संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है| आहार, श्रम, विश्राम और ब्रह्मचर्य |
चाहे किसी के पास कितने ही सांसारिक सुख वैभव और वह सामग्रियां क्यों ना हो पर यदि वह स्वस्थ नहीं है, तो उसके लिए वे सब साधन सामग्रियां व्यर्थ हैं|
आरोग्य शास्त्र के आचार्यों ने उत्तम स्वास्थ्य के लिए मूल चार बातें बतलाई हैं, आहार, श्रम, विश्राम और ब्रह्मचर्य |
ब्रह्मचर्य के विषय में भगवान धन्वंतरी ने कहा है- जो शांति, क्रांति, स्मृति, ज्ञान, आरोग्य और उत्तम संतति चाहता हो उसे संसार के सर्वोत्तम धर्म ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए|
आयुर्वेद के आचार्य बांगभट का कथन है- संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है|
आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता में ब्रह्मचर्य को सांसारिक सुख का साधन ही नहीं मोछ का दाता भी बताया गया है|
सज्जनों की सेवा दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास धर्मशास्त्र के नियमों का ज्ञान और अभ्यास आतम कल्याण का मार्ग है |
जो नवयुवक सिनेमा देखकर, काम विकार बढ़ाने वाली पुस्तकें पढ़कर या अनुभवहीन लोगों की दलीलें सुनकर स्वयं भी ब्रह्मचर्य को निरर्थक कहने लगते हैं,
वे अपने चारों तरफ की निगाह दौड़ा कर अपना अपने साथियों की दशा देखें|
उनमें से हजारों जवानी में ही शक्ति हीनता का अनुभव करके ताकत की दवाइयां या टॉनिक आदि ढूंढने लगते हैं|
हजारों शुक्रप्रमेह के शिकार होकर निस्तेज चेहरे लिए फिरते हैं, और हजारों ऐसे भी हैं जो भयंकर रोगों के शिकार होकर अपने जीवन को बर्बाद कर लेते हैं|
नेत्र व कपोल अंदर धस जाना, कोई रोग ना होने पर भी शरीर का जर्जर ढीला सा रहना, गालों में झाई मुहासे काले चकते पड़ना,
जोड़ों में दर्द, तलवे तथा तेली पसीजना,अपच और कब्जियत, रीढ़ की हड्डी का झुक जाना,
एकाएक आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, मूर्छा आ जाना, छाती के मध्य भाग का अंदर धस जाना, हड्डियां दिखाना,
आवाज का रुख, और अप्रिय बन जाना, सिर कमर तथा छाती में दर्द उत्पन्न होना,
यह वह शारीरिक विकार हैं जो वीर्य रक्षा ना करने वाले युवकों में पाए जाते हैं|
छोटे-छोटे बच्चे बीड़ी सिगरेट पीते हैं, पान मसाला खाते हैं|
सिनेमा के गदे गाने गाते हैं, पापाचरण से अनजाने में ही अपने भाभी सुख स्वास्थ्य आयु की जड़े खोखली कर डालते हैं|
वीर्य नाश का फल होने उस समय तो विदित नहीं होता परंतु कुछ आयु बढ़ने पर उनके मोह का पर्दा हटता है|
फिर वे अपने अज्ञान के लिए के लिए पश्चाताप करते हैं|
ऐसे बूढ़े नवयुवक आज गली गली में वीर्य वर्धक चूर्ण चटनी, माजून गोलियां, ढूंढते फिरते हैं|
लेकिन उन्हें घोर निराशा ही हाथ लगती है, वे ठगे जाते हैं|
अतः प्रत्येक माता-पिता, अध्यापक, सामाजिक संस्था तथा धार्मिक संगठन,
कृपया करके पतन की गहरी खाई में गिर रही युवा पीढ़ी को बचाने का प्रयास करें|
संसार वीर्यवान के लिए है वीर्यवान जातियों ने संसार में राज्य किया, और वीर्य विहीन होने पर उनका नामोनिशान मिट गया|
वीर्य को नष्ट करने वाला जीवन भर रोगी, दुर्भाग्यसाली और दुखी रहता है|
उसका स्वभाव चिड़चिड़ा क्रोधी और रुक्ष बन जाता है, मानसिक दुर्बलता बढ़ जाती है स्मृति कमजोर हो जाती है|
परशुराम, हनुमान और भीष्म इसी व्रत के बल पर न केवल अतुलितबलधामं बने, बल्कि उन्होंने जरा और मृत्यु तक को जीत लिया|
हनुमान ने समुद्र पार कर दिखा दिखाया और अकेले परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से आताताई और आनाचारी राजाओं को नष्ट कर डाला|
“दीपक का तेल बाती से होता हुआ उसके सिर पर पहुंचकर प्रकाश उत्पन्न करता है
लेकिन यदि दीपक की पेंदी में छेद हो तो ना तेल बचेगा और ना ही दीपक जलेगा|”
ब्रह्मचर्य अभ्यास के द्वारा संभव है –
कालिदास ने प्रयत्न और अभ्यास से इसे सिद्ध करके जड़ बुद्धि से महाकवि बनने में सफलता प्राप्त की|
रामकृष्ण परमहंस विवाहित होकर भी योगियों की तरह रहते रहे वे सदैव आनंदमगन रहते थे|
स्वामी रामतीर्थ और महात्मा बुद्ध ने तो परमात्मा सुख के लिए पत्नी तक का परित्याग कर दिया था|
महात्मा गांधी ने 36 वर्ष की अवस्था के बाद कामवासना को बिल्कुल नियंत्रित कर दिया था तो भी उनके जीवन से प्रसन्नता का फव्वारा छूटता रहता था|
निष्कर्ष-
“”दुर्लभ अमूल मनुष्य शरीर पाकर भी यदि मनुष्य उसे विकारों में ही नष्ट कर दे,
तो उसे चंदन के वन को सूखी लकड़ियों के भाव बेचने वाले मूर्ख लकड़हारे की तरह ही समझा जाएगा“”
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