केरल के कालड़ी गांव में शंकर का जन्म हुआ था। शंकर बहुत ही प्रतिभावान और आज्ञाकारी बालक था। वह अपनी मां का लाडला था।
केवल सात वर्ष की उम्र में असाधारण प्रतिभावान बालक शंकर धर्मशास्त्रों, वेद – उपनिषदों का अध्ययन पूर्ण कर महान पंडित बन गए थे।
आठ वर्ष कि आयु होने पर उन्होंने अपनी माता के चरण स्पर्श कर उनसे संन्यास लेने की अनुमति मांगी।
मां ने कहा, ‘ बेटा! मैंने तुम्हें जन्म दिया है। एक मां को अपने बालक के प्रति मोह होना स्वाभाविक है।
मैं नहीं चाहती कि तू मुझसे दूर रहे। लेकिन तुमने अगर संन्यास लेने की ठान ही ली है, तो मैं तुम्हें रोकूंगी भी नहीं।
मेरी बस एक इच्छा है कि मेरी मृत्यु के समय तू मेरे सामने रहे, तेरे सामने ही मैं अपने प्राणों का त्याग करूं।’
शंकर ने कहा, ‘ मां! धर्मशास्त्रों से मैंने माता – पिता की सेवा के धर्म को अच्छी तरह समझ लिया है।
अतः संन्यास लेने के बावजूद मैं तुम्हारी सुध लेता रहूंगा और वायदा करता हूं कि तुम्हारे अंतिम समय में मैं तुम्हारे चरणों में उपस्थित रहूंगा।’
मां के अंतिम समय में शंकर, जो आघ शंकराचार्य के रूप में विख्यात हुए, धार्मिक कार्यक्रम को बीच में छोड़कर योग बल से मां के सम्मुख उपस्थित हो गए।
मां ने अपने सन्यासी बेटे के सामने ही अंतिम बार अपने नेत्र बंद किए।
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