आख़िर क्या हो गया है, हमारी मानवीय संवेदनाओं को? वे मानवीय मूल्यों के प्रति इतनी निष्ठुर कैसे हो गईं? लोग मर रहें हैं और हम महामारी से लड़ने के बजाय चुनाव लड़ रहे हैं।
हमारी राजनीतिक चेतना इस कदर पतित हो चुकी है कि वह अपने मूल उद्देश्य जनसेवा से इतर शुद्ध व्यावसायवादी हो गयी है।
वह लोककल्याण को छोड़ कुछ पूंजीवादी तत्वों की पैरोकार बन गयी।
जिस राजनीति के जरिए समाज के अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुँचाने की शपथ ली गयी थी वह अब पूंजीपतियों की चेरी बन अहर्निश उनके उत्थान के लिए उद्यत रहती है।
राजनीति अब उद्योगपतियों के इशारों पर नर्तन करने वाली क्रीतदासी जैसी हो गयी है।
राजनीतिक चेतना पतित इतनी कि हम महामारी को भी उत्सव घोषित कर दें! और कुंद इतनी कि एक बड़े लोकतंत्र में लोग बिना विचार किये भेड़चाल में उसे मनाना भी शुरू कर दें।
एक बड़ा वर्ग एक इशारे मात्र पर ताली, थाली और टार्च के जरिये महामारी को पटकनी देने मैदान में उतर आया। यह ढोल-मजीरों की आवाज के बीच अपनों को खोने की चीखों को दबाने का उपक्रम जैसा ही था।
क्या इस भटकाव की कोशिश से त्रासदी कम हो गई?
आश्चर्य यह नहीं कि हमेशा की तरह सत्ताएं हमको मुद्दों से भटकाती रहीं, आश्चर्य यह कि हमने अभी भी सत्ता से सवाल पूछना नहीं सीखा।
आश्चर्य यह कि हम लोकतंत्र में भी सत्ता के राजत्ववादी सिद्धांत के प्रति अपनी निष्ठा त्याग नहीं पाए।
आश्चर्य यह कि वह जो-जो कहते रहें हम अनुचर की तरह आज्ञा पालन करते रहे। हमने कोरोना काल में यह नहीं पूछा कि जब जनता मर रही है तो चुनाव का क्या मतलब?
हमने यह नहीं पूछा कि जब दिन में मीटिंग्स, रैली, प्रशिक्षण हो रहें हैं तो रात्रिकालीन कर्फ्यू का क्या मतलब और वह भी छोटे शहरों-कस्बों में।
हमने यह नहीं पूछा कि राहत कोष में जमा पैसा कहाँ-कहाँ खर्च हुआ? हमने यह नहीं पूछा कि पी.एम.केयर्स फंड RTI और कैग के ऑडिट के दायरे से बाहर क्यों है?
हमने यह नहीं पूछा कि पिछले वर्ष से अब तक कितने एम्स स्तर के अस्पताल बनवाने की शुरुआत की गई ?
लोग महामारी से मर रहे हैं और हम सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण में व्यस्त हैं। समाज का एक बड़ा तबका अपनी वैचारिकी को एक खूंटे में बांध अंध निजीकरण के फायदे गिना रहा है।
इस भीषण महामारी के समय कितने निजी अस्पतालों ने जनहित में अपने दरवाजे खोले हैं, यह एक खुला प्रश्न है। क्या सरकारी संस्थानों के अभाव में प्राइवेट संस्थानों को खुली लूट की छूट नहीं मिल जाएगी?
ध्यान दिया जाय कि बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में बहुत कम ख़र्च पर इलाज की उपलब्धता प्राइवेट नर्सिंग होम्स को भी प्रकारांतर से सस्ते इलाज के लिए प्रेरित करती है।
जो ऑपरेशन सरकारी अस्पतालों में कुछ हजारों में हो जाता है, प्राइवेट अस्पताल चाहकर भी उस इलाज के चौगुने दाम नहीं ले सकते।
क्या कभी यह सोंचा है कि सरकारी अस्पतालों के अभाव में सामान्य मजदूर वर्ग अपना इलाज कैसे करा पायेगा ?
