नई दिल्ली/गाजियाबाद : हरीश राणा को दिल्ली एम्स में पैसिव इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पूरी की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश में पहली बार किसी शख्स को सबसे बड़े अस्पताल दिल्ली एम्स के ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू वार्ड में रखा गया है, जहां बाहर सन्नाटा पसरा है. वार्ड के अंदर से सिर्फ मशीनों की ‘बीप’ की आवाज आ रही है. बेड नंबर 12 पर लेटा 32 साल का हरीश राणा अपनी जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है. यह कहानी सिर्फ एक मरीज की नहीं है, बल्कि यह कहानी है विज्ञान की सीमाओं, एक परिवार की बेबसी और उस उम्मीद की, जो मौत के बाद भी जिंदा रहती है. इधर दिल्ली एम्स के डॉक्टरों में हरीश राणा को लेकर बेचैनी बढ़ गई है. अब हरीश राणा को लेकर विशेष सतर्रकता बरती जा रही है.
क्या मेडिकल साइंस में होगा चमत्कार?
मेडिकल साइंस के नजरिए से ‘ब्रेन डेड’ का मतलब है कि इंसान का दिमाग काम करना बंद कर चुका है और वह मशीनों के सहारे ही सांस ले रहा है. हालांकि, मेडिकल साइंस में हरीश राणा पूरी तरह ब्रेन डेड नहीं है. ऐसे में उनका ऑर्गन भी फिलहाल ट्रांसफर नहीं हो सकता है. एम्स के सीनियर डॉक्टरों की टीम लगातार हरीश की स्थिति पर नजर रखे हुए है. विज्ञान कहता है कि यहां से वापसी मुमकिन नहीं है, लेकिन इतिहास में ऐसे इक्का-दुक्का मामले रहे हैं जहां लोगों ने मौत को मात दी है. क्या हरीश राणा वह ‘चमत्कार’ बनेगा? या फिर विज्ञान अपनी हार स्वीकार कर लेगा?
अगर चमत्कार नहीं होता, तो हरीश राणा एक ऐसा काम कर सकता है जो मेडिकल साइंस के लिए टर्निंग पॉइंट साबित होगा. एम्स की ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन की टीम ने परिवार से अंगदान की बात की है. हरीश का दिल, किडनी, लिवर और आंखें कम से कम 6 से 8 लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं.
13 साल से कोमा जैसी स्थिति में रह रहे हरीश राणा को दिल्ली एम्स में पिछले सप्ताह भर्ती कराया गया था. वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब हटाए जाने के बाद यह ख्याल रखा जा रहा है कि उन्हें आखिरी पल में दर्द कम से कम हो. मां-बाप का मानना है कि हरीश राणा मरकर भी जिंदा रहेगा, क्योंकि उसकी धड़कन किसी और के सीने में धड़केगी और उसकी आंखों से कोई और इस दुनिया को देखेगा. यह मेडिकल साइंस का वह पहलू है जहां एक इंसान की मौत दूसरे के लिए जीवन का वरदान बन जाती है. हरीश का यह त्याग उसे एक आम लड़के से ‘अमर नायक’ बना देगा.




