महाराणा प्रताप की कहानी-Story of Maharana Pratap

0
16

जानिए दुनियाभर में मशहूर महाराणा प्रताप के बारे में

देशभर में 9 मई को महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है। महाराणा प्रताप मेवाड़ के राजा और एक वीर योद्धा थे। महाराणा प्रताप एक ऐसे वीर योद्धा थे जिनके नाम से उनके दुश्मन के पसीने छूट जाते थे।

महाराणा प्रताप को केवल उनकी बहादुरी के लिए ही नहीं बल्कि उनके दरियादिली और जनता के प्रति प्रेम के लिए भी जाना जाता है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था।

इसीलिए हर साल 9 मई को महाराणा प्रताप की जयंती के रूप में मनाया जाता है। महाराणा प्रताप की जयंती के मौके पर देशभर में विभिन्न तरह के प्रोग्राम का आयोजन होता है। जिसमें महाराणा प्रताप पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

महाराणा प्रताप का जन्म साल 1540 मैं 9 मई को राजस्थान के मेवाड़ राज्य में हुआ था। महाराणा प्रताप का जन्म एक सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदय सिंह और माता रानी जयवंता के यहां हुआ था।

महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से भी जाना जाता था। महाराणा उदय सिंह की 33 संताने थीं जिनमें महाराणा प्रताप सबसे बड़े बैटे थे। महाराणा प्रताप बचपन से ही ढीट एवं बहादुर होने के साथ-साथ साहसी और स्वाभिमानी भी थे।

साधारण शिक्षा लेने के साथ उनकी रूचि खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में भी थी। महाराणा प्रताप को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया गया। साल 1572 में महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ।

सिंहासन पर बैठते ही महाराणा प्रताप को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन महाराणा प्रताप ने साहस और धैर्य के साथ हर चुनौती का सामना किया।

महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी में युद्ध

महाराणा प्रताप का मुगलों के साथ हल्दी घाटी में भारी युद्ध हुआ। इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने जो पराक्रम दिखाया वह इतिहास में कभी ना भूलने वाला है। महाराणा प्रताप ने अपने पूर्वजों की मांग और मर्यादा की रक्षा की।

इसी के साथ महाराणा प्रताप ने प्रण लिया कि जब तक अपने राज्य को मुगलों के शासन से मुक्त नहीं करा लेंगे, तब तक राजघराने का सुख भी नहीं भुगतेंगे।

महाराणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की रक्षा और सेवा के लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया। हल्दीघाटी का युद्ध भारत के इतिहास में काफी प्रचलित है। यह युद्ध साल 1576 में 18 जून को हुआ था।

यह युद्ध कम से कम 4 घंटे तक चला और मुगलों और मेवाड़ के सैनिकों के बीच घमासान युद्ध हुआ। मुगलों की सेना का नेतृत्व मानसिंह एवं आसफ खां ने किया और मेवा की सेना का नेतृत्व एक मुस्लिम सरदार हकीम खान सूरी ने किया।

इस युद्ध में केवल महाराणा प्रताप के 20000 सैनिकों का सामना अकबर के 80000 सैनिकों के साथ था। यह एक बहुत बड़ी बात थी। कई मुश्किलों के बाद में महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और अपने पराक्रम को दर्शाया।

इसी की वजह से उनका नाम इतिहास के पन्नों में सबसे ऊपर चमकता है। अपनी सेना को छोटी ना समझकर महाराणा प्रताप में अकबर की सेना को पिछे हटने पर विवश कर दिया।

महाराणा प्रताप की मृत्यु

महाराणा प्रताप की 11 रानियां थी। इन रानियों से महाराणा प्रताप के 17 पुत्र और 5 पुत्रीयां थी। महाराणा प्रताप ने अपने पहले पुत्र अमर सिंह को अपने अंतिम दिनों में सिंहासन पर बैठाया।

साल 1597 में जनवरी को महानायक महाराणा प्रताप शिकार के दौरान बुरी तरह घायल हो गए जिसके बाद उनके 56 वर्ष की उम्र में ही मृत्यु हो गई।

महाराणा प्रताप ने अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र अमर सिंह से मुगलों के सामने कभी हार ना मानने का वचन लिया और इसी के साथ चित्तौड़गढ़ पर विजय प्राप्त करने को कहा।

महाराणा प्रताप के शव को 29 जनवरी 1597 में चावंड लाया गया। इतिहास के पन्नों में महाराणा प्रताप अपनी बहादुरी,साहस और जनप्रियता के लिए इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गए।

महाराणा प्रताप अपनी मृत्यु तक घास के बीछौने पर सोते थे, क्योंकि चित्तौड़गढ़ को मुगलों के शासन से मुक्त कराने का प्रण उनका अधूरा रह गया था।

https://www.pmwebsolution.in/
https://hindiblogs.co.in/contact-us/
मैं अंशिका जौहरी हूं। मैंने हाल ही में पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की है। और मैं hindiblogs पर biographies, motivational Stories, important days के बारे में लेख लिखती हूं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here