अगर सरकारी अस्पतालों या अन्य संस्थाओं की कार्यप्रणाली या कार्य संस्कृति खराब है तो यह सरकार का दायित्व है कि उसे ठीक करे, यह नहीं कि उसे अंबानी या अडानी को सौंप कर निश्चिंत हो जाए।
एक हद तक निजीकरण उचित है पर अंध निजीकरण किसी भी दृष्टि में उचित नहीं।
आज सत्तावादी ताकतों के मनमाने ढंग से लिये गए निर्णयों ने लोकतंत्र के मूल चरित्र को प्रभावित किया है।
स्वार्थी तत्वों ने भारतीय समाज की विविधता को वोटों के आपसी संघर्ष में बदल दिया। और आश्चर्य यह कि जनता इस खेल को समझ नहीं रही। यह मानसिक विकलांगता है।
लोग रोजगार और आर्थिक मुद्दों की तरफ मुड़कर कहीं सरकार को ही कठघरे में न खड़ा कर दें, इसलिए उन्हें अन्य गैरजरूरी मामलों में उलझाया जा रहा है।
एक-दूसरे का भय दिखाकर सांप्रदायिक गोलबंदी को मजबूत बनाया जा रहा है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वोटबैंक को बिखरने से रोकता है।
काल्पनिक भय उन्हें बहुत कुछ सोचने नहीं देता। यह चिंतन के आयामों को बहुत सीमित कर देता है। जिंदा रहना ही जीवन की उपलब्धि लगने लगती है।
एक खास नेतृत्व अपरिहार्य लगने लगता है। ऐसे में नेतृत्व एक वर्ग-विशेष के नाम पर आसानी से अपने हित साधन को प्रमुखता दे लेता है।
वह जुमलों की राजनीति करने लगता है। अब ऐसे में कोई कोरोना को उत्सव का रूप दे दे या कि किसी आपदा को अवसर में बदल देने की सलाह दे तो ताज्जुब नहीं करना चाहिए।
सत्ताएं विपदाओं को अवसर में बदलने का आख्यान दे रहीं और हम उनकी वाणी को देवतुल्य मान उनके स्तुतिगान में जुट गए।
लोकतंत्र का प्रखर स्तंभ मीडिया का एक बड़ा भाग पहले से ही सत्ता के विरुद गायन में व्यस्त है। वह सत्ता से प्रश्न पूछने के बजाय विपक्ष से पूछ रहा है।
और विपक्ष भी जनता के बीच उतरने के बजाय सिर्फ़ प्रेस कांफ्रेंस में ही अपनी बात कहकर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेता है।
सत्ताएँ पहले भी बेलगाम रहीं हैं पर तब स्वस्थ आलोचनाओं का नैतिक दबाव रहता था। पक्ष-विपक्ष की आलोचनाओं में एक मर्यादा रहती थी।
लोग सड़क छाप भाषा के प्रयोग से बचते थे। पर अब तो इस बात के लिए कम्पटीशन है कि कौन ज्यादा से ज्यादा गंदा बोल सकता है।
मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री को नीच और राहुल गांधी ने उन्हें चोर कहा, तो प्रधानमंत्री भी उसी स्तर पर आकर अपने भाषाबोध का परिचय कराने से नहीं चूके।
उन्होंने भी सोनिया गांधी को जर्सी गाय, विधवा और राहुल को हाईब्रिड बछड़ा कहा। प्रधानमंत्री के स्तर पर इस तरह की भाषा को पहली बार मान्यता मिली।
जो 70 सालों में नहीं हुआ वह अब हुआ। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ने सोनिया को वेश्या कहा तो अमित शाह ने गांधी को चतुर बनिया बताया।
जिस देश मे नारी को पूजने का दम भरा जाता है, उस देश में इस तरह की अभिव्यक्ति के खिलाफ किसी भी तरह की कोई आवाज नहीं उठी।
अब इतना ही हमारा सांस्कृतिक मूल्यबोध बचा है!! दीदी ओ दीदी का स्टाइल इसी भाषा शैली का नया वर्जन है।
यह दुःखद स्थिति है। पद और मानवोचित मर्यादा का ध्यान रखा ही जाना चाहिए;प्रधानमंत्री के प्रति भी और किसी अन्य के प्रति भी।
पर प्रश्न यह है कि आखिर हम गलत का विरोध क्यों नहीं करते? कई बार हम सुविधावादी हो जाते हैं और अपने विरोधी के प्रति की गई अन्यायपूर्ण टिप्पणी को भी सहर्ष मान्यता देते हैं।
अपनी घृणा को शांत करने के लिए हम इस तरह की छूट ले ही लेते हैं। मान लिया कि सोनिया जन्मना विदेशी हैं तो क्या हम उनको सामान्य स्त्रियोचित सम्मान भी नहीं दे सकते ?
