लोग बाग दिशा रवि की गिरफ़्तारी पर शुरू से ही बहुत बवाल काटे थे, कह रहे थे ये बहुत ही अलोकतांत्रिक निर्णय था।
सरकार ने बहुतै गलत किया। भाई आप क्या चाहते हैं कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे पाँच साल। अरे कुछ तो करेगी ही।
भाई मन की बात करने से ही तो सब बात नहीं बनती, कुछ मन का करने भी तो दीजिए। जहां बेचारे कुछ मन का करने चलते हैं, छुट्टा मीडिया के पेट में मरोड़ होना शुरू हो जाता है!
आप लोगों के साथ दिक्कत यह है कि आप लोग भावना में बहकर बहुत जल्दी सैद्धांतिक हो जाते हैं।
सरकार के हर निर्णय पर सवाल खड़े करना ठीक नहीं। अच्छे काम हो नहीं पा रहें और गलत काम कोई करे ना तो फिर कोई करे क्या ??
आख़िर गलत काम भी तो काम ही होते हैं न!! और फिर इसमें तो कुछ गलत जैसा है भी नहीं।
क्या कांग्रेसियों ने कोई गलत काम नहीं किये?
क्या गलत कामों का ठेका सिर्फ़ कांग्रेस वालों ने ही ले रक्खा है। अगर अपनी सरकार, अपनी पुलिस में भी गलत काम न कर सके तो फ़िर काहे का जलवा??
और फ़िर दिशा की गिरफ्तारी में गलत क्या था? यह एक सही दिशा में लिया गया सद्भावपूर्ण निर्णय था।
दरअसल सरकार गांधीजी के सिद्धांतों को किताबों से निकालकर व्यवहार में उतारना चाहती है।
गाँधीजी के साध्य और साधन की पवित्रता में अखंड विश्वास को सरकार ने अब आंदोलन के रूप में ले लिया है।
गांधी जी का कहना था कि न केवल हमारा उद्देश्य पवित्र और लोकहितकारी होना चाहिए बल्कि उस उद्देश्य को प्राप्त करने के तरीके भी पवित्र होने चाहिए।
सरकार ने यही सूत्र कसकर पकड़ लिया। हम लोग पैदाइशी गांधीवादी हैं। हम लोग गांधी को इस्तेमाल कर लेने की हद तक सहज गांधीवादी हैं।
दिशा रवि का उद्देश्य भले ही पवित्र हो पर उनके उद्देश्यपूर्ति के साधन पवित्र नहीं थे।
अब बताइये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर टूलकिट जैसा विध्वंसक हथियार लेकर आप सरेआम घूमेंगी !!
वह भी गांधी के देश में! राम-राम!! नाम ही बड़ा खतरनाक है।
और फिर खाली दिशा का मामला होता तो एक बार सरकार छोड़ भी देती पर उसे इन छोटे-छोटे कामों से अन्य तंत्रों के कामों की समझाइश भी देखनी रहती है।
उदाहरण के तौर पर इस मामले में न्यायपालिका की समझ दिखी।
न्यायतंत्र ने गिरफ्तारी की भर्त्सना की। न्यायिक सक्रियता से लोकतंत्र पुष्ट हुआ। अब बताइये यह सब गिरफ्तारी के बगैर कैसे संभव होता!!
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