How Kidney transplant Nexus works: कानपुर के किडनी कांड ने भले ही एक बार फिर देश में सनसनी मचा दी हो लेकिन भारत में यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी यहां किडनी के बड़े-बड़े कांडों का पर्दाफाश हुआ है, जिनके तार सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों से और भी ज्यादा गहराई से जुड़े रहे हैं. किडनी का ये खेल नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर चलता है जिसमें मजबूर और गरीब लोग फंसते हैं और उनकी मजबूरी और पैसे से मौज शातिर,पढ़े-लिखे डॉक्टर उड़ाते हैं.
आज हम आपको देश के सबसे बड़े किडनी कांडों के बारे में बताने के साथ ही ये भी बताएंगे कि कैसे ये काले कारोबार चुपचाप सालों-साल तक बिना किसी को भनक लगे फलते-फूलते रहते हैं और इन्हें किडनी के मरीजों से लेकर किडनी डोनर तक कहां से मिल जाते हैं?
और इस खबर में अपनी एक्सपर्ट एडवाइज दे रहे हैं नेफ्रोलॉजी में 40 साल का अनुभव रखने वाले, यूके के मेनचेस्टर में कॉमनवेल्थ फेलोशिप ले चुके और 16 साल एम्स में नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख रहे और सेव द किडनी क्लिनिक के फाउंडर डॉ. संजय कुमार अग्रवाल. डॉ. अग्रवाल यहां मरीजों से मिली जानकारियां भी शेयर कर रहे हैं.
किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन और एम्स के पूर्व एचओडी नेफ्रोलॉजी डॉक्टर एसके अग्रवाल.
भारत के बड़े किडनी कांड
- . कानपुर किडनी कांड फिलहाल सबसे बड़े किडनी रैकेटों में से एक बनता जा रहा है. अभी तक मिली जानकारी में कानपुर में बिना रिकॉर्ड के 60 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट किए गए हैं. इसमें कई राज्यों के एक दर्जन से ज्यादा अस्पतालों और डॉक्टरों के शामिल होने के सुराग मिले हैं, फिलहाल इसमें डॉक्टर, अस्पताल संचालक और एंबुलेंस चालक की गिरफ्तारी होने के साथ ही जांच चल रही है.
- . गुरुग्राम 750 किडनी रैकेट- गुरुग्राम में साल 2008 में हुआ किडनी कांड अभी तक का सबसे वीभत्स कांड है और उसके आका देवेंद्र शर्मा और डॉ. अमित कुमार को डॉ. डेथ के नाम से जाना जाता है. करीब सात साल में इन्होंने 750 से ज्यादा लोगों की किडनी निकालकर ट्रांसप्लांट किए और एक मरीज से 30 से 35 लाख रुपये शुद्ध रूप से कमाए थे. इन दोनों को सजा हो गई थी.
- . महाराष्ट्र चंद्रपुर इंटरनेशनल किडनी सिंडिकेट- महाराष्ट्र के चंद्रपुर में एक किसान के वायरल वीडियो से दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में इंटरनेशनल किडनी सिंडिकेट का पता चला था. यहां डोनरों को किडनी निकलवाने के लिए विदेश तक भेजा जाता था और 6 से 8 लाख रुपये मिलते थे, जबकि इस किडनी को 70-80 लाख में बेचा जाता था. इस सिंडिकेट के गुर्गे भारत से विदेशों तक फैले थे.
- . अपोलो दिल्ली-नोएडा किडनी कांड- जुलाई 2024 में अपोलो अस्पताल की किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. डी विजया राजकुमारी का नाम सुर्खियों में आया जब उस पर अवैध रूप से बांग्लादेश से बुलाए गए किडनी डोनर्स की किडनी नोएडा के यथार्थ अस्पताल में ट्रांसप्लांट करने के मामले में 7 लोग गिरफ्तार हुए. इस दौरान कई बांग्लादेशी डोनर और रिसीवर सामने आए थे.
