राष्ट्रपति से लेकर जज तक देवियों के सामने झुकते हैं, तुषार मेहता क्यों बोले, 2018 के सबरीमाला फैसले में गलती थी

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नई दिल्ली. केंद्र ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि 2018 का सबरीमाला फैसला त्रुटिपूर्ण था और इस पर फिर से विचार करने की जरूरत है. फैसले में केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाया गया था. प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें 2018 के सबरीमाला फैसले में की गई उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति है जिसमें कहा गया कि 10-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर से बाहर रखना ‘अस्पृश्यता’ का एक रूप है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है.

सबरीमाला मामले में, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ का मत था कि उम्र या मासिक धर्म की स्थिति के आधार पर महिलाओं को केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से रोकना ‘अस्पृश्यता’ का एक रूप है जो उन्हें ‘अधीनस्थ’ स्थिति में रखता है, ‘पितृसत्ता’ को कायम रखता है और ‘उनकी गरिमा के लिए अपमानजनक’ है. मेहता ने कहा, “भारत उतना पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़ियों से ग्रस्त नहीं है जितना पश्चिम समझता है.”

सुनवाई की शुरुआत में, मेहता ने कहा कि अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं का अनावश्यक सिद्धांत पेश किया गया है, लेकिन सवाल यह है कि अनिवार्य क्या है, इसका निर्णय कैसे किया जाए. उन्होंने कहा, “यह आस्था, विश्वास का विषय है. किसी बात को आवश्यक मानने या न मानने के लिए, सबसे पहले धार्मिक ग्रंथों का न्यायिक विश्लेषण करना होगा. ग्रंथों को उसी तरह समझना होगा जिस तरह उन्हें समझा जाना चाहिए. मेरा विनम्र निवेदन है कि यह तभी संभव है जब व्यक्ति आध्यात्मिक समझ के उस स्तर को प्राप्त कर ले.”

मेहता ने कहा कि भारत ने हमेशा से न केवल महिलाओं के साथ समान व्यवहार किया है, बल्कि अक्सर उन्हें उच्च स्थान पर रखा है. मेहता ने अदालत से कहा, “हम शायद एकमात्र ऐसे समाज हैं जो महिलाओं की पूजा करते हैं. राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों तक, हम देवियों के सामने नतमस्तक होते हैं. इसलिए, हमें इस चर्चा में पितृसत्ता और लैंगिक रूढ़ियों की अवधारणाओं को शामिल नहीं करना चाहिए. ये अवधारणाएं कभी भी अंतर्निहित नहीं थीं.”

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि केंद्र की दलीलों को केवल सबरीमाला मामले के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि अदालत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव से संबंधित मुद्दों से निपट रही है जिनके व्यापक परिणाम हो सकते हैं. पीठ में जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे. पीठ ने कहा कि वह सबरीमाला फैसले के गुण-दोष पर विचार नहीं करेगी और मामले में निर्धारित सात प्रश्नों तक ही सीमित रहेगी.

सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था. इसके बाद, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की एक अन्य पीठ ने दो के मुकाबले तीन के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया.



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