संजीव कुमार शुक्ला 
कुछ विशिष्ट लोग लड़ाई को ताउम्र जीते हैं और मरते-मरते अपने लड़के पोतों को पीढ़ी दर पीढ़ी लड़ाई को जिंदा रखने का गुरुमंत्र देकर इस नश्वर संसार को अलविदा कह जाते हैं। और कुछ भाई लोग तो जब तक अपने होनहार औलादों से अपने बाद लड़ाई को जिंदा रखने की कसम नहीं खवा लेते तब तक गंगाजल-तुलसी नहीं घूँटते।
कसम दिलाकर भाईजी निश्चिंत भाव से इहलोक से प्रस्थान करते हैं । ऐसे लोगों के खून में लड़ाई बहती है। हमारे यहाँ सांसदों-विधायकों को ही देख लीजिये, वह लड़ाई को राष्ट्रीय हुनर का दर्जा दिलवाने के लिये कटिबद्ध हैं।
चुनाव से लेकर विधायिका तक में लड़ाई करने का कोई मौक़ा हाथ से नहीं जाने देते। एक बार अपने उत्तरप्रदेश की विधायिका में विधायकों ने आपसी तू-तू मैं-मैं को अपने हुनर से इस बुलंदी तक पहुंचाया जहाँ वह इतिहास में माइल स्टोन के रूप में दर्ज हो गयी।
उस गौरवशाली ऐतिहासिक दिन जिस तरह से पारिवारिक रिश्तों को न्योतने के साथ संसदीय कार्यवाही शुरू हुई वह संसदीय इतिहास में नज़ीर बन गयी। उस दिन विधायकों की टेबल पर लगे माइक तक लाठी-डंडों की तरह चले। बड़ा खून-खच्चर हुआ।
जिन लोगों ने हल्दीघाटी का युद्ध नहीं देखा था, और जिसका उन्हें न देख पाने का बड़ा मलाल था, उनका इस घटना से साक्षात्कार हो जाने के बाद यह मलाल जाता रहा। हालांकि इस घटना के बाद कुछ शांतिप्रिय लोकतन्त्रवादियों ने जो खून खच्चर नहीं देख सकते थे और जिनका खून देखने भर से दिल बैठने लगता था, माइकों के नट-बोल्ट ढीले होने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
तबसे जब भी विधायिका का सत्र शुरू होने वाला होता, नट-बोल्टों की कसाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। बात भी ठीक है, गांधीजी के देश मे इतना खून-खच्चर ठीक नहीं। लड़ो मग़र प्यार से और जब कभी दोस्त बन जाएं तो ये लड़ाई के निशान शर्मिंदगी न पैदा करें।
लड़ाई में जूता का प्रयोग इसी सकारात्मक सोच का परिचायक है। यह मारे जाने के बाद भी अपना कोई निशान नहीं छोड़ता।
हालांकि जूता का इन संदर्भों में प्रयोग किया जाना कोई नई बात नहीं, इसकी एक सनातन और व्यापक परम्परा रही है।
“सौ-सौ जूता खांय, तमाशा घुस के देखें,
“सौ जूता मारेंगे और एक गिनेंगे” व “मियां की जूती मियां की चांद”
जैसी लोकोक्तियां इसके सुनहरे अतीत की तरफ़ इशारा करती हैं।
राम-रावण की लड़ाई को हर दशहरा में दुहराकर हम लड़ाई को बाक़ायदा जीते हैं। आल्हा -ऊदल की लड़ाई सुनकर पता नहीं कितने लोग शत्रु विजय की कामना से प्रेरित हुए हैं; अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं ……
हमारे यहाँ अक्सर दिल पे लगी हुई को, लोग आपस मे लड़ के बुझा लेते हैं। हम लोग इसे खेलभावना के तौर पे लेते हैं। बस क्या है कि हम लोग इसके लिये स्टेडियम नहीं बनवाते। बड़ा खर्चा बैठता है उसमें; दूसरे स्थान का चुनाव हमारे लिये कोई विशेष मायने नहीं रखता। उसे अपनी सुविधानुसार तय कर लिया जाता है।
जहाँ चाह वहाँ राह के सिद्धांत पर। अभी हाल ही में, अपनी-अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर उत्तर प्रदेश में सांसद-विधायक आपस में ही भिड़ गए। विधायक जी लड़ाई लड़ने की अदम्य इच्छाशक्ति से भरपूर थे। वह शुरुआत से ही इस सिद्धांत के खिलाफ़ थे कि लड़ाई के लिये किसी दूसरी पार्टी के व्यक्ति का चुनाव किया जाए।
