सुगंध पुर के राजा वज्रबाहु ने प्रजा के हित में जगह-जगह तालाब खुद वाय और धर्मशालाएं व मंदिर बनवाए।
पूरे देश में उनकी कीर्ति प्रजा वत्सल राजा के रूप में फैल चुकी थी।
एक बार उनके राज्य में एक संत पधारे और घने जंगल में एक वृक्ष के नीचे उन्होंने अपना डेरा जमा लिया।
राजा को पता चला तो उन्होंने अपने मंत्री और बेटे को संत के पास भेजा।
राजकुमार ने जाकर संत से प्रार्थना की : महाराजा ने आपको सादर राज महल में आमंत्रित किया है।
आप अपने चरणों से हमारे महल को पवित्र करने की कृपा करें।
संत ने उत्तर दिया : राजकुमार, संतो को एकांत में रहकर ही साधना करनी चाहिए। आप राजा को हमारा आशीर्वाद पहुंचा दे।
संत की विरक्ति को जानकर राजा बेहद प्रभावित हुए। अगली सुबह व वन में पहुंचे।
संत को प्रणाम कर उन्होंने कहा : महात्मा, मैंने यथाशक्ति प्रजा जनों की सेवा की है। उन्हें तरह-तरह की सुविधाएं मुहैया कराई है। फिर भी मेरा मन अशांत रहता है। इसका क्या कारण है?
संत ने जवाब दिया : राजन, आपने तालाब मंदिर आदि बनवाए हैं लेकिन आपके अनु चारों ने उन पर आपके नाम पट लगवा कर आपके पुण्य को क्षीण कर दिया है।
सेवा कार्य में अहंकार का प्रदर्शन ही मन की अशांति का कारण है। उसी दिन राजा ने अपने नाम पट करवाने के आदेश दिए। उनका हृदय अहंकार मुक्त हो चुका था।
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