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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साल 2017 में बंगाल में शिकागो और हार्वर्ड जैसी यूनिवर्सिटीज बनाने का वादा किया था, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. 2017-18 में घोषित 11 नई यूनिवर्सिटीज आज बिना स्थायी कैंपस और गेस्ट फैकल्टी के भरोसे चल रही हैं. 500 रुपये प्रति क्लास पर पढ़ाने वाले शिक्षकों और गिरती छात्र संख्या ने शिक्षा के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जानें पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में यह मुद्दा कितना गर्माएगा?
ममता बनर्जी ने बंगाल में 11 नए विश्वविद्यालय खोले थे.
कोलकाता. ‘बंगाल के छात्रों को शिकागो या हार्वर्ड जाने की क्या जरूरत है, जब हम यहीं वैसी यूनिवर्सिटी बना सकते हैं?’ जनवरी 2017 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इन शब्दों ने बंगाल के लाखों युवाओं में एक नई उम्मीद जगाई थी. 2011 में सत्ता संभालने के बाद से टीएमसी सरकार ने उच्च शिक्षा के विस्तार का दावा किया और 2017-18 के बीच दार्जिलिंग से लेकर झाड़ग्राम तक 11 नई यूनिवर्सिटीज की घोषणा की. लेकिन आज, लगभग एक दशक बाद, ममता के इन ड्रीम प्रोजेक्ट्स की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर नजर आ रही है. जिस जमीन पर बंगाल की टीएमसी सरकार ने शिकागो और हार्वर्ड बनाने का सपना युवाओं को दिखाया था, वहां अब गेहूं के दाने मजदूर सुखा रहे हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की ताजा पड़ताल के अनुसार, जिन 11 विश्वविद्यालयों की स्थापना बड़े जोर-शोर से की गई थी, उनमें से 7 आज भी अस्थायी कैंपस में चल रहे हैं. ये यूनिवर्सिटीज कहीं किसी पुराने स्कूल की बिल्डिंग में, तो कहीं किसी किराए के सरकारी दफ्तर के कमरों में सिमटी हुई हैं. इन 11 संस्थानों में से किसी के पास भी अपना स्थायी टीचिंग स्टाफ (Permanent Faculty) नहीं है. 500 रुपये की दिहाड़ी पर प्रोफेसर काम कर रहे हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां पढ़ाने वाले गेस्ट लेक्चरर्स को मात्र 500 प्रति क्लास के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है. इतनी कम राशि में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की उम्मीद करना बेमानी साबित हो रहा है.
जब इन यूनिवर्सिटीज में क्लास शुरू हुईं तो साल 2021 में तब छात्रों में उत्साह था. लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी और लैब-लाइब्रेरी जैसी सुविधाओं के अभाव ने छात्रों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है. कई यूनिवर्सिटीज में न तो पर्याप्त कंप्यूटर लैब हैं और न ही शोध के लिए कोई आधुनिक उपकरण.
पिछले दो सालों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है.
राज्यपाल और ममता की लड़ाई में क्या चढ़ गया भेंट?
दार्जिलिंग, अलीपुरद्वार और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में स्थित इन संस्थानों में पिछले दो सालों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट आई है. छात्र अब इन नई यूनिवर्सिटीज के बजाय पुराने और प्रतिष्ठित कॉलेजों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
सियासी टकराव की भेंट चढ़ा भविष्य
इन यूनिवर्सिटीज की इस दुर्दशा के पीछे एक बड़ी वजह राज्य सरकार और राज्यपाल जो विश्वविद्यालयों के चांसलर होते हैं, के बीच चल रहा लंबा टकराव भी है. कुलपतियों की नियुक्ति से लेकर फंड के आवंटन तक, राजभवन और सचिवालय के बीच की खींचतान ने प्रशासनिक कार्यों को ठप कर दिया है. परिणाम यह है कि जो प्रोजेक्ट्स 2021 तक पूरे हो जाने चाहिए थे, वे आज भी फाइलों और अधूरे निर्माण कार्यों के बीच फंसे हैं.
बीजेपी और लेफ्ट ने इस मुद्दे पर ममता सरकार को आड़े हाथों लिया है. विपक्ष का आरोप है कि ये यूनिवर्सिटीज केवल चुनावी रैलियों में वाहवाही लूटने के लिए बनाई गई थीं. बिना बजट और बिना विजन के यूनिवर्सिटी खोल देना शिक्षा के साथ खिलवाड़ है. मुख्यमंत्री का विजन ‘शिकागो’ और ‘हार्वर्ड’ जैसा था, लेकिन फिलहाल बंगाल की ये नई यूनिवर्सिटीज अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं. 2026 के चुनाव में ‘शिक्षा और रोजगार’ के मुद्दे पर यह रिपोर्ट टीएमसी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है.
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भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले रविशंकर सिंह सहारा समय न्यूज चैनल, तहलका, पी-7 और लाइव इंडिया न्यूज चैनल के अलावा फर्स्टपोस्ट हिंदी डिजिटल साइट में भी काम कर चुके हैं. राजनीतिक खबरों के अलावा…और पढ़ें