आप लड़ाई में मेरे-तेरे का भेद करने को परले दर्ज़े की वाहियात बात मानते थे, सो उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद का चुनाव किया। आप उस नीति से प्रेरित थे कि अगला आदमी चाहे जितना सगप्पन (अपनापन) दिखाए, हम तो लड़ के मानेगें।
महाभारत के चर्चित डायलॉग “हम तो सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं देंगे” के सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने अपने हौसलों को नए पंख दिए। उन्होंने तय किया कि होने वाले शिलान्यास कार्यक्रम में शिलापट्ट पर अब सांसद महोदय का नाम नहीं डाला जाएगा। फिर क्या था, बात बनती नजर आई शीतयुद्ध का माहौल तैयार हो गया।
सांसद महोदय बिगड़ गए । सांसद की बात में दम था, कि आखिर शिलापट्ट में उनका नाम क्यों नहीं खुदाया गया। भाई हर आदमी की चाहत होती है कि उसका नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाए, पर इतनी व्यस्ताओं के चलते यदि ऐसा हो पाना संभव न हो, तो कम से कम कुकुरमुत्तों की तरह किये जाने वाले शिलान्यासों पर तो उसके नाम का हक बनता ही है।
जहां शिलापट्ट ही एकमात्र अदृश्य विकास की निशानी हो वहां उस निशानी में उसके नाम रूपी योगदान का उल्लेख न हो यह तो घोर अनाचार है।
यह अलग बात है कि कुछ दिनों बाद इन शिलापट्टों पर गली-मुहल्ले के लड़के इतनी लिखापढ़ी कर देते हैं कि पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि यहां विकास की कौन सी इबारत लिखी गयी थी और किसके हाथों से लिखी गयी थी। हां, तो नाम न होने के नाम पर सांसद जी बिगड़ गए।
विधायक जी ने कहा ही था कि ## निकालें और सांसद महोदय निकालकर शुरू भी हो गए। सांसदजी पूरे संसदीय रंग में थे और उन्होंने संसदीय कार्यवाही को बड़ी तन्मयता से अंजाम दिया। जूते से जुतियाने के अपने फायदे हैं।
जानमाल का नुकसान हुए बगैर इसको तलवार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। यह तलवार के मुकाबले थोड़ा अहिंसावादी अस्त्र है। इसमें चूंकि आदमी मरता नहीं है इसलिए भविष्य में उसी आदमी से आप अपना शौक़ पूरा कर सकते हैं।
जबसे इधर जूता वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ तब से जूतों की कीमत में भारी उछाल आया है। जूतों की तमाम वेरायटी मार्केट में आ गईं हैं। कुछ ब्रांड इस कांड के बाद जूतों की ग्रिप पर विशेष ध्यान देने लगे हैं।
ग्रिप से मतलब यह है कि यदि आप किसी को जुतियाना चाहते हैं तो ऐसे में जूता आपके हाथों से छूटे ना।साथ ही कुछ भाई लोग ग्रिप के साथ-साथ जूता मारने पर होने वाली आवाज पर भी शोध कर रहें हैं।
क्योंकि उनका यह दिली मानना है कि जूते से निकलने वाली बुलंद आवाज़ जूता मारने वाले के आत्मविश्वास को अविश्वसनीय तरीके boost up कर देती है। ख़ैर जूता तो एक साधन मात्र है, साध्य तो लड़ाई को शाश्वत बनाना है।
अब देखना यह है कि संसदीय परम्पराएँ इस विधा को कितनी ऊंचाइयां दे पाती हैं।।
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