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Next-Gen Supersonic Cruise Missile: ईरान जंग से दुनिया के तमाम देश अपनी सुरक्ष को लेकर बेहद सशंकित हो चुके हैं. वेनेजुएला से लेकर ईरान तक में अमेरिका ने जिस तरीके के कदम उठाए हैं, उससे डर और असुरक्षा की भावना का प्रबल होना स्वाभाविक है. भारत के लिए तो इस तरह की चिंताएं अन्य देशों से कहीं ज्यादा हैं, क्योंकि एक तरफ चीन तो दूसरी ओर पाकिस्तान जैसे देश हैं. भारत इन दोनों से होने वाले खतरों को बखूबी समझता है. यह वजह है कि मिसाइल से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम तक को अपग्रेड करने पर लगातार काम चल रहा है.
DRDO लॉन्ग रेंज एयर-टू-सरफेस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल डेवलप कर रहा है. इससे दुश्मन के एयरस्पेस या एयर डिफेंस सिस्टम की जद में गए बिना ही टार्गेट को न्यूट्रालाइज किया जा सकेगा. (फाइल फोटो/Reuters)
Next-Gen Supersonic Cruise Missile: ओमान की खाड़ी से लेकर हिन्द महासागर और एशिया से लेकर लैटिन अमेरिका तक में उथल-पुथल का आलम है. अमेरिका ने पहले स्पेशल ऑपरेशन चलाकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर अटैक कर दिया. इसके बाद से पश्चिम एशिया में हालात बेहद खराब हो चुके हैं. ईरान वॉर की आग फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी से होते हुए हिन्द महासागर तक पहुंच चुकी है. ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए सुरक्षा चिंताएं बढ़नी स्वाभाविक हैं. भारतीय वैज्ञानिक एरियल थ्रेट से निपटने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. इसके साथ ही एरियल फायर पावर को बढ़ाने के लिए ही एकसाथ कई प्रोजेक्ट लॉन्च किए गए हैं. लॉन्ग रेंज एयर-टू-सरफेस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (LRASSCM) प्रोजेक्ट उनमें से एक है. आमतौर पर सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की रफ्तार 2500 से 3700 किलोमीटर प्रति घंटे की होती है. एयर-टू-सरफेस मिसाइल को फाइटर जेट के साथ इंटीग्रेट कर टार्गेट पर अटैक किया जाता है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) Su-30MKI को ‘सुपर सुखोई’ बनाने के लिए खास क्रूज मिसाइल डेवलप कर रहा है, ताकि दुश्मन के एयरस्पेस या एयर डिफेंस सिस्टम की जद में गए बिना ही उसे तबाह किया जा सके. इस तरह की मिसाइलों से नूर खान जैसे एयरबेस और किराना हिल्स में छिपे परमाणु ठिकानों जैसे संवेदनशील टार्गेट को बिना किसी खतरे के निशाना बनाया जा सकेगा.
भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को एक और बड़ा बल मिलने जा रहा है. DRDO ने लॉन्ग रेंज एयर-टू-सर्फेस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (LRASSCM) परियोजना के लिए AoN (Acceptance of Necessity) हासिल कर ली है, जो भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी करने वाली मानी जा रही है. LRASSCM एक अगली पीढ़ी की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे लंबी दूरी से दुश्मन के जमीनी और संभावित समुद्री लक्ष्यों पर सटीक प्रहार करने के लिए विकसित किया जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी तूफानी रफ्तार है, जो इसे पारंपरिक सबसोनिक मिसाइलों की तुलना में कहीं अधिक घातक बनाती है. माना जा रहा है कि इसमें रैमजेट प्रोपल्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा जैसा कि BrahMos मिसाइल में पहले से सफलतापूर्वक किया जा चुका है. हालांकि, इसकी सटीक मारक क्षमता और रेंज से जुड़ी जानकारियां गोपनीय रखी गई हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिसाइल सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्यों को भेदने में सक्षम होगी. इससे इंडियन एयरफोर्स को दुश्मन के क्षेत्र में डीप स्ट्राइक करने की क्षमता मिलेगी, वह भी बिना अपने विमानों को अग्रिम मोर्चे के खतरे में डाले.
