नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने भारतीय इकोनॉमी और ग्लोबल ट्रेड के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. गुरुवार की इंटर मिनिस्टेरियल ब्रीफिंग में बताया गया कि कई अहम सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. वाणिज्य मंत्रालय ने इस संकट का सेक्टर-वाइज एनालिसिस किया है. तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. भारत का लगभग $178 बिलियन का द्विपक्षीय व्यापार खाड़ी देशों (GCC) के साथ होता है, जो अब सीधे रिस्क पर है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने 2 मार्च 2026 को एक इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप (IMG) का गठन किया. अतिरिक्त सचिव लव अग्रवाल ने बताया कि मौजूदा हालात सिर्फ तेल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक्सपोर्ट और इंडस्ट्रियल सप्लाई पर भी दबाव बढ़ रहा है. खास तौर पर शिपिंग रूट, बीमा लागत और कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है.
सबसे ज्यादा असर खाद्य और कृषि उत्पाद सेक्टर पर दिख सकता है. पश्चिम एशिया भारत के लिए बड़ा बाजार है, जहां चावल, मसाले और अन्य कृषि उत्पाद बड़ी मात्रा में भेजे जाते हैं.
तनाव बढ़ने से लॉजिस्टिक्स महंगे हो सकते हैं और डिलीवरी में देरी बढ़ सकती है. इससे एक्सपोर्टर्स की लागत और जोखिम दोनों बढ़ेंगे.
- इंजीनियरिंग उत्पाद सेक्टर भी दबाव में आ सकता है. इस सेक्टर का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों को जाता है. यदि हालात और बिगड़े तो ऑर्डर धीमे पड़ सकते हैं और नए कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर पड़ेगा.
- इसके साथ ही रत्न और आभूषण उद्योग भी प्रभावित होगा, क्योंकि दुबई जैसे हब पर निर्भरता ज्यादा है. वहां ट्रेड बाधित होने से कारोबार में गिरावट आ सकती है.
- ऊर्जा और पेट्रोलियम सेक्टर सबसे संवेदनशील माना जा रहा है. तेल की कीमतों में तेजी आने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इसके साथ ही पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री की लागत भी बढ़ेगी, जिसका असर कई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ेगा.
- केमिकल और पेट्रोकेमिकल सेक्टर में कच्चे माल की सप्लाई बाधित होने की आशंका है.
- फार्मास्युटिकल सेक्टर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. कई जरूरी केमिकल्स और इंटरमीडिएट्स इस क्षेत्र से आते हैं. सप्लाई चेन में रुकावट आने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है.
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का तनाव भारत के कई सेक्टर के लिए बड़ा आर्थिक जोखिम बनकर उभर रहा है, जिस पर सरकार करीबी नजर बनाए हुए है.
किन सेक्टर्स पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा संकट?
वाणिज्य मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेटरी लव अग्रवाल ने बताया कि इस संघर्ष से मुख्य रूप से छह सेक्टर प्रभावित हो रहे हैं. सबसे ज्यादा असर ‘जेम्स एंड ज्वेलरी’ पर पड़ने की आशंका है, जहां लगभग $1980 मिलियन का एक्सपोर्ट दांव पर है. इसके अलावा फार्मा, इंजीनियरिंग गुड्स और एग्रो प्रोडक्ट्स पर भी बुरा असर दिख रहा है. समुद्री रास्तों में रुकावट से माल ढुलाई का खर्च (फ्रेट कॉस्ट) बढ़ गया है और क्रेडिट साइकिल भी प्रभावित हुई है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से क्या नुकसान?
सरकार ने बचाव के लिए क्या कदम उठाए हैं?
संकट से निपटने के लिए सरकार ने ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ अप्रोच अपनाई है. इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप की हर रोज सुबह 10:00 बजे मीटिंग होती है, ताकि रियल-टाइम फैसले लिए जा सकें. इसके अलावा:
डेडिकेटेड डेस्क: वेस्ट एशिया क्राइसिस डेस्क और टोल-फ्री हेल्पलाइन (1800-111-550) शुरू की गई है.
सब-ग्रुप का गठन: जल्दी खराब होने वाले सामान (Perishables) के लिए अलग से सब-ग्रुप बनाया गया है.
फार्मा सप्लाई: दवाओं की कमी न हो, इसके लिए एपीआई (API) और सॉल्वेंट्स की सप्लाई पर नजर रखी जा रही है.
एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत, सरकार ने बढ़ाई समयसीमा
सरकार ने निर्यातकों को राहत देते हुए एडवांस ऑथराइजेशन और ईपीसी स्कीम के तहत निर्यात दायित्व पूरा करने की अवधि 3 महीने बढ़ाकर 31 अगस्त 2026 कर दी है. इस दौरान कोई लाइसेंस रद्द नहीं होगा और जुर्माना भी नहीं लगेगा. साथ ही आरओडीटीपी लाभ को फिर से 100 प्रतिशत बहाल कर दिया गया है, जिससे एक्सपोर्ट कॉस्ट कंट्रोल में रहेगी.
ईसीजीसी कवर को भी बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक किया गया है. आमतौर पर यह 80 से 85 प्रतिशत रहता था. प्रीमियम नहीं बढ़ेगा और आने वाले समय में 95 प्रतिशत कवर का अतिरिक्त खर्च सरकार उठाएगी.