आख़िर हमारी राजनीतिक चेतना का नैतिक और सामाजिक बोध इतना दुर्बल कैसे हो गया? यह सोचने की बात है।
हमारी चुप्पी जहां अनाचार को बढ़ावा देती है वहीं हमारे नैतिक पतन की गिरावट को भी त्वरा देती है।
लोगों ने देखा है कि किस तरह मरीजों को अपराधी के रूप में विज्ञापित किया गया। एक विशेष रंग देने की कोशिश की गई। प्रश्न उठाने पर समाज विरोधी घोषित किया गया।
क्या यही नव लोकतंत्र है? धार्मिक मसलों की आड़ में राजनीतिक फायदे उठाए जा रहे हैं। और लोग समझ भी नहीं रहे।
कांग्रेस शाहबानो प्रकरण में अपने सामाजिक बोध को इसलिए ताक पर रख दिया कि कहीं मुस्लिम समुदाय नाराज न हो जाए तो आज भाजपा के तमाम बड़े नेता सामाजिक विघटन की कीमत पर ध्रुवीकरण को तेज कर रहें हैं।
आज राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐतिहासिक चरित्रों की अद्भुत व्याख्या की जा रही है।
एक विशेष प्रवृत्ति राणाप्रताप और शिवाजी के स्वाभिमान और उनकी साम्राज्यिक चेतना को हिंदूवाद के विशेष दृष्टिकोण से देखे जाने का आग्रह करती हुई दिखती है।
जबकि इन दोनों का हिंदुत्व कहीं से भी संकीर्ण नहीं था। उनका हिंदुत्व ध्रुवीकरण की सीमाओं तक नहीं जाता था। अगर राणाप्रताप का हिंदुत्व मुस्लिम विरोध से प्रेरित होता तो वे अपना सेनापति हकीम खां सूर को न बनाते।
और शिवाजी की सेना में बड़ी संख्या में मुस्लिम न होते। ज्ञात हो कि शिवाजी की नौ सेना के प्रमुख सिद्दी संबल, गुप्तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली तथा तोपखाने के मुखिया इब्राहिम गर्दी थे।
यह भी ध्यान रहे कि शिवाजी को अफजल खान के षड्यंत्र की जानकारी भी एक मुस्लिम रुस्तमे जमां ने दी थी। शिवाजी ने अपने महल के सामने मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए एक मस्जिद बनवाई थी।
मगर ध्रुवीकरण के शोर में सद्भाव के इन खूबसूरत तथ्यों/पहलुओं को दबा दिया गया। ध्यान रहे कि अकबर का सेनापति मानसिंह और औरंगजेब का सेनापति भी जयसिंह था।
दरअसल हम पढ़ते नहीं है हम बनी-बनाई धारणाओं से ही अपनी सोच विकसित करते हैं। हम प्रामाणिक इतिहास पढ़ते नहीं, और जो कुछ पढा भी है तो वह मनोहर कहानियों की तर्ज़ पर गढ़ा गया इतिहास है।
आधी-अधूरी जानकारी के कारण ही हम लोकतंत्र के जागरूक मतदाता की जगह दूसरों के इशारों पर चलने वाले रोबोट बनकर रह गए।
सजग लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि हम सही तथ्यों से परिचित हों और मानवीय संवेगों से परिचालित हों।
इसके लिए जिन मुद्दों या चरित्रों की आड़ लेकर ध्रुवीकरण किया जाता है, उन मुद्दों/चरित्रों को विस्तार से जनता के सामने लाया जाना चाहिए ताकि वह हकीकत से रूबरू हो सके।
हमें सत्ता के वायदों पर कड़ी निगाह रखनी चाहिए ताकि राजनीति को शतरंज का खेल बनने से रोका जा सके।
लोकतंत्र को पाँच सालों के लिए जनप्रतिनिधियों के हवाले कर, सो जाने की हमारी आदत ने सत्तातंत्र को बेलगाम कर दिया है।
जनता का पाँच साल के लिए हाइबरनेशन में चले जाना लोकतंत्र का सबसे घातक पक्ष है। प्रायः अवसरवादी नेतृत्व जनता के इसी व्यवहार का फायदा उठाता है।
वह अपने वाग्जाल से जनता को भरमाता है। जागरूकता ही राजनीतिक शुचिता आरंभ बिंदु है।
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