
अब हनुमानजी भी अनुसूचित जाति में दर्ज़ हुए ….
हनुमानजी की सारी होशियारी निकल गई… हनुमानजी सोच रहे थे कि हम नहीं बताएंगे तो क्या कोई जान पायेगा? मग़र इस कलियुग में एक से एक खोजी टाइप के लोग हैं, आप कितना भी बचें, वह पता लगाकर ही मानेंगे।
माना कि आप सरकारी सहायता लेने के सख़्त खिलाफ हैं और स्वाभिमानवश दलितात्मकता को अच्छा नहीं मानते, पर अपनी जाति को भूलना क्या अच्छी बात है। हम यह भी मानते है कि ऊंची से ऊंची जाति वाले भी आपका
आशीर्वाद-कृपा पाने के लिए टकटकी लगाकर आपकी तरफ देखते रहते हैं, पर फिर भी आप द्वारा अपनी जाति का तिरस्कार करना बहुत ही संज्ञेय अपराध है। अगर आपको यह डर सता रहा है कि लोग-बाग हमारी जाति को जानकर हमको पूजना छोड़ देंगे तो आप गलतफहमी के शिकार हैं।
संत रविदास जी का उदाहरण आपके सामने है। उनकी कौन पूजा नहीं करता ??? भाईसाहब आजकल जाति और गोत्र का ही जमाना है। हर कोई एक-दूसरे की जाति और गोत्र जानना चाहता है।
सारे विकास के रास्ते यहीं से होकर के जाते हैं। चुनाव में जाति देखकर के ही उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं और जाति देखकरके ही कान पकड़ के बैठाए भी जाते हैं।
प्रभु जी शायद आपको पता नहीं है कि राजनीति में जाति का क्या महत्त्व है? उसकी क्या संभावनाएं हैं? दुष्यंत जी के समय बाढ़ ज्यादा आती होगी इसीलिए उनको लिखना पड़ा कि “बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं” आज यदि वह जिंदा होते शायद यह लिखते “जाति की संभावनाएं सामने हैं”।
और फ़िर जैसा आपका स्वभाव है, उस हिसाब से राजनीति आपको बहुत सूट करेगी। आप तो शुरू से ही बहुत डिप्लोमेट रहे हैं। वह आप ही थे, जो रावण को उसकी सभा में जाकर खूब लटी-पटी सुनायी थी; उसका मान-मर्दन किया।
रावण का कॉन्फीडेंस वहीं से लूज हो गया था। क्या गज़ब की इंफीरिओरिटी कॉम्प्लेक्स उसके अंदर भर दी थी आपने। मन से तो वह तभी हार गया था। बाकी लड़ाई तो वह सिर्फ़ उन दिव्यास्त्रों को चेक करने के लिये कर रहा था, जो उसने तपस्या करके भगवान से प्राप्त किये थे।
वह युद्ध के बहाने यह देखना चाह रहा था कि कहीं भगवान ने उसके भोलेपन का फ़ायदा उठाकर नकली हथियार तो नहीं थमा दिये। ख़ैर; बात राजनीति की हो रही थी। हाँ, तो कहना यह था कि राजनीति हर तरीके से आपके लिये फायदेमंद रहेगी।
बस जाति का नाम लेकर के आप किसी तरह किसी पार्टी में घुस जाइये। बड़ा फ़ायदे का पेशा है; और फ़िर जिस तरह से आपने उछल-कूद में नाम कमाया है, उसको देखते हुए राजनीति का क्षेत्र आपके लिये अपार संभावनाओं से भरा हुआ है। जो पार्टी सत्ता में आती हुई दिखाई दे, बस सीधे उसी में कूद जाइये।
राम-राम जपिये और सत्ता की मलाई का आनन्द लीजिए। अतः प्रभु अपनी जाति को छुपाये नहीं; और फ़िर अब तो सब जान ही गये हैं !!!!
लेकिन प्रभु एक विनती है आपसे, वह यह कि आप अपनी जाति से प्रेम करिये लेकिन भक्तों में जाति के आधार पर भेदभाव मत करियेगा; क्योंकि आपके सेवक सभी जातियों में थोक के भाव पाए जाते हैं। और हाँ, अब जबकि सब जान गए हैं, लोग आपका कानूनी दुरुपयोग करने की कोशिश करेंगे, इसलिए होशियार रहिएगा।
अब ये लोग आपको बहला-फुसलाकर भगवान रामजी और उनके पुत्र लव-कुश के खिलाफ दलित उत्पीड़न के तहत आपसे एस.सी/एस.टी.एक्ट लगवा देंगे।
लोकतंत्र में अतिरिक्त रूप से सजग रहना होता है प्रभु, यहां ज़रा सा भी चूके तो आप को लोग रावण से नहीं, श्रीराम जी से ही आप की लड़ाई करवा देंगे। आपकी तरफ से ये लोग थाने चले जाएंगे और आरोप लगाएंगे कि भगवान राम हनुमानजी जी को सिंघासन के नीचे बैठाते हैं और दिन-भर बंधुआ मजदूरी कराते हैं।
और लव,कुश ने तो दलित उत्पीड़न की हद ही कर दी उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के दौरान घोड़े के साथ-साथ हनुमानजी को भी पेड़ से लटका दिया था ……
अतः है प्रभु होशियार रहिये। अपनी जाति से प्रेम अवश्य करें लेकिन जातिवादी न बनियेगा !!! क्योंकि आपकी पूजा-अर्चना पूरी मनुष्य जाति करती है।
लेखक
संजीव कुमार शुक्ला