कैसे काम करता है ये नेक्सस?
किडनी के मरीजों के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन गया है यहां 2023 तक 13 करोड़ से ज्यादा लोगों को किडनी की बीमारी थी. ऐसे में सरकारी अस्पतालों में महीनों तक अपॉइंटमेंट और जांचों की वेटिंग में धक्के खाता या खुद का डोनर न होने पर अस्पताल से मिले डोनर के इंतजार में सालों-साल समय गंवाता मरीज डायलिसिसि के भरोसे आखिर कब तक चले?
वहीं दूसरी ओर पेट में दो-दो कीमती किडनी लेकर भूखा मरने वाला या जुए-सट्टे की लत में पड़ा युवक भी सोचता है कि एक बेचकर पैसे मिल जाएं तो क्या बुरा है? और जब दोनों ओर से ही दरवाजे खुले हों तो मरीजों के भगवानों को हैवान बनते कहां देर लगती है? और यहीं से असली खेल शुरू होता है.
कहां से आते हैं डोनर?
कानपुर किडनी रैकेट ने सभी की नींदें उड़ा दी हैं.
आमतौर पर अवैध रूप से किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले सेंटर्स दो तरह से किडनी डोनर जुटाते हैं, सबसे पहले भारत में मौजूद गरीबी और तंगहाली, कर्ज या जुए-सट्टे की लत में फंसे लोग इनके निशाने पर होते हैं. जिन्हें पैसे का लालच देकर ये किडनी डोनेट करने के लिए तैयार करते हैं. कुछ लाख रुपये के एवज में ये लोग इसलिए भी तैयार हो जाते हैं क्योंकि इन्हें समझाया जाता है कि एक किडनी से भी वे जिंदा रह सकते हैं.
वहीं दूसरा तरीका ये गरीब पड़ौसी देशों, जिनमें खासतौर पर बांग्लादेश है, यहां से लोगों को किडनी बेचने और उसके बदले में मोटा पैसा मिलने की बात पर रजामंद करके यहां तक लाते हैं.
बांग्लादेश से कैसे लाए जाते हैं डोनर?
अपोलो दिल्ली-नोएडा किडनी रैकेट कांड, कानपुर कांड और डॉक्टर डेथ गुरुग्राम के मामलों की जांच में सामने आया कि बांग्लादेश में भुखमरी से जूझ रहे बहुत सारे लोग किडनी बेचने के लिए भारत लाए जाते हैं, इसके लिए उनके साथ किडनी रिसीपेंट भी लाए जाते हैं. इन्हें अस्पताल के नजदीकी गैस्ट हाउसों में ठहराया जाता है.
अगर जांच होती भी है तो इन्हें पहले ही समझा दिया जाता है ये लोग किडनी रिसीपेंट के दूर के रिश्तेदार हैं और मरीज को किडनी दान करना चाहते हैं. एक से ज्यादा डोनर होने पर ये बताते हैं कि जिसकी भी किडनी मैच कर गई वह दे देगा. इस तरह एक रिसीपेंट के साथ कई डोनर साथ आ जाते हैं. जबकि न ये आपस में रिश्तेदार होते हैं और न ही इसको साबित करना या जांच करना स्वास्थ्य विभाग के बस में होता है.
ट्रांसप्लांट के लिए कहां से और कैसे लाए जाते हैं लोग?
किडनी ट्रांसप्लांट के लिए भी देश और विदेश दोनों जगहों से मरीज आते हैं.
डॉ. संजय अग्रवाल बताते हैं कि भारत में करीब 70 से 80 देशों के किडनी मरीज आकर ट्रांसप्लांट कराते हैं. इसकी वजह है यहां बाहर के मुकाबले सस्ता और अच्छा इलाज. किडनी ट्रांसप्लांट की कीमत भारत में कई देशों के मुकाबले कम है वहीं यहां इलाज के साथ पोस्ट ट्रांसप्लांट केयर और रहने-खाने का खर्च भी कम है.
