साहब, छोटेलाल और किसान -Sahab, Chotelal aur Kisan

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अरे सरकार ये किसान आपसे बात करना चाहते हैं…कौन किसान?


अरे वही जो आंदोलन कर रहे हैं ऐसे जाड़ों में। छोटेलाल ने लिहाज में कहा। पहली बात तो ये किसान हैं ही नहीं साहब ने मन की बात बताई।


क्यों सर कोई कमी है इनके किसान होने में।


जिस तरह के ये कपड़े पहने हुए हैं, मसलन जीन्स-शर्ट,कोट वगैरह, उनको देखकर कहीं से लगता है कि ये सब किसान हैं


अरे हाँ, हम तो भूल ही गये थे कि आप कपड़ों से ही आदमी को पहचानने का हुनर रखते हैं!!

छोटेलाल ने अपनी गलती मानते हुए कहा।


लेकिन सर ये तो सरकार की नीतियों का प्रतिफल है कि आज किसान अच्छे कपड़े पहनने की हैसियत रखता है। यह तो प्रगति का सूचक है।

छोटेलाल ने प्रतिवाद सा किया।


नहीं.. यह विपक्षी दलों की साजिश है महज़। साहब से रहा न गया। तुम क्या जानो, किसानों के खोल में तमाम ऐसे लोग हैं जो ठंडी में शिमला, मसूरी टहलने जाते हैं, किराया बचाने के चक्कर में मौका पाकर अपने अरमान यहीं पूरे कर रहें हैं। 

आजकल हर आदमी अम्बानी और अडानी बनना चाहता है! अरे भाई, इसके पीछे छुपी उनकी मेहनत तो देखो। और फिर भूखे तो मर नहीं रहे किसान। अधिकतम मूल्य की चाहत, लालच की वजह से है। इच्छाओं का क्या, वह तो अनन्त है।


ठीक है साब पर बहुतेरे किसान जो आंदोलन में हैं, गरीब भी हैं।


इस पर सरकार ने छोटेलाल को समझाते हुए कहा कि असली किसान वह है जो इस समय खेतों पर हों, न कि यहां…. यहां सड़क पर कौन सी खेती हो रही है?

ये सब राजनीति कर रहें हैं। खेती की दृष्टि से ऐसे कीमती समय में ये किसानी न करके देश का कितना नुकसान कर रहें हैं, पता है कुछ आपको, चले आए पैरोकारी करने।

कुछ नहीं इनको केवल विपक्षियों ने भड़काया है। जो किसान राजनीति कर रहें हैं उनसे राजनीतिक तरीके से निपटा जाएगा। साहब ने हनक में कहा।


नहीं साब,  इन्हें अन्नदाता माना गया है,  हमें लगता है कि इनकी समस्याओं पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किये जाने की जरूरत है।


सरकार ने कहा कि काहे के अन्नदाता ?? 

अन्नदाता कभी इस तरह कुछ मांगता है? वह तो हमेशा देना जानता है, ये तो भिखमंगे हैं, बीस दिन से जमे हैं, कोई काम नहीं करने दे रहें।पर साहब उनकी msp की मांग तो जायज़ है, न हो एक बार देख लीजिए। छोटेलाल ने फिर सिफारिश लगाते हुए कहा।


साहब ने समझाते हुए कहा कि अच्छा ये बताओ कि एम.एस.पी. के होते हुए भी कौन  सा ये वही दाम पा जाते हैं।

वहां भी इनके अनाज को हाथ में लेकर कोई कमी बताते हुए कम ही दाम लगाए जाते हैं। तब तो कुछ नहीं कहते, उल्टे अपना अनाज तुलवाने के लिए हाथ-पैर जोड़ते हैं।

किसान बहुत चालाक होता है, वह मंडी में आने-जाने के भाड़े से बचने के लिए अपना अनाज तुलवाकर ही  वहां से हटता है।

और फ़िर मंडियों के दलाल भी तो इस समाज के अंग हैं, उनको क्या यूँ ही छोड़ दे, बेसबब, बेसहारे। उन बेचारों के पास कौन सी खेती है!! वह तो बेचारे इसी से अपना पेट पालते हैं।

चुनाव में यही बड़े दिल वाले अडानी जैसे लोग ही काम आते हैं। इनके पास बड़े-बड़े स्टोरेज हैं, वहां ये खरीदे गए अनाज को स्टोर भी कर सकते हैं।

अगर MSP के लालच के चक्कर में किसान अपना अनाज बेचने से इंकार कर दे तो और अपने पास ही रखे रहे तो खराब रखरखाव के चलते उसका सारा अनाज सड़ना ही है।

यह देश का कितना बड़ा नुकसान है। अपने क्षुद्र लालच के चलते दलालों के कहने पर अपना अनाज न बेचना कितना बड़ा पाप है?

रही बात व्यापारियों के प्रति ज्यादा सॉफ्ट कॉर्नर रखने की तो हमारा खुला मानना है कि वह न होते तो हम न होते। व्यापारियों के योगदान के प्रति हम सभी नतमस्तक हैं।

और फ़िर इन दलालों के पास सिर्फ़ अनाज को खरीदवाने का ही काम तो नहीं है, देश के विकास के लिए जरूरी स्थायी सरकार देने के लिए विधायकों को भी खरीदने की बड़ी जिम्मेदारी भी तो है। विधायकों की MSP का भी तो ध्यान रखना पड़ेगा न!


ख़ैर फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए नहीं तो साब इतिहास गवाह है, सरकारें पलट जाती हैं!

इसलिए मेरा सुझाव है कि जल्दी से जल्दी उनको वार्ता के लिए समय दीजिए। छोटेलाल ने मानवीय संवेदना के साथ आग्रह किया।

सरकार ने कुछ सोचते हुए कहा कि ठीक है; अच्छा अगले सप्ताह वार्ता के लिए बुला लेंगे।पर साहब इतनी भीषण ठंड में अगले सप्ताह का समय उसने सकुचाते हुए कहा।

तुम न समझोगे छोटेलाल,नाम की तरह तुम्हारी बुद्धि भी छोटी है। यह राजनीति है। ये सात दिन दिन उनके आंदोलन की गर्मी को ठंडा करने के लिए जरूरी है।

इतनी ठंड में उनकी माँगे मतलब भर की सिकुड़ जाएंगी।

छोटेलाल ने अपने नेता को श्रध्दाभाव से देखा और कहा कि मान गए आपकी दूरदर्शिता को… .… गर्व है आपके गुरुत्व पर🙏

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लेखक-संजीव शुक्ल

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