर दिया है कि वह इंडिया गठबंधन (I.N.D.I.A.) के राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर बंगाल में अपनी पहचान बचाने की लड़ाई लड़ेगी. कांग्रेस के इस ‘सोलो’ दांव ने राज्य के 294 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत-हार के पुराने गणित को हिला सकता है.

कांग्रेस सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी वर्तमान में केरल चुनाव में फोकस कर रखा है. क्योंकि केरल में 9 अप्रैल को मतदान है. राहुल गांधी ने केरल में अपना धुआंधार प्रचार शुरू भी कर दिया है. बंगाल का कार्यक्रम अप्रैल के दूसरे सप्ताह में होने की संभावना है. राहुल गांधी मुख्य रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ों में रैलियां करेंगे. उनका लक्ष्य उन मुस्लिम और दलित मतदाताओं को वापस जोड़ना है, जो पिछले चुनावों में टीएमसी की तरफ शिफ्ट हो गए थे.

पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस अकेले उतरी.

कांग्रेस की रणनीति ‘मदद’ या ‘मुकाबला’?

कांग्रेस द्वारा 284 सीटों पर उम्मीदवार उतारना एक बड़ा जोखिम माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का अकेले लड़ना ममता बनर्जी के लिए ‘दोधारी तलवार’ जैसा है. कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने से जो मतदाता टीएमसी से नाराज हैं लेकिन बीजेपी को वोट नहीं देना चाहते, उनके पास ‘कांग्रेस-लेफ्ट’ का विकल्प होगा. इससे ‘एंटी-इनकंबेंसी’ यानी सत्ता विरोधी वोट बीजेपी और कांग्रेस के बीच बंट जाएगा, जिसका सीधा फायदा तृणमूल कांग्रेस को मिल सकता है. 2021 के चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर काफी गिर गया था, जिसका बड़ा हिस्सा बीजेपी की तरफ चला गया था. अगर कांग्रेस अपना 5-8% वोट वापस खींचने में कामयाब रहती है, तो यह सीधे तौर पर बीजेपी के नुकसान में तब्दील हो सकता है.

मुस्लिम वोट बटेंगे तो किसको होगा फायदा?

बंगाल की राजनीति में करीब 27 से 30% मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. कांग्रेस के अकेले लड़ने से सबसे बड़ा खतरा मुस्लिम वोटों के बंटवारे का है. मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में कांग्रेस का आज भी मजबूत आधार है. यहां कांग्रेस ने ‘दमदार’ उम्मीदवार उतारे हैं. अगर मुस्लिम वोट टीएमसी और कांग्रेस में बंटता है, तो कई सीटों पर बीजेपी की राह आसान हो सकती है. बीजेपी को उम्मीद है कि त्रिकोणीय मुकाबले में जहां भी विपक्ष का वोट बंटेगा, वहां उनकी ‘सॉलिड’ हिंदू वोटिंग उन्हें जीत दिला देगी.

कांग्रेस के अकेले लड़ने से सबसे बड़ा खतरा मुस्लिम वोटों के बंटवारे का है.

कांग्रेस ने इन दिग्गजों को क्यों उतारा?

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी जो खुद बहरामपुर से चुनाव लड़ रहे हैं, शुरू से ही ममता बनर्जी के कड़े विरोधी रहे हैं. उनके दबाव के चलते ही कांग्रेस ने ‘एकला चलो’ की नीति अपनाई है. कांग्रेस का मानना है कि अकेले लड़ने से पार्टी का संगठन मजबूत होगा और वे 2021 के ‘शून्य’ के कलंक को धो पाएंगे.

अधीर रंजन चौधरी: बहरामपुर सीट से.

प्रदीप प्रसाद: भवानीपुर सीट से (ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ).

मौसम नूर: मालतीपुर सीट से.

पवित्र कार: नंदीग्राम सीट से (सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ).

साल 2021 में कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर मात्र 3% रह गया था. इस बार कांग्रेस का लक्ष्य अपनी खोई हुई जमीन विशेषकर मालदा और मुर्शिदाबाद को वापस पाना है. यदि कांग्रेस 8-10% वोट भी हासिल करती है, तो यह कई सीटों पर टीएमसी और बीजेपी दोनों के समीकरण बिगाड़ सकती है. फिलहाल की स्थिति को देखें तो कांग्रेस का अकेले लड़ना ममता बनर्जी के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद दिख रहा है क्योंकि यह बीजेपी के कट्टर ‘एंटी-टीएमसी’ वोट बैंक में सेंध लगा सकता है. हालांकि, मालदा और मुर्शिदाबाद की लगभग 40-50 सीटों पर यह मुकाबला बीजेपी को सीधा फायदा भी पहुंचा सकता है.



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