महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद अपने पुत्रों कि मृत्यु से दुखी धृतराष्ट्र ने एक दिन विदुर जी को अपने पास बुलाया।
बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, ‘विदुर हमारे कौरव पक्ष में एक से बढ़कर एक योद्धा थे, फिर भी युद्ध में हमारे योद्धाओं का सफाया हो गया।
इसका मूल कारण क्या है?’
विदुर जी जन्मजात स्पष्टवादी थे, इस कारण उन्हें समय – समय पर अपमानित होना पड़ता था।
धृतराष्ट्र को जवाब देते हुए उन्होंने कहा, ‘राजन, विजय हमेशा धर्म और न्याय की होती है।
कौरव पक्ष के लोगों ने पांडवों के साथ अन्याय किया जिसका फल उन्हें भोगना ही था।
भगवान कृष्ण तक उन्हें समझाने गए थे कि पांडवों का राज्य में बराबर का हिस्सा है।
उन्हें ज़्यादा नहीं, तो केवल पांच गांव दे दो।
उनके अधिकारों का हरण करना सरासर अन्याय होगा, किंतु कौरव अपनी संख्या और सैन्यबल के अंहकार में किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुए।
न्याय – अन्याय का विचार किए बिना जो युद्ध के लिए तत्पर होता है, उसका विनाश होता ही है और यही कौरवों के साथ हुआ।’
धृतराष्ट्र विदुर की बात सुनकर हतप्रभ रह गए फिर कुछ क्षण रुककर बोले, ‘मैं भी तो इसमें सहभागी रहा हूं।
पुत्र मोह के कारण में पांडवों के साथ होते अन्याय को चुपचाप देखता रहा।’
यह कहते हुए धृतराष्ट्र रोने लगे।
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