एक दिन सर्भंग ऋषि के शिष्य संत शुतिक्षण जी से ऋषि ने कहा शालिग्राम को गंगा जी से स्नान कराके ले आओ,
तब सतीश जी Shaligram को जोली में रख कर चल दिए चलते चलते उन्हें रास्ते में भूख लग गई।
वह इधर उधर खाने के लिए फल ढूंढने लगे।
तभी उनको गंगा किनारे एक जामुन का पेड़ नजर आया जिस पर अनेक काले काले जामुन लगे थे।
उन्होंने सोचा जामुन कैसे तोड़े उन्होंने डंडी से तोड़ने का प्रयास किया लेकिन जामुन ना टूटे।
तभी उन्हें शालिग्राम की याद आई उन्होंने Shaligram शालिग्राम को फेंका जिससे अनेकों जामुन टूट कर गिर गए।
लेकिन Shaligram गंगा जी में चले गए।
शुतिक्षण जी ने पेट भर के जामुन खाए पेट भर जाने के बाद उन्हें Shaligram की याद आई।
उन्होंने शालिग्राम को ढूंढना शुरू किया लेकिन Shaligram गंगा जी में जा चुके थे, इसलिए वह कहीं नहीं मिले।
शुतिक्षण जी सोचने लगे कि अब तो गुरु जी नाराज होंगे, उन्होंने दिमाग लगाया कि Shaligram की तरह ही जामुन भी लगे रहे हैं इसलिए क्यों न जामुन को ही शालिग्राम बना कर ले चले।
उन्होंने यही किया वह जामुन को शालिग्राम बना कर ले गए।
शुतिक्षण जी Shaligram के सिंहासन में जामुन को चंदन का टीका लगा कर रख लेते हैं और गुरु जी के आश्रम पहुंच जाते हैं।
दूसरे दिन सुबह का जब सर्भंग ऋषि ने शालिग्राम को निकाला और उन्हें नहलाना शुरू किया तो ऊपर का क्षेत्र हट गया और गुठली निकल आई।
ऋषि ने अपने शिष्य से पूछा कि यह क्या हुआ तो शिष्य ने कहा –
पुनी पुनी चंदन पुनी पुनी पानी,
शालिग्राम सड़ी गए हम का जानी।
तब ऋषि जी नाराज हो गए और उन्होंने अपने शिष्य को आश्रम से निकाल दिया और कहा कि आश्रम तभी लौटना जब शालिग्राम मिल जाए।
शुतिक्षण जी चले गए और उन्होंने तपस्या आरंभ कर दी, शालिग्राम का जाप करते रहे।
अनेको वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात जब राम, लक्ष्मण, सीता उनके पास आते हैं तो वह उन्हें अपने गुरु के पास ले जाते हैं।
रामचंद्र जी को देखकर उनके गुरु अति प्रसन्न हो जाते हैं और वे अपने शिष्य को क्षमा कर देते हैं।
साक्षात भगवान को अपने सामने देखकर वह अपने शिष्य को माफ कर भाव विभोर होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ते हैं।
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