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आदिवासी धर्मावलंबी शुक्रा उरांव ने लोकल 18 को बताया कि सरहुल पर्व के दिन हमलोग प्रकृति व सरना माता की पूजा पाठ और प्रार्थना करते हैं कि सुख शान्ति समृद्धि प्राप्ति हो .हमलोग जो खेती बाड़ी करते हैं वो अच्छे से हो भरपूर पैदावार हो. पूजा के बाद सरना स्थल से पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में नाचते-गाते जुलूस निकलता है, जिसमें ढोल, मांदर और नगाड़ों की धुन पर पूरा वातावरण झूम उठता है
आदिवासियों को प्रकृति का बड़ा पूजक माना जाता है, आदिवासी समुदाय जल, जंगल,जमीन यानी की प्रकृति के विशेष पूजक माने जाते हैं. वहीं आज पूरे राज्य में प्रकृति का महापर्व सरहुल मनाया जा रहा है. हमारे राज्य के गुमला जिले में भी प्रकृति का महापर्व सरहुल पूरे हर्षोल्लास और आस्था के साथ मनाया जा रहा है. यह केवल आदिवासियों का सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और परंपराओं का जीवंत उदाहरण है.
सरहुल की पूजा में एक बेहद अद्भुत परंपरा निभाई जाती है, जो न सिर्फ भावनात्मक रूप से गहरी है, बल्कि वैज्ञानिक नजरिए से भी लोगों को सोचने पर मजबूर करती है. सरहुल पर्व के दिन सुबह तड़के आदिवासी समाज के पाहन नदी या कुएं से दो नए मिट्टी के घड़े में पानी भरकर लाते हैं, जिसे पूरी पवित्रता और नियमों के साथ सरना स्थल पर रखा जाता है. पूरे विधि विधान से इन घड़ों में अरवा चावल, सरई का फूल डाला जाता है, साथ ही घड़े को धागे से बांधा जाता है. सिंदूर टीका जाता है. घड़ा से पानी आने की भविष्यवाणी की जाती है.
सरहुल के दिन बारिश की भविष्यवाणी
पुजार करमा बैगा ने लोकल 18 बताया कि सरहुल पर्व के दिन अहले सुबह रात के दो /ढाई बजे नदी या कुंआ से 2 नए घड़े में पानी भरते हैं. किसी का नजर न पड़े है. उसे पूरे विधि विधान से पूजा स्थल पर रखते है. फिर पूजा पाठ करते हैं. पूजा के बाद घड़े का पानी नहीं सूखता है या नहीं कम होता है ,पानी घड़ा में भरा रहता है, तो यह आने वाले मौसम में अच्छी बारिश का संकेत माना जाता है. लेकिन अगर पानी घटता है, तो यह चिंता का विषय होता है. वर्षा सामान्य से कम होगी.
सरना माता की पूजा पाठ
वर्षा सामान्य से कम होगी. इस राइस पानी को बाद में प्रसाद के रूप में सभी घरों में बांटा जाता है, और विश्वास किया जाता है कि यह घर की रक्षा करता है. फसल में समृद्धि लाता है. इसके साथ ही सूर्य और धरती के विवाह का आध्यात्मिक उत्सव है, जिसे आदिवासी समुदाय ‘खे-खेल बेंज्जा’ यानी धरती का विवाह कहता है. सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही सजीव और भावपूर्ण है, जितनी कभी रही होगी. आदिवासी धर्मावलंबी शुक्रा उरांव ने लोकल 18 को बताया कि सरहुल पर्व के दिन हमलोग प्रकृति व सरना माता की पूजा पाठ और प्रार्थना करते हैं कि सुख शान्ति समृद्धि प्राप्ति हो .हमलोग जो खेती बाड़ी करते हैं वो अच्छे से हो भरपूर पैदावार हो. पूजा के बाद सरना स्थल से पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में नाचते-गाते जुलूस निकलता है, जिसमें ढोल, मांदर और नगाड़ों की धुन पर पूरा वातावरण झूम उठता है. सरहुल का यह जुलूस गुमला में वर्षों से परंपरा का हिस्सा रहा है.