जबकि देश के अंदर के मरीजों की बात करें तो कानपुर कांड में ही डॉ. अफजल की कार्यशैली इसकी पोल खोलती है कि पूरे गैंग में से कुछ डॉक्टर या तैनात लोग शहरों के प्रमुख डायलिसिस केंद्रों में दौरे करते रहते हैं. यहां से डिटेल लेकर देखने में ठीक-ठाक पैसे वाला लेकिन डायलिसिस के धक्के खाकर परेशान हो चुका मरीज या उसका परिजन दिखाई देता है तो ये उसे तुरंत उपलब्ध किडनी ट्रांसप्लांट के लिए राजी करते हैं.
अवैध रूप से किडनी ट्रांसप्लांट का कारोबार करने वाले डॉक्टरों में सिर्फ नेफ्रोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और ट्रांसप्लांट सर्जन ही नहीं होते बल्कि इसमें इम्यूनोलॉजिस्ट, एनेस्थेटिस्ट, और डायटिशियन, पैरामेडिकल स्टाफ आदि के डॉक्टर भी शामिल होते हैं. वहीं किसी इमरजेंसी कंडीशन के लिए सुपरस्पेशलिटी सुविधाओं की भी जरूरत होती है. ऐसे में अवैध ट्रांसप्लांट में पूरा नेटवर्क तैयार किया जाता है और फिर काम किया जाता है.
रैकेटों वाला ये ट्रांसप्लांट कितना सफल रहता है?
रैकेटों में लगाई गई किडनी कितने दिन चलती है?
डॉक्टरों के इस अवैध कारोबार में एक तरह वे लोग हैं जो चंद पैसों के लालच में अपनी किडनी खो चुके होते हैं जबकि दूसरी ओर वे लोग हैं जो अपना पैसा फूंक चुके होते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी ये है कि किडनी के अवैध धंधे में किया गया ट्रांसप्लांट सफल होता है? या मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ता है? यहां किडनी मरीजों को लेकर बेहद जरूरी सवालों का जवाब दे रहे हैं डॉ. संजय अग्रवाल.
. सरकारी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए तमाम टेस्ट, रिलेटिव डोनर की ही मांग और लंबा इंतजार करना होता है? फिर ये रैकेट वाले कैसे अचानक किडनी लेकर लगा देते हैं?
हां . आमतौर पर सरकारी अस्पतालों किडनी ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग करीब 8 से 10 महीने की होती है. एम्स नई दिल्ली जो सबसे बेस्ट इंस्टीट्यूशन है वहां इतनी लंबी वेटिंग रहती है. हालांकि ये समय सिर्फ जांच और ट्रांसप्लांट में नहीं लगता, बल्कि मरीजों की भारी भीड़ और पूरी व्यवस्था के चलते लगता है. फिर भी इन अस्पतालों में 6 हफ्ते में पूरे टेस्ट हो जाते हैं. अक्सर किडनी डोनर की उपलब्धता पर भी टाइम खिंचता है. वहीं अगर प्राइवेट अस्पतालों की बात करें तो 7 से 10 दिन के अंदर सभी टेस्ट हो जाते हैं. अगर कोई असामान्य कमी बाती है तो फिर आगे जांच होती हैं.
क्या ये किडनी रैकेट वाले भी जांचें करते हैं?
हां करते होंगे, क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेंगे तो किडनी रिसीपेंट में इन्फेक्शन या अन्य लक्षण तुरंत दिखाई दे सकते हैं या हो सकता है ऑपरेशन टेबल पर ही किडनी डैमेज हो जाए. तो मुझे लगता है कि बेसिक जांचें तो ये डोनर और रिसीवर दोनों की ही करते होंगे.
सरकार में डोनर रिलेटिव मांगते हैं, यहां कैसे किसी की भी किडनी लगा रहे?
