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Jodhpur Darbar Horses Engine: पाली में स्थित 200 साल पुराना एक अनोखा इंजन आज भी इतिहास की गवाही देता है. यह इंजन कभी मारवाड़ के घोड़ों के लिए पानी की व्यवस्था करता था और इसका सीधा संबंध जोधपुर दरबार से बताया जाता है. उस समय इस तकनीक का उपयोग बड़े स्तर पर पशुओं की ज़रूरतें पूरी करने के लिए किया जाता था. यह इंजन न केवल उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाता है, बल्कि मारवाड़ की समृद्ध विरासत और राजसी जीवनशैली की झलक भी पेश करता है.
इंडियन फोरेस्ट ऑफिसर पी. बालामुरुगन (IFS) की पहल पर वन विभाग ने पीपीएल कंपनी के साथ मिलकर इस ऐतिहासिक धरोहर का कायाकल्प करवाया है. कई महीनों की मेहनत के बाद इस इंजन को रिनोवेट किया गया और अब इसे वन विभाग कार्यालय के मुख्य सेंटर पॉइंट पर प्रदर्शित किया गया है. आज यह न केवल विभाग की शान बढ़ा रहा है, बल्कि शहर के लोगों के लिए सेल्फी पॉइंट और ज्ञान का केंद्र भी बन गया है.

यह इंजन अंग्रेजों के जमाने की तकनीक का एक अद्भुत नमूना है. यह देसूरी फॉरेस्ट ब्लॉक के घने जंगलों में लावारिस हालत में पड़ा था और दशकों से जंग खा रहा था. जब वन विभाग के अधिकारियों की नजर इस पर पड़ी, तो उन्होंने इसके ऐतिहासिक महत्व को पहचाना. यह लगभग 200 साल पुराना भाप से चलने वाला इंजन है, जिसे उस समय घास काटने वाली मशीनों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

शायद ही आज की पीढ़ी को पता हो कि पाली जिला किसी जमाने में जोधपुर दरबार की घास कटाई का मुख्य केंद्र था. गुडा हैंडला फॉरेस्ट ब्लॉक वह स्थान था, जहां से जोधपुर महाराजा के प्रसिद्ध ‘जोधपुर लांसर्स’ (घुड़सवार सेना) के घोड़ों के लिए चारे की फीड तैयार की जाती थी. पाली से घास काटकर जोधपुर भेजना एक बड़ी रणनीतिक प्रक्रिया थी, जिसे सुचारू रूप से चलाने के लिए उस वक्त विशेष मशीनों का सहारा लिया जाता था.
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वन विभाग का उद्देश्य केवल एक मशीन को सजाना नहीं है, बल्कि पाली के समृद्ध इतिहास को आमजन तक पहुंचाना है. इस डिस्प्ले के जरिए लोग समझ पा रहे हैं कि कैसे पाली कभी लॉजिस्टिक्स का बड़ा केंद्र था. पी. बालामुरुगन के अनुसार, ऐसे स्मारकों का प्रदर्शन भावी पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने और संरक्षण की भावना पैदा करने के लिए जरूरी है.

यह इंजन इंग्लैंड की प्रसिद्ध जेसप कंपनी द्वारा निर्मित ‘रैनसम सिम्स एंड जेफरीज स्टीम थ्रैशिंग मशीन’ का हिस्सा है. उस दौर में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी, इसलिए इस विशाल इंजन को जंगल के भीतर चलाने के लिए छोटी पटरियों का उपयोग किया जाता था. इसकी मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 200 साल बाद भी इसका ढांचा आज के समय की मशीनों को चुनौती देता नजर आता है.

अगर इस इंजन की बनावट की बात करें तो यह अपनी भव्यता से सबको आकर्षित करता है. इसकी लंबाई लगभग 7-8 फीट, चौड़ाई 2-3 फीट और ऊंचाई करीब 8-10 फीट है. लोहे के विशाल पहियों और भाप निकालने वाली चिमनी के साथ यह इंजन आज भी उस औद्योगिक क्रांति की याद दिलाता है, जिसने तत्कालीन मारवाड़ रियासत की सैन्य शक्ति को मजबूती प्रदान की थी.