नेक्स्ट जेनरेशन LRASSCM को खासतौर पर Su-30MKI फाइटर जेट के लिए डेवलप किया जा रहा है. (फाइल फोटो/Reuters)
Su-30MKI बनेगा सुपर फाइटर जेट
इस परियोजना से जुड़ी एक अहम जानकारी यह है कि LRASSCM को शुरुआती चरण में विशेष रूप से Su-30MKI बेड़े पर तैनात किया जाएगा. यह निर्णय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि Su-30MKI भारतीय वायुसेना की रीढ़ माना जाता है. इसकी भारी पेलोड क्षमता, लंबी उड़ान सीमा और पहले से BrahMos जैसी उन्नत मिसाइलों के साथ सफल इंटीग्रेशन का अनुभव इसे इस नई मिसाइल के लिए आदर्श प्लेटफॉर्म बनाता है. IDRW की रिपोर्ट के अनुसार, Su-30MKI पर इस मिसाइल के कैरिज ट्रायल जल्द ही शुरू होने वाले हैं. इन परीक्षणों में मिसाइल के एयरोडायनामिक्स, एवियोनिक्स इंटरफेस और सेपरेशन मैकेनिज्म को इवेल्यूएट किया जाएगा. इसके बाद पावर्ड फ्लाइट ट्रायल और फुल इंटीग्रेशन की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा. इस चरणबद्ध प्रक्रिया से मिसाइल की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाएगी. Su-30MKI को प्राथमिकता देने के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि यह भारतीय वायुसेना का सबसे अधिक संख्या में मौजूद और मल्टीरोल लड़ाकू विमान है. इसके जरिए नई मिसाइल को तेजी से सेवा में शामिल किया जा सकता है, बिना नए प्लेटफॉर्म के इंतजार के. साथ ही ‘सुपर सुखोई’ अपग्रेड कार्यक्रम के तहत इस विमान में रडार, इंजन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम में प्रस्तावित सुधार इसे और अधिक शक्तिशाली बनाएंगे.
LRASSCM के ऑपरेशनल होने के बाद इंडियन एयरफोर्स को और ज्यादा अटैक ऑप्शन मिल जाएंगे. (फाइल फोटो/Reuters)
LRASSCM का डेवलपमेंट बेहद अहम
LRASSCM का विकास ऐसे समय में हो रहा है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और लंबी दूरी की सटीक स्ट्राइक क्षमताएं रणनीतिक संतुलन में अहम भूमिका निभा रही हैं. यह मिसाइल न केवल भारत की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि संकट की स्थिति में त्वरित और प्रभावी जवाब देने में भी मददगार साबित होगी. यह परियोजना DRDO की सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक तकनीकों में बढ़ती विशेषज्ञता को भी दर्शाती है. BrahMos जैसी परियोजनाओं की सफलता के बाद LRASSCM को पूरी तरह स्वदेशी समाधान के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे विदेशी निर्भरता में कमी आएगी.
एयरफोर्स के लिए ज्यादा विकल्प
भारतीय वायुसेना के लिए LRASSCM मिसाइल परिचालन लचीलापन बढ़ाने वाली साबित होगी. ऊंचाई से उड़ान भरते Su-30MKI प्लेटफॉर्म से लॉन्च होकर यह मिसाइल दुश्मन के एकीकृत वायु रक्षा तंत्र की पहुंच से बाहर रहकर भी सटीक प्रहार कर सकेगी. इससे विशेष रूप से उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी. LRASSCM परियोजना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो भविष्य के युद्धक्षेत्र में देश की मारक क्षमता और रणनीतिक बढ़त को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखती है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें




