ईरान में करीब 109 दिनों की कैद काटकर वापस लौटे केतन मेहता के लिए यह जिंदगी किसी दूसरी जिंदगी की तरह है. आज भी ईरान में हुए पूरे घटनाक्रम को याद कर उनका तनबदन कांप उठता है. गनीमत रही कि 109 दिनों की रूह कंपा देने वाली जद्दोजहद के बाद केतन अपने घर गाजियाबाद वापस आ गई है. आइए मर्चेंट नेवी में बतौर इंजीनियर तैनात केतन मेहता की कहानी उन्हीं की जुबानी जानते हैं.
8 दिसंबर 2025… वह दिन मैं कभी नहीं भूल सकता. हम अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में थे. अचानक एक दूसरे शिप को मदद के लिए क इमरजेंसी कॉल आई. वहां पहुंचने तक तो सबकुछ ठीक था, लेकिन कुछ पलों के ही बाद माहौल अचानक पूरी तरह से बदल गया. मैं इंजन रूम में था, तभी ऊपर से वार्निंग की आवाज आई. मैं कुछ समझ पाता, उससे पहले ही गोलियों की बौछार शुरू हो गई. ऐसा लग रहा था जैसे आसमान से आग बरस रही हो.
शिप में दागी गई 250 गोलियां और फिर…
बाद में पता चला, करीब 250 गोलियां हमारे शिप पर दागी गई थीं. मैंने तुरंत इमरजेंसी ब्रेक लगाकर शिप को रोकने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. कुछ ही देर में ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने हमारे शिप को घेर लिया. हमें बाहर निकाला गया और फिर हम सब बंधक बन गए. उस पल मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं कभी घर वापस नहीं जा पाऊंगा. करीब 50 दिन हमने जेल में बिताए.
जेल में हर दिन डर और अनिश्चितता के बीच बीतता. कोई नहीं बताता था कि हमारे साथ आगे क्या होगा. हर आवाज पर दिल धड़क उठता था. कई बार लगा कि अब सब खत्म हो जाएगा. 27 फरवरी को हमें बंदर अब्बास के एक होटल में ले जाया गया. शुरुआत में लगा कि शायद अब हालात सुधरेंगे, लेकिन असली डर तो वहां था. होटल के पास ही ईरान का बड़ा नेवी बेस था. रात-दिन मिसाइलों की आवाज सुनाई देती थी. कई बार इतनी नजदीक धमाके होते थे कि पूरा कमरा कांप उठता था.
लगा मानों मौत बस कुछ कदम दूर खड़ी है…
ऐसा लगता था जैसे मौत बस कुछ कदम दूर खड़ी हो. फिर एक दिन हमें वहां से आर्मेनिया ले जाया गया. करीब 1500 किलोमीटर का सफर हमारे लिए रुह कंपा देने वाला सफर था. रास्ते में मैने जो तबाही देखी, वह जिंदगी भर नहीं भूल सकता. जले हुए इलाके, टूटी इमारतें और हर तरफ खामोश. ऐसा लग रहा था मानों जिंदगी वहां आकर थम सी गइ्र हो. आज भी रात में अचानक नींद खुल जाती है. ऐसा लगता है जैसे फिर से गोलियां चल रही हों.
दिल तेजी से धड़कने लगता है. ये डर शायद इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है. 28 मार्च 2026 को मैं सऊदी होते हुए मुंबई पहुंचा और 30 मार्च को मुंबई से गाजियाबाद. घर पहुंचने के बाद जैसे ही मां ने मुझे गले लगाया, तब जाकर लगा कि अब सब ठीक है. मां ने मेरी सलामती के लिए भैरव बाबा से मन्नत मांगी थी, जो अब पूरी हो गई है. बहन शिवानी ने दूतावास से लेकर प्रधानमंत्री तक हर जगह मदद की गुहार लगाई.
पीएम मोदी का दिल से शुक्रिया
मैं आज जिंदा हूं, सुरक्षित हूं, इसके लिए मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री का दिल से धन्यवाद करता हूं. उनकी कोशिशों की वजह से ही मैं अपने परिवार के पास लौट पाया.