ट्रांसप्लांट के लिए नियम है कि किडनी के मरीज के लिए दाता 7 रिश्तों में से कोई एक होना चाहिए. जैसे दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन या बच्चे. ये ही लीगल डोनर होते हैं. अगर ट्रांसप्लांट के लिए रिश्तों से अलग कोई और डोनर है तो इसके लिए ऑथराइजेशन कमेटी से परमिशन लेनी होती है.
ये ऑथराइजेशन कमेटी क्या होती है?
जिस अस्पताल में 25 से ज्यादा ट्रांसप्लांट सालाना होते हैं वहां अस्पताल में ही एक कमेटी बनती है, जिसमें वकील, डॉक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता, मंत्रालय के लोग शामिल होते हैं और ट्रांसप्लांट के मामलों में अनुमति देते हैं. वहीं 25 से कम ट्रांसप्लांट वालों के लिए जिला या शहर लेवल पर एक ऑथराइजेशन कमेटी राज्य सरकार बनाती है. इसी कमेटी की जिम्मेदारी होती है कि ट्रांसप्लांट में सब सही तरीके से हो.
- क्या डोनर किडनी बेच सकता है?
किडनी के डोनर के लिए ये 3 चीजें सबसे जरूरी होती हैं और ऑथराइजेशन कमेटी की जिम्मेदारी होती है कि वह इसका ध्यान रखे. - . डोनर अपनी मर्जी से किडनी दे, उस पर कोई प्रेशर न हो.
- . डोनेशन में मॉनिटरिंग ट्रांजेक्शन न हो, यानि किडनी बेचना अपराध है. इसमें पैसे का कोई लेनदेन न हो.
- . डोनर को उसकी किडनी से संबंधित पूरी जानकारी हो, उसे ये पता हो कि इसके निकलने पर क्या होगा, और वह किसे किडनी दे रहा है आदि.
. क्या इस तरह किडनी ट्रांसप्लांट से डोनर और रिसीवर दोनों को नुकसान हो सकता है? कितना खतरनाक है ये?
मुझे लगता है कि ऐसे मामलों में पैसा छापना सबसे बड़ा उद्धेश्य है लेकिन डॉक्टर जानबूझकर मरीज का नुकसान नहीं करेगा, क्योंकि अगर किडनी बिल्कुल नहीं चलेगी तो इस तरह करवाएगा कौन? तो मुझे लगता है कि इसमें एक्सपर्ट डॉक्टर जरूर होते होंगे ताकि ऑपरेशन टेबल पर ही न किडनी डैमेज हो जाए. हां लेकिन ट्रांसप्लांट का बेसिक उद्धेश्य इससे प्रभावित हो सकता है कि मरीज 20-25 साल तक जीए या ज्यादा से ज्यादा समय तक जीएं. क्योंकि ऐसे मामलों में सर्जन ऐसे ट्रांसप्लांट पेशेंट को फॉलो नहीं करते, तो कितने दिन किडनी चलेगी, यह कहा नहीं जा सकता.
. क्या आपके सामने कभी कोई ऐसा केस आया, जिसने पैसे देकर किडनी ट्रांसप्लांट कराई हो और फिर दोबारा करानी पड़ी हो?
हां इस तरह के पेशेंट आते हैं. वे बताते हैं कि रिलेटिव डोनर नहीं था और उन्होंने किडनी ट्रांसप्लांट कराया था. वे खुल के पैसे तो नहीं बताते कि लेकिन वे ऐसी भाषा बताते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ. हमारा भी कोई इंटरेस्ट नहीं होता तो हम ऐसे मामलों में उनसे ज्यादा पूछते भी नहीं हैं और बस इलाज करते हैं.
क्या ऐसा होता है कि किसी को पता ही नहीं चलता और किडनी निकाल ली?
नहीं ये एकदम गलत बात है. ऐसा नहीं होता. किडनी बेहोश करके चुपचाप नहीं निकल सकती, लोगों को पता होता है. हो सकता है कि डील में कमी होने या अन्य परेशानी होने पर फिर बाद में बात खुलती है और वे शिकायत करते हैं कि उन्हें तो पता ही नहीं था.





