वन में जाते समय ऋषभ देव ने ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्य दिया था।
लंबे समय बाद जब पुत्र युवा हो गए, तब उन्होंने राज्य का भार सौंप भरत राजधानी से दूर पुलहाश्रम चले गए।
एक दिन भरत स्नान कर नदी में ही खड़े-खड़े जप कर रहे थे, तभी एक गर्भवती हरिणी जल पीने आई।
वह पूरा जल पी भी नहीं सकी कि सिंह की गर्जना सुनाई दी। मृगी ने किनारे पर जाने के लिए छलांग लगा दी। तभी हिरनी के पेट का बच्चा निकल कर नदी में बहने लगा।
मृगी ने शोक में वही प्राण त्याग दिए। भरत यह सब देख रहे थे। वह बच्चे को उठाकर अपनी कुटिया में ले आ गए।
कुछ दिनों में मृगशिशु स्वयं चरने योग्य हो गया। भरत धीरे-धीरे उस हिरनी के बच्चे के ममत्व में फंस गए।
एक समय उनका निधन हो गया। क्योंकि मृगवाशक का चिंतन करते हुए उन्होंने शरीर छोड़ा था, तो उन्हें मृगयोनि में जन्म लेना पड़ा।
उनका जन्म कलिंजर में एक मृगी के गर्भ से हुआ। पर उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण बना रहा।
जैसे ही वह चलने दौड़ने के योग्य हुए की कलिंजर से भाग फिर पुलहाआश्रम में आ गए और वृक्षों से सूख कर गिरे पत्ते खाकर रहने लगे।
यथासमय उन्होंने शरीर त्याग दिया। भरत का तीसरा जन्म एक ब्राह्मण के यहां हुआ। यहां भी उन्हें अपने पूर्व जन्म का स्मरण बना रहा।
उन्होंने अपने को ऐसा बना लिया कि सांसारिक व्यवहार में पड़कर आसक्ति ना हो जाए।
उनका अटपटापन देख लोग उन्हें ‘जड़’ कहने लगे। उनका नाम ही जड़भरत पड़ गया। यही उनका अंतिम जन्म था।
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