समंदर की लहरों और बारूद की गंध से बचाकर दो भारतीय पोतों को किसने होर्मुज पार कराया, क्या चुकाई गई मोटी रकम?

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नई दिल्ली.ईरान-इजरायल युद्ध के बीच होर्मुज के समंदर में इस समय जो मंजर है, वह किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं है. ड्रोन हमले, मिसाइलें और जहाजों का अपहरण के बीच होर्मुज दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका बन चुका है. लेकिन इसी खौफनाक समंदर के बीच से पिछले हफ्ते भारत का दो एलपीजी टैंकर और चालक दल के सभी सदस्य न सिर्फ सुरक्षित निकले, बल्कि उन्हें रास्ता खुद ईरान की नौसेना ने दिखाया. यह महज एक संयोग नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और ईरान के साथ भारत के पुराने ऐतिहासिक रिश्तों की बड़ी जीत है. जो दो भारतीय जहाज 10 दिनों तक फारस की खाड़ी में लंगर डाले खड़े थे, उस जहाज को 13 मार्च को गुजरने की अनुमति ईरान ने कैसे दे दी? जब समंदर की लहरों पर बारूद की गंध तैर रही हो, उस जगह से दो एलपीजी टैंकर कैसे शान से भारत आ गए? क्या भारत ने इसके बदले ईरान को मोटी रकम चुकाई?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट और जहाज पर सवार एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी के मुताबिक, स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी. भारतीय टैंकर फारस की खाड़ी में करीब 10 दिनों तक लंगर डाले खड़ा रहा. खतरा इतना बड़ा था कि नाविकों ने किसी भी आपात स्थिति के लिए लाइफ राफ्ट यानी जीवन रक्षक नौकाएं तक तैयार कर ली थीं. पूरे क्षेत्र में जीपीएस सिग्नलों में जबरदस्त हस्तक्षेप था, जिससे रास्ता भटकने का डर था. पहचान छिपाने के लिए जहाज ने अपना एआईएस (AIS) सिस्टम बंद कर दिया था ताकि कोई उसे ट्रैक न कर सके. लेकिन तभी भारत के ‘राजनयिक चैनलों’ ने अपना काम शुरू किया.

13 मार्च 2026 की उस काली रात को भारतीय टैंकर को वह सिग्नल मिला, जिसका उसे इंतजार था. ईरानी नौसेना ने रेडियो के माध्यम से संपर्क किया. अधिकारी ने बताया, ‘ईरानियों ने हमसे बहुत शालीनता से जहाज का नाम, झंडा, मूल स्थान और चालक दल की राष्ट्रीयता पूछी. जैसे ही उन्हें पता चला कि जहाज पर सवार सभी लोग भारतीय हैं, उन्होंने हमें आगे बढ़ने का निर्देश दिया और पूरे रास्ते हमारी सुरक्षा सुनिश्चित की.’

क्या तेहरान ने बना डाला अपना ट्रैफिक कंट्रोल?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब इस महत्वपूर्ण होर्मुज पर अपना खुद का ‘ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम’ लागू कर रहा है. ईओएस रिस्क ग्रुप के मार्टिन केली कहते हैं कि ईरान अब खुलेआम यह संदेश दे रहा है कि वह केवल अपने मित्र देशों के पोतों को ही सुरक्षित रास्ता देगा. यह वैश्विक व्यापार के लिए चिंता की बात हो सकती है, लेकिन भारत के लिए यह गौरव का विषय है कि उसकी दोस्ती आज भी ईरान के लिए प्राथमिकता है.

जॉर्डन और लीबिया में भारत के पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत इस घटना को भारत की एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानते हैं. उनका कहना है, ‘ईरान इस नाजुक मोड़ पर हर किसी के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहता. भारत एक ऐसा देश है जो पश्चिम और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है. इसी सामरिक महत्व के कारण भारत को यह विशेष छूट मिली है. ईरान दूसरे देशों के साथ जो व्यवहार हॉर्मुज में कर रहा है वह भारत से नहीं किया होगा. मोटी रकम वसूलने का तो कोई सवाल हीं नहीं उठता.’

भारत ने हमेशा शांति और बातचीत का रास्ता चुना है. चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अब मिडिल ईस्ट का संकट, भारत की सॉफ्ट पावर पॉलिसी और स्वतंत्र विदेश नीति ने उसे एक ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहां दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं. हालांकि भारत को सुरक्षित रास्ता मिला, लेकिन जीपीएस जाम होने के कारण टैंकर को अपनी मंजिल तक पहुंचने में कई घंटे अधिक लगे. यह दिखाता है कि समंदर में अभी भी स्थितियां कितनी अस्थिर हैं. लेकिन इस एक घटना ने दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि भारत के तिरंगे का सम्मान आज भी दुनिया के हर कोने में बरकरार है. जब बड़े-बड़े देशों के जहाज होर्मुज के चक्रव्यूह में फंसे हैं, तब भारत की कूटनीति ने अपने नागरिकों और संसाधनों को सुरक्षित निकालने का रास्ता ढूंढ लिया है.



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