नई दिल्ली/रायपुर: देश को नक्सल मुक्त बनाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की निर्धारित 31 मार्च की समयसीमा अभी 6 दिन दूर है, लेकिन सुरक्षा बलों की रणनीतिक घेराबंदी ने लाल गलियारे के किलों को पहले ही ध्वस्त करना शुरू कर दिया है. ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगलों में दशकों तक खौफ का पर्याय रहे दो सबसे बड़े नक्सली कोसा सोडी उर्फ सुकरू और पापा राव ने आत्मसमर्पण कर दिया है. इस घटना ने वामपंथी उग्रवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी है. अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक, रसद की भारी किल्लत और मौत के बढ़ते खौफ ने इन ‘अजेय’ माने जाने वाले लड़ाकों को घुटनों पर ला दिया है. कुल 80 लाख रुपये के सामूहिक इनाम वाले इन कमांडरों का हथियार डालना इस बात का साफ संकेत है कि भारत अब लाल आतंक के काले साये से पूरी तरह मुक्त होने की दहलीज पर खड़ा है.
1. बड़े चेहरों का ढहता वर्चस्व
ओडिशा में 55 लाख रुपये के इनामी कोसा सोडी और छत्तीसगढ़ में 25 लाख रुपये के इनामी पापा राव का आत्मसमर्पण केवल दो व्यक्तियों का सरेंडर नहीं है बल्कि उस संगठनात्मक ढांचे का टूटना है जिसने दशकों तक सुरक्षा बलों को चुनौती दी. पापा राव 1997 से सक्रिय थे और 2010 के ताड़मेटला हमले (जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे) जैसी बड़ी साजिशों में शामिल थे. उनका हथियार डालना बस्तर में माओवादी मनोबल के लिए सबसे बड़ी चोट है.
2. आत्मसमर्पण के पीछे का रणनीतिक दबाव
इन आत्मसमर्पणों के पीछे सुरक्षा बलों की बदली हुई रणनीति और तकनीकी श्रेष्ठता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है:
· ड्रोन तकनीक का उपयोग: ओडिशा पुलिस ने सुकरू के ठिकानों का पता लगाने के लिए उन्नत ड्रोनों का उपयोग किया जिससे उसे छिपने की जगह नहीं मिली.
· रसद और भोजन की कमी: पापा राव ने जांचकर्ताओं को बताया कि सुरक्षा बलों की घेराबंदी इतनी कड़ी थी कि उन्हें कई दिनों तक भोजन नहीं मिल सका.
· मृत्यु का भय बनाम सुरक्षित भविष्य: मौत के डर और कहीं और जाने का रास्ता न होने जैसे बयानों से स्पष्ट है कि अब कैडरों को लगने लगा है कि हिंसा के रास्ते पर अंत केवल मृत्यु है.
3. संगठन के भीतर आंतरिक बिखराव
रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अब नक्सली नेतृत्व के भीतर भी आपसी अविश्वास बढ़ गया है. सुकरू पर आरोप था कि उसने आत्मसमर्पण करने की योजना बना रहे अपने ही साथी अन्वेष उर्फ रेनू की हत्या कर दी थी. जब शीर्ष नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ हथियार उठाने लगें तो संगठन की वैचारिक नींव का गिरना तय है.
4. विकास और मुख्यधारा की ओर कदम
पापा राव के साथ 17 अन्य माओवादियों और सुकरू के साथ 4 साथियों का मुख्यधारा में आना यह दर्शाता है कि अब निचले स्तर के कैडरों में भी विद्रोह की आग ठंडी पड़ रही है. बस्तर और कंधमाल जैसे दुर्गम इलाकों में सुरक्षा बलों के बढ़ते कैंप और सरकार की पुनर्वास नीतियों ने नक्सलियों के ‘सेफ हेवन’ को खत्म कर दिया है.
पापा राव और कोसा सोडी का आत्मसमर्पण नक्सलवाद के सफेद हाथी के धराशायी होने जैसा है. यह न केवल सुरक्षा बलों की बड़ी जीत है बल्कि उन आदिवासी क्षेत्रों के लिए शांति और विकास का एक नया सवेरा भी है जो दशकों से हिंसा की आग में झुलस रहे थे. गृह मंत्रालय की मार्च की डेडलाइन से पहले इन बड़े सरेंडर ने यह संदेश दे दिया है कि भारत अब नक्सली हिंसा के अंत की ओर तेजी से बढ़ रहा है.
सवाल-जवाब
इन दोनों बड़े आत्मसमर्पणों का सुरक्षा बलों के लिए क्या महत्व है?
यह आत्मसमर्पण गृह मंत्रालय द्वारा निर्धारित 31 मार्च की डेडलाइन से ठीक पहले हुए हैं, जो दर्शाते हैं कि नक्सली संगठन का शीर्ष नेतृत्व अब टूट चुका है और सुरक्षा बलों का रणनीतिक दबाव पूरी तरह प्रभावी है.
पापा राव और सुकरू के आपराधिक रिकॉर्ड की गंभीरता क्या थी?
पापा राव 2010 के ताड़मेटला हमले और 2025 के अंबेली हमले जैसी बड़ी घटनाओं में शामिल थे और उन पर 70 से अधिक मामले दर्ज थे. वहीं, सुकरू ओडिशा के प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) की राज्य समिति का सदस्य था और उस पर 55 लाख रुपये का इनाम था.